मी टू अभियान
फिर एक दिन एक महिला ने अपने साथ हुए असम्मान की पीड़ा बताई तो फिर तो एक शोर हो गया। एक-एक महिला अपने अब तक के छिपे दर्द को सामने लेकर आती गईं और तथाकथित समाज में बहुत ही प्रशंसा पाने वाले पुरुष बेनकाब होते चले गए। पश्चिम से शुरू हुआ मी-टू का यह हंगामा पूर्व तक भी आया, पर भारत तक ही सिकुड़ कर रह गया। मी-टू का यह तूफानी दौर थम सा गया है।
इधर, न तो पश्चिम में और न ही पूर्व में इसका कहीं शोर नहीं है और न ही कोई आवाज आ रही, तो क्या यह समझा जाए कि पुरुष या तो सुधर गए हैं या फिर मी-टू के हंगामे के बाद सहम गए हैं और इसलिए कोई ऐसी बेजा हरकतें नहीं कर रहे हैं। इस पर तो शक किया जाना चाहिए कि पुरुषों में एकाएक सुधार आ गया है और वह इस अहिंसात्मक आंदोलन से कुछ सीख पाए हैं। ऐसा तो हो ही नहीं सकता।