जीवन संघर्षमय है। संघर्षों का भी अलग आनंद होता है। यदि हिम्मत और दृढ़ निश्चय के साथ ज्ञान प्राप्त करते रहेंगे तो निश्चित ही आपके विकास को कोई रोक नहीं पाएगा। चाहे जितनी भी कठिनाइयां जीवन में आएं, प्रमाणिकता न छोड़ें। ऐसा करने पर तमाम चुनौतियों के बावजूद आप आगे बढ़ते जाएंगे, क्योंकि प्रमाणिकता का कोई और पर्याय नहीं है। सोमवार को संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के 33वें दीक्षांत समारोह की अध्यक्षता करते हुए कुलाधिपति और प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने ये बातें कहीं।
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संस्कृत विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह, 29 मेधावियों को 67 पदक
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उन्होंने मुख्य अतिथि बीएचयू के कुलपति प्रो. जीसी त्रिपाठी के साथ 29 मेधावियों को 67 स्वर्ण पदक वितरित किए। छात्रों में चक्रपाणि पोखरेल, श्रीनिवास स्वाई और धर्मेंद्र चौबे सर्वाधिक आठ-आठ पदक पाकर टॉपर रहे जबकि छात्राओं में सर्वाधिक पांच पदक के साथ कीर्ति पाठक टॉपर रहीं। (ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी)
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मेधावी छात्र-छात्राओं को बधाई देते हुए राज्यपाल ने कहा कि समारोह में ली गई प्रतिज्ञा के अनुसार ही जीवन में व्यवहार करना होगा। सफलता का यही सबसे बड़ा मूल मंत्र है। अभी तो केवल किताबी पढ़ाई समाप्त हुई है, अब नए जीवन की शुरुआत हो रही है, जिसमें बहुत प्रतिस्पर्धाएं हैं। इसके लिए तैयार रहना होगा।
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कहा कि संस्कृत भाषा के विकास के दृष्टिकोण से ही विश्वविद्यालय में कौशल विकास केंद्र की स्थापना हो रही है। इसके लिए तीन करोड़ रुपये भी प्राप्त हो चुके हैं। इस केंद्र के जरिये विद्यार्थियों को ज्योतिष और कर्मकांड सहित अन्य विषयों में नई-नई जानकारी मिल सकेगी।
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दीक्षांत समारोहों में ड्रेस कोड पर उन्होंने कहा कि पिछले साल यहीं पर आयोजित समारोह के बाद सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को भारतीय परिवेश वाला ड्रेस कोड लागू करवाने का निर्देश दिया गया था, जिसका पालन हुआ। श्रीमद्भागवत गीता की 5151वीं जयंती पर समारोह का आयोजन होना सुखद संयोग है। कहा कि देश में ऐसी शिक्षा पद्धति आई, जिसकी वजह से संस्कृत की उपेक्षा हुई लेकिन अब दिन बदल रहे हैं। संस्कृत की खोई प्रतिष्ठा वापस हो रही है। पदक पाने वाले मेधावियों में आठ छात्राओं के नाम आने पर उन्होंने प्रसन्नता जाहिर की।
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संस्कृत विश्वविद्यालय से संबद्ध राजकीय आयुर्वेद कॉलेज के किसी विद्यार्थी को 20 साल बाद पदक मिला। आयुर्वेदाचार्य परीक्षा में दो पदक पाने वाली गोरखपुर की अनुराधा पाठक ने कहा कि उनके लिए इससे बड़ी उपलब्धि और कोई नहीं हो सकती। बताया कि वह चिकित्सक बनकर मानवता की सेवा करना चाहती हैं। इसके लिए वह बीएचयू से एमडी कर रही हूं। कॉलेज के प्राचार्य डॉ. एसएन सिंह ने बताया कि 1994 के बाद से अब तक किसी विद्यार्थी को कोई पदक नहीं मिल पाया था। उन्होंने अनुराधा को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी।
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संस्कृत विषय से शोध करना है, इसके लिए तैयारी चल रही है। विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने के बाद से ही यह सपना था कि दीक्षांत में पदक पाकर मान बढ़ाऊं ।-धर्मेंद्र चौबे, कुशीनगर
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संस्कृत सर्व विद्या की भाषा है। इसके उत्थान के लिए हमेशा कार्य करते रहेंगे। आगे चलकर प्रोफेसर बनना है। समारोह में पदक पाने के बाद जिम्मेदारी और बढ़ गई है।-श्रीनिवास स्वाई, उड़ीसा
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कुलाधिपति के हाथों पदक पाना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। संस्कृत का अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार करना है। इसके लिए हम दिल्ली विश्वविद्यालय से शोध की तैयारी कर रहे हैं।-चक्रपाणि पोखरेल-नेपाल
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डीलिट पाने वाली आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की सुपौत्री डॉक्टर विनयश्री द्विवेदी।