देश की आजादी के आंदोलन में बहुत लोगों ने अपना बलिदान दिया लेकिन कुछ का योगदान ऐसा है, जो इतिहास के पन्नों से पूरी तरह बाहर नहीं आ सका। कुछ ऐसा ही योगदान है वीर वारकर का। आज वीर सावरकर की पुण्यतिथि है, आइए डालते हैं उनके जीवन पर कुछ निगाह।
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दो बार आजीवन कारावास पाने वाले सावरकर की पूरी कहानी
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माना जाता है इतिहास के पन्नों ने आजादी की लड़ाई में वीर सावरकर के योगदान को वाले जगह नहीं दी जिसके वो हकदार थे। लेकिन उनके चाहने वाले आज भी उन्हें आजादी का ऐसा सिपाही मानते हैं जो जीवन भर अपने सिद्धांतों के साथ ब्रिटिश सरकार से लोहा लेता रहा।
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सावरकर की पहचान क्रांतिकारी, कवि, समाजसेवी, भाषाविद के तौर पर भी है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन को उन्होंने अपनी कलम से सूचीबद्ध किया था।
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सावरकर को उस दौर का सबसे बड़ा हिंदूवादी नेता भी माना जाता है। वह अखिल भारतीय हिंदू महासभा के छह बाहर राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए। जीवनभर वह हिंदुत्व का झंडा थामकर संघर्ष करते रहे। लेकिन हिंदुत्व के प्रति उनका यह प्रेम कुछ लोगों को रास नहीं आया।
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वीर सावरकर अपने जीवनकाल में कई बार जेल गए। इनमें सबसे ज्यादा लंबा समय 1911 से 1921 तक अंडमान की सेल्युलर जेल में रहा। उन्हें काले पानी की सजा सुनाई गई। वीर सावरकर ही देश के अकेले ऐसे व्यक्ति रहे जिन्हें आजीवन कारावास की दुहरी सजा सुनाई गई।
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कहा जाता है अंडमान जेल में रहने के दौरान उन्होंने
की पत्थरों से जेल की दीवारों पर दस हजार से ज्यादा कविताएं लिखीं।
जिन्हें बाद में कलमबद्ध किया।
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उन्होंने बैरिस्टर की डिग्री इंग्लैंड से ली थी, लेकिन भारत में अंग्रेजी राज का विरोध करने के कारण उन्हें अपनी डिग्री से हाथ धोना पड़ा। आजादी के दौरान वह उन लोगों में से थे जिन्होंने भारत विभाजन का विरोध किया। वह इसके लिए गांधी जी को जिम्मेदार ठहराते थे।
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हालांकि 1921 में उन्हें जेल से मुक्त कर दिया गया। जिसके बाद वह कुछ समय के लिए इंग्लैंड चले गए। यहां अंग्रेज सरकार की मुखालफत करने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर भारत वापस भेज दिया गया। इस दौरान पानी के जहाज से लौटते समय वह उससे कूदकर फरार हो गए। हालांकि फिर पकड़े गए और जेल भेज दिया गया।
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1948 में जब गांधी जी की हत्या की गई तो इसका आरोप सावरकर पर भी लगा। उनके खिलाफ मुकदमा भी चला, लेकिन दोष साबित नहीं हो सका। जिसके बाद कोर्ट ने उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया।
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सावरकर का जन्म नासिक जिले के भागुर गांव में 28 मई 1988 को दामोदर पंत सावरकर के यहां हुआ था। उनका पूरा नाम विनायक दामोदार सावरकर था। विनायक जब नौ साल के थे तभी उनकी माताजी राधाबाई का निधन हो गया।
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26 फरवरी 1966 में मुंबई में सावरकर का निधन हो गया। तमाम आरोपों से मुक्त होने के बाद 1966 में भारत सरकार ने मौत के बाद उनकी याद में डाक टिकट भी जारी किया।