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तस्वीरों में देखिए भगवान विष्णु के अंकोरवाट मंदिर की भव्यता

Thu, 24 Sep 2015 04:39 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली
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यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल कंबोडिया का अंकोरवाट मंदिर अपनी अनोखी स्थापत्य कला के लिए दुनियाभर में मशहूर हैे। तस्वीरों के जरिए हम आपको इस भव्य मंदिर की यात्रा कराते हैं।
(फोटो फीचर: सुदीप ठाकुर, कंबोडिया से लौटकर)
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कंबोडिया के सिएम रीप शहर से करीब दस किमी दूर घने जंगलों के बीच स्थित अंकोरवाट मंदिर को दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर प्रांगण के रूप में जाना जाता है।
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इसका निर्माण सम्राट सूर्यवर्मन ने 12वीं सदी में विशाल प्रांगण के रूप में करवाया था। यह मंदिर हिंदू देवता विष्णु को समर्पित है। कंबोडिया एक बौद्ध देश है और बौद्ध धर्म में बुद्ध को विष्णु का अवतार माना जाता है।

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मेकांग नदी के किनारे बसे सिएम रीप शहर में स्थित मंदिर पिरामिड जैसा है, और 1300 मीटर चौड़ी और 1500 मीटर लंबी चारदीवारी से घिरा हुआ है। यह मंदिर कमल के आकार के पांच बुर्जों से सज्जित है, जिसमें से एक मध्य में और चार कोण पर स्थित हैं। जमीन से इसकी ऊंचाई पैंसठ मीटर है।
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मुख्य मंदिर एक वर्ग किमी के क्षेत्र में फैला हुआ है। वैसे पूरा अंकोरवाट क्षेत्र कई सौ वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है। कंबोडिया की सरकार ने इसे अंकोरवाट आर्कियोलॉजी पार्क में तब्दील कर दिया है। यह मंदिर मेरू पर्वत का भी प्रतीक है। कहते हैं कि खमेर शब्द मेरू से ही बना है। यहां खमेर शैली का स्थापत्य देखते ही बनता है।
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मंदिर की दीवारों में रामायण, महाभारत और समुद्र मंथन से जुड़ी कथाओं को सुंदर आकृतियों के साथ उकेरा गया है। मंदिर की दीवारों पर अंकित आकृतियों में अंकोर युग की शैली में अंकित दो हजार अप्सराएं भी हैं। बताते हैं कि फ्रांसीसी वास्तुकारों और पुराविदों ने यह जानने की नाकाम कोशिश की थी कि आखिर इतनी खूबसूरत आकृतियों को बिना छेनी हथौड़े जैसे औजारों के कैसे उकेरा गया।
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सिर्फ अपनी वास्तुकला के लिए ही नहीं, अंकोरवाट मंदिर में सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।

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इस परिसर में कई मंदिर जीर्ण शीर्ण हालत में पड़े हैं।

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अंकोरवाट आर्कियोलॉजी पार्क में ही एक अन्य हिंदू मंदिर ता-प्रोह्म स्थित है। यहां अंकित अभिलेखों के अनुसार जयवर्मन द्वितीय ने इस मंदिर का निर्माण मां के लिए कराया था। उनकी मां प्रग्न परमिता देवी की पूजा करती थीं। चार द्वारों वाले इस मंदिर की दीवारें 600 मीटर चौड़ी और 1000 मीटर लंबी हैं।

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कुछ विद्वानों के अनुसार ता-प्रोह्म मंदिर परिसर का उपयोग बौद्ध भिक्षुओं के विश्वविद्यालय के रूप में होता था। इस मंदिर में 39 बुर्ज हैं, लेकिन अधिकांश नष्ट हो गए हैं। अब उनके सिर्फ अवशेष बचे हैं।
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कंबोडिया के आग्रह पर भारत ने अंकोरवाट और ता-प्रोह्म मंदिरों के जीर्णोद्धार में मदद की है। द्विपक्षीय समझौते के तहत भारत ने 1986-93 के दौरान अंकोरवाट मंदिर का जीर्णोद्धार किया। इसके अगले चरण में भी भारत मदद करेगा। ता-प्रोह्म मंदिर के अगले चरण के जीर्णोद्धार में भी भारत मदद कर रहा है।
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