एक चीनी कहावत है कि अपने मन का काम करेंगे तो आपको ताउम्र काम नहीं करना पड़ेगा। लेकिन हर किसी को अपनी पसंद का काम नसीब नहीं होता। लेकिन बदलते वक़्त के साथ यह ट्रेंड भी बदला है और अब लोग अपने शौक या अपने आईडिया को ही रोजी रोटी का जरिया बना रहे हैं और ऐसा करने के लिए वो अपनी जमी जमाई नौकरी को छोड़ने में भी नहीं हिचकिचा रहे। इसका एक उदाहरण है अलंकार जैन जो एनडीटीवी बिजनेस में एडिटर के पद पर कार्यरत थे लेकिन अपनी अच्छी खासी नौकरी को छोड़कर पहले अपना प्रोडक्शन हाउस खोला और फिर 'दि लिल फ्ली मार्केट' नाम की कंपनी खोली। खुशबू दुआ/मुंबई से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
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वो, जिन्होंने अपने शौक को बनाया कैरियर, कमा रहे लाखों-करोड़ों रुपए
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लिल फ्ली के बारे में वे बताते हैं, "मुंबई में प्रतिभा के भंडार को आगे लाने के लिए नए विकल्पों और प्लेटफॉर्म की जरूरत है और इसलिए हमने इस मार्केट को शुरू किया जहाँ अलग अलग क्षेत्र से जुड़े लोग आकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं"
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इस मार्केट में अलग-अलग स्टॉल्स पर विभिन्न लोग अपनी कलाकृतियों को बेचते हैं। 40 लाख रुपए की प्राथमिक पूंजी से शुरू हुई 'दि लिल फ्ली मार्केट' का सालाना लाभ बीते 2 सालों में करीब 1 करोड़ से ऊपर चला गया है और अब इस स्टार्ट-अप से सिर्फ लोगों की प्रतिभा सामने नहीं आ रही है बल्कि इससे जुड़ने वाले लोगों को आर्थिक मदद देने की हालत में भी है।
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हॉबी को करियर बनाने वाला दूसरा उदाहरण है प्रणिता बलार का जिन्हें कुत्तों के प्रति विशेष लगाव है, अपने इसी लगाव को उन्होंने अपना करियर बना लिया। 28 साल की उम्र में अपने मार्केटिंग की नौकरी को छोड़ कर प्रणिता ने केनाइन ट्रेनर और बिहेवरिस्ट का कोर्स किया और अब वो पालतू कुत्तों को ट्रेन करती हैं।
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'बार्क एंड बॉन्ड' नाम की इस कंपनी में सालाना लाखों का फायदा बना रही प्रणिता बताती हैं, "हम पालतू कुत्तों को ज़रुरी चीजे सिखातें है साथ ही लोगों को भी उनके कुत्तों के व्यवहार को समझने में मदद करते हैं।" प्रणिता मानती हैं कि डॉग लवर्स के बीच उनकी यह सर्विस खासी लोकप्रिय है क्योंकि इसे करने के बाद उन्हें अपने पालतू कुत्ते के साथ एक नया रिश्ता मिलता है। एक और उदाहरण है 33 साल की चार्टेड अकाउंटेंट टप्पू यानि स्नेहा का जिन्होनें अपने घरेलू नाम से शुरू की है 'टप्पू की दुकान'। स्नेहा ने पांच साल तक चार्टेड अकाउंटेंट की नौकरी करने के बाद जब बोरियत महसूस की तो अपनी हॉबी 'डिज़ाइनिंग' की ओर रुख किया।
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वो बताती हैं, "मैं पूरी ज़िंदगी अकाउंटेंट नहीं बने रहना चाहती थी। ऐसे में मैंने एक गिफ़्ट स्टोर खोलने की बात सोची जहां ट्रेडिशनल गिफ़्ट की जगह अनोखा सामान मिले जैसे छोटे ग्लास, रंग बिरंगे बर्तन, ऐसा सामान जो कल्पना में हो पर दुकानों पर मिलता न हो।" वो बताती हैं,'' मैंने ऐसी चीज़ों को रखा जिन्हें मैं अपने दोस्तों को तोहफ़े में देना चाहती थी और धीरे-धीरे यह सामान लोकप्रिय होने लगा और 6 साल पहले 8 लाख रुपयों की लागत से शुरू हुई 'टप्पू की दुकान' आज काफ़ी मुनाफ़े मैं है।'' हालांकि स्नेहा बताती हैं की उन्हें ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स से कड़ी टक्कर मिलती है पर फिर भी वो अपने निर्णय से काफ़ी खुश हैं क्योंकि 'टप्पू की दुकान' में उनके बनाए हुए नियम चलते हैं।
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अपने बने-बनाए करियर को छोड़कर अपने शौक को हॉबी बनाने वाले ऐसे ही कई उदाहरणों में से एक है उपासना मकाती। पब्लिक रिलेशन कंपनी में पीआर एक्ज़िक्यूटिव के तौर पर काम कर रही उपासना ने नेत्रहीन लोगों के लिए 'दि वाइट प्रिंट' नाम से एक मैग़ज़ीन शुरू की है।
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उपासना के अनुसार, "ये भारत में पहली बार है कि किसी ने ऐसी कोशिश की है और साल 2013 में हमारे पास सिर्फ़ 20 सदस्य थे लेकिन अब यह संख्या 350 तक पहुंच गई है।" हालांकि उपासना ने बताया कि यह अभी फ़ायदे का सौदा नहीं है और उनकी मैगज़ीन का खर्च सिर्फ़ विज्ञापन से ही निकलता है लेकिन वो इसे बंद नहीं करेंगी बल्कि मैगज़ीन के साथ अख़बार भी निकाल सकती हैं।