उत्तर प्रदेश का शहर मेरठ अपने बल्ले के लिए दुनियाभर में जाना-पहचाना नाम है। टीम इंडिया के अलावा क्रिकेट वर्ल्ड के कई बड़े सितारे भी यहां के बने बल्लों का इस्तेमाल करते हैं।
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पेड़ की टहनी से आपके बल्ले तक...खास तस्वीरें
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उत्तर भारत में बैट के लिए लकड़ियां जम्मू-कश्मीर, पंजाब और हरियाणा से आती हैं। बैट के लिए सागौन और साल की लकड़ियों का प्रयोग किया जाता है।
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मेरठ में बैट बनाने वाली कई प्रसिद्ध कंपनियां है। बल्ले पर एसएफ के लोगो वाली स्टैनफोर्ड क्रिकेट इंडस्ट्रीज फैक्टरी काफी चर्चित कंपनी है।
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मेरठ में बैट बनाने वाली कई प्रसिद्ध कंपनियां है। बल्ले पर एसएफ के लोगो वाली स्टैनफोर्ड क्रिकेट इंडस्ट्रीज फैक्टरी काफी चर्चित कंपनी है।
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मेरठ की बैट बनाने वाली एक कंपनी में एक कर्मचारी एक साथ कई लकड़ियों को काटकर बैट बनाने वाली मशीन के साथ काम कर रहा है।
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एक फैक्टरी में लकड़ी का बोटा रखा गया है जिसे तराशकर उसे बैट की शक्ल दी जाएगी।
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क्रिकेट बैट के लिए जम्मू-कश्मीर की लकड़ी सबसे बेहतर मानी जाती है।
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एक कर्मचारी आरी से बैट को पकड़ने वाली जगह को समतल बनाता हुआ।
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एक कर्मचारी बैट को समतल बनाता हुआ।
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मेरठ की एक फैक्टरी में एक कर्मचारी बैट को चिकना कर समतल बनाने की कोशिश करता हुआ।
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भारत में क्रिकेट सबसे लोकप्रिय गेम है और बल्ले की मांग बहुतायत में है। राहुल द्रविड़ और वीरेंद्र सहवाग भी इस शहर सिर्फ बैट खरीदने आते रहे हैं।
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बैट के निर्माण में उसकी मजबूती खास मायने रखती ही है, साथ ही उसका वजन भी अहम होता है। एक बैट की वजन नापती मशीन। सचिन तेंदुलकर और महेंद्र सिंह धोनी के बारे में कहा जाता है कि वे भारी बल्ले से खेलते हैं।
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लकड़ी की कटाई के बाद बैट को अंतिम रूप देते कर्मचारी।
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लकड़ी की कटाई के बाद बैट को अंतिम रूप देते कर्मचारी। बैट का सबसे अहम हिस्सा होता है बैट हैंडल। इसी हैंडल को और सार्प करता एक कर्मचारी।
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बैट का सबसे अहम हिस्सा होता है बैट हैंडल। इसी हैंडल को और सार्प करता एक कर्मचारी।
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बल्ले को चिकना बनाने के बाद उसे पेंट किया जाता है।
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बल्ले को पेंट से रंगने के बाद उसपर हल्की से लेयर चढ़ाई जाती है और फिर इसे स्टोरेज रूम में भेज दिया जाता है।
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बल्ले को अंतिम रूप देने के बाद उसे बाजार में उतार दिया जाता है। मेरठ के बने बल्ले न सिर्फ देशभर में बल्कि दुनिया के कई देशों में भी भेजे जाते हैं।