मुंबई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन को नागपुर की सेंट्रल जेल में आज यानी गुरुवार को सुबह 6 बजकर 19 मिनट पर फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के कार्यकाल में दी जाने वाली यह तीसरी फांसी है। आइए जानते हैं प्रणब मुखर्जी के पूरे कार्यकाल में किसे-किसे मिली फांसी और किन याचिकाओं पर उन्होंने दिखाई दया।
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प्रणब मुखर्जी के कार्यकाल में हुईं 3 फांसियां, जानिए इनके बारे में
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याकूब मेमन ने मंगलवार को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से दया की अपील की थी, लेकिन राष्ट्रपति ने गृह मंत्रालय से चर्चा करने के बाद उसकी दया याचिका खारिज कर दी थी। आपको बता दें कि करीब साल भर पहले भी याकूब की फांसी को लेकर राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर की गई थी। उस समय यह याचिका याकूब के परिजनों ने दायर की थी।
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याकूब मेमन को 1993 में हुए मुंबई बम धमाकों के लिए दोषी करार दिया गया था। इन बम धमाकों का मास्टरमाइंड याकूब का बड़ा भाई टाइगर मेमन था, जो दाऊद इब्राहिम के साथ मिलकर जुर्म की दुनिया में पैठ जमा चुका था। बम प्लांट कराने से लेकर 15 लोगों को प्रशिक्षण के लिए पाकिस्तान भेजने तक की सारी जिम्मेदारी को याकूब ने बखूबी अंजाम भी दिया था।
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राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी मार्च 2015 तक 22 दया याचिकाएं खारिज कर चुके हैं। 22 जुलाई 2012 से शुरू हुए अपने कार्यकाल में प्रणब मुखर्जी ने अभी तक सिर्फ 1 व्यक्ति की दया याचिका को स्वीकार किया है। राष्ट्रपति ने उस दया याचिका को स्वीकार करते हुए फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया था।
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इस व्यक्ति का नाम है मन बहादुर दीवान उर्फ टोटे दीवान। फिलहाल इसकी उम्र करीब 63 साल है, जो जोरहाट सेंट्रल जेल में बंद है। बहादुर ने असम में अपनी पत्नी, दो मासूम बच्चों और एक पड़ोसी महिला को मार दिया था। बहादुर ने यह अपराध 29 सितंबर 2002 को किया था।
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याकूब से पहले 2008 के मुंबई में हुए आतंकी हमले के दोषी अजमल आमिर कसाब और 2001 में किए गए संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को भी फांसी दी गई थी।
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कसाब को 21 नवंबर 2012 को सुबह 7.30 बजे फांसी दी गई थी, जिसके बाद पुणे की यरवड़ा जेल में उसे दफना दिया गया था। कसाब एक पाकिस्तानी व्यक्ति था और लश्कर ए तैयबा समूह का सदस्य था। आपको बता दें कि कसाब अकेला ऐसा हमलावर था, जिसे पुलिस ने जिंदा पकड़ा था।
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2001 में संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को दिल्ली की तिहाड़ जेल में 9 फरवरी 2013 को सुबह 8 बजे गुप्त तरीके से फांसी दी गई थी। इसके बाद तिहाड़ जेल में ही उसे दफना दिया गया था। अफजल गुरु के परिवार वालों को फांसी की सूचना नहीं दी गई थी और बाद में शव मांगे जाने पर मना भी कर दिया गया था।