स्त्री से जुड़े शोषणकारी मुद्दे पर बात करें तो पितृसत्तात्मक चरित्र भयावह रूप में हर बार सामने आ जाता है, जिस पर बहुत बातें हुईं और सिनेमा, सेमिनार, लेख इत्यादि के माध्यम से हो भी रही हैं। पर, शोषण करने की आदत जो पूरे समाज में, दिमाग में जन्मघुट्टी की तरह घुला हुआ है, दिनों दिन क्रूरतम स्थिति में स्थायित्व प्राप्त करता चल रहा है। अफसोस है, पीड़ा है और ये पीड़ा कब तक रहेगी इसकी कोई निश्चित समय सीमा नहीं।