हिमाचल प्रदेश को देव भूमि यानी देवताओं की भूमि के नाम से जाना जाता है। यहां आने के बाद आपको इस बात का एहसास भी होने लगेगा। यहां के मंदिर और देवताओं के दर्शन करके आपको शास्त्रों और पुराणों में बताई गई कहानियों की सच्चाई का एहसास भी होने लगेगा। तो आइए हिमाचल के ऐसे ही कुछ मंदिरों और देवताओं के दर्शन करते हैं जिनका संबंध पौराणिक कथाओं और मान्यताओं से।
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इन मंदिरों और देवताओं को देखकर आप हैरान रह जाएंगे
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पौराणिक कथाओं में उल्लेख मिलता है कि मनुष्य का जन्म मनु से हुआ है। यह धरती के पहले मनुष्य हैं। प्रलय काल में इन्होंने सृष्टि की पुर्नस्थापना के लिए सारे साधनों को संभलकर हिमाचल में शरण लिया। प्रलय समाप्त होने के बाद इन्होंने वर्तमान मनाली नामक स्थान से सृष्टि को पुनः स्थापित करने का काम शुरु किया। इसलिए मनाली में सृष्टि के प्रथम मनुष्य की देवता रुप में पूजा होती है। तस्वीरों में मंदिर के साथ मनु महाराज की मूर्ति के भी दर्शन कीजिए।
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पिरनी गांव यह मनाली से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहीं पर महाभारत युद्घ में विजय प्राप्त करने के लिए अर्जुन ने भगवान शिव की तपस्या करके उनसे पशुपताशस्त्र प्राप्त किया था। यह पत्थर और चट्टान जो आप देख रहे हैं इन्हीं के बीच बैठकर अर्जुन ने गुफा में तपस्या की थी। अर्जुन गुफा इतना बड़ा है कि करीब 1000 व्यक्ति इसमें समा सकते हैं।
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मनाली से करीब 6 किलोमीटर की दूरी पर हमटा नामक स्थान है। यहां पर भगवान शिव ने शिकारी के वेष में अर्जुन से युद्घ किया था। यहां पर शबरी देवी का मंदिर है। माना जाता है कि यहां देवी पार्वती शबरी रुप में स्थित हैं। काष्ठ का बना देवी शबरी का यह मंदिर करीब 200 साल पुराना माना जाता है।
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यह महाभारत के योद्घा भीम की पत्नी हिडिम्बा का मंदिर है। इसका निर्माण 1553 में कुल्लू के शासक महाराजा बहादुर ने करवाया था। देवदार में घने जंगल में स्थित यह मंदिर वास्तु और काष्ठकला का बेहतरीन उदाहरण है। मंदिर के भीतर एक प्राकृतिक चटटान है जिसे देवी का स्थान माना जाता है। इस चट्टान पर देवी हिडिम्बा के पैरो के विशाल चिन्ह मौजूद हैं। चटटान को स्थानीय भाषा में ढूंग कहा जाता है, इसलिए देवी को ढूंगरी देवी के नाम से भी जाना जाता है।
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हिडिंबा मंदिर के पास ही भीम और हिडिंबा के बेटे घटोत्कच का भी मंदिर बना हुआ है। घटोत्कच ने महाभारत युद्घ में अपने बल और बलिदान से अर्जुन के प्राण बचाए थे। भगवान श्री कृष्ण की कृपा से घटोत्कच को देवत्व प्राप्त है। घटोत्कच का मंदिर भी मंदिर काष्ठ का बना हुआ हुआ जो देखने में अद्भुत है।
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शिमला से करीब 180 किलोमीटर की दूरी पर सराहन में व्यास नदी के तट पर भीमाकाली मंदिर स्थित है। माना जाता है कि यहां पर देवी सती के कान गिरे थे। इसलिए यह शक्तिपीठ के रुप में जाना जाता है। यहां पर देवी ने भीम रुप धारण करके असुरों का वध किया था इसलिए देवी भीमा कहलाती हैं। यहां देवी काली की पूजा होती है। कहते हैं भगवान श्री कृष्ण ने यहां वाणासुर का वध किया था।
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महाभारत के रचनाकार महर्षि व्यार ने इस स्थान पर तपस्या की थी। इसके प्रतीक चिन्ह के रुप में यहां व्यास मुनि का मंदिर बना हुआ है।
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मनाली से करीब 3 किलोमीटर की दूरी पर वशिष्ठ नामक एक स्थान है। यहां पर भगवान राम के गुरू वशिष्ठ मुनि ने तपस्या की थी। यहां वशिष्ठ मुनि का एक छोटा-सा मंदिर है। वशिष्ठ में गर्म जल के चश्मे भी हैं।
हिमाचल प्रदेश के मंडी बस पड़ाव के पास ही चंद्र और भागा नदियों के संगम स्थल पर भगवान शिव का एक मंदिर बना हुआ है। यह मंदिर भगवान शिव के त्रिलोकी स्वरूप को समर्पित है इसलिए इसका नाम त्रिलोकीनाथ है। इस मंदिर की खूबी है कि यहां हमेशा दो अखंड ज्योतियां प्रज्जवलित रहती हैं।