कुछ साल पहले एच1एन1 फ्लू यानि स्वाइन फ्लू का कहर लोगों पर बरपा था। ऐसा ही कुछ हाल एबोला वायरस ने पश्चिमी अफ्रीका में किया है। और अब सामने आया है जीका वायरस। दुनिया के इस इतिहास में ये पहला या दूसरा किस्सा नहीं है जब किसी महामारी ने सैकड़ों की संख्या में लोगों की जान ली हो या फिर लाखों लोगों की जान पर इस तरह का खतरा मंडराया ना हो।
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सदियों तक खौफ पैदा करते रहे हैं ये वायरस, फिर दी दस्तक
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जानिए उन सभी जानलेवा महामारियों के बारे में जिन्होंने कभी ना कभी मानव सभ्यता के अंदर खौफ पैदा किया है।
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सबसे पहले बात करते हैं जीका वायरस की। हाल ही में जीका वायरस ने अमेरिका को परेशानी में डाल रखा है साथ ही दुनिया भी चौकन्नी हो गई है। ये गर्भवती महिलाओं से उनके गर्भस्त शिशुओं को हो रहा है। मच्छरों से फैलने वाली इस बीमारी के लिए भारत ने वैक्सीन खोज ली है। लेकिन इसका खतरा उतना ही बना हुआ है।
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इबोला ने 1976 में सबसे पहली अपनी खौफनाक दस्तक दी थी। इसके बाद साल 2014 में इसने पश्चिमी अफ्रीका में कई हजार लोगों को अपनी चपेट में लिया और सैकड़ो जाने लीं। इबोला के लक्षण थे मांसपेशियों में दर्द, कमजोरी और तेज बुखार। इसकी मृत्यु दर 90 प्रतिशत है।
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साल 2009 में स्वाइन फ्लू यानि एच1एन1 ने डब्ल्यू एचओ के मुताबिक 18,550 जाने ली थीं।
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सार्स का पहली बार दस्तक 2002-03 में दक्षिणी चीन में दी। सांसों की होने वाली इस बीमारी ने कुछ हफ्तों में ही 37 देशो को अपने चपेट में ले लिया था। इससे 774 मौतें हुई।
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सार्स का खतरा टला नहीं था कि 2003 में बर्ड फ्लू यानि एच5एन1 सामने आ गया। इसका पहला मामला साउथ एथिया के पोल्ट्री फ्रार्मों में सामने आया। वैसे तो ये इंसानो को उसतरह अपनी चपेट में नहीं लेता है। पक्षियों में ये तेजी से फैलता है या फिर संक्रामित पक्षियों के करीब जो लोग रहते हैं।
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बहुत ही पुरानी और खतरनाक बीमारियों में से एक रहा है स्माल पॉक्स। डब्लूएचओ के प्रयासों के बाद 1977 में इसका आखिरी केस सामने आया था। इससे लगभग 500 मिलियन जाने ली थी।
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पीत ज्वर यानि येलो फीवर संक्रमित मच्छर के काटने से होता है। ये मुख्य रुप से दक्षिणी अमेरिका और अफ्रीका में फैलता है। डब्लूएचओ ने अनुमान लगाया है कि हर साल 2 लाख से ज्यादा केस सामने आते हैं जिसमें 30 हजार मौत के चपेट में आते हैं।
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काली खांसी ने साल 2008 में 1 करोड़ 6 लाख लोगो को अपनी चपेट में लिया। ये मुख्य रुप से 6 महीने से ऊपर और 11 से 18 साल के बच्चों को होता है जिनकी इम्यूनिटी कमजोर हो चुकी होती है।