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गांव की बेटियों के लिए राजकुमारी बन गई फकीर, देखें तस्वीरें

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आज जब महिलाओं और बच्चियों के सशक्तिकरण के लिए सरकार कई योजनाएं चला रही है। ऐसे में बेटियों को हुनरमंद बनाने के लिए एक बेटी ने मोर्चा संभालते हुए खास गुरुकुल खोला है। (सभी फोटो: ब्यूरो/अमर उजाला, मेरठ)
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हम बात कर रहे हैं रश्मि आर्य की जिन्होंने मेरठ में छात्राओं के लिए खासतौर से ये गुरुकुल खोला है। जिसमें उन्हें पढ़ाई के साथ-साथ और भी कई जानकारियां दी जाती हैं।
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परीक्षितगढ़ के नारंगपुर में दान के पैसे से बने श्रीमद् दयानंद आर्य कन्या गुरुकुल और उसमें पढ़ने वाली छात्राओं में कई खूबियां मिली हैं। इस गुरुकुल की स्थापना छत्तीसगढ़ के राजघराने से ताल्लुक रखने वाली रश्मि आर्य ने की है।

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गरीब लड़कियों को पढ़ाने के लिए अपने सारे सुख वैभव ठुकरा रश्मि 2000 में घर से निकल गईं। वह 2005 में परीक्षितगढ़ के नारंगपुरी पहुंचीं। यहां ओमपाल सिंह के घेर के एक कमरे से लड़कियों की शिक्षा के लिए अभियान शुरू किया।
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शुरू में पांच लड़कियां ही पढ़ने आती थीं, लेकिन आज यह संख्या 60 हो गई है। वर्ष 2007 में दो बीघा जमीन लेकर लड़कियों का गुरुकुल शुरू किया गया, जो आज आठ बीघा में फैला है।
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गुरुकुल को पांचवीं तक मान्यता है, लेकिन यहां से जुड़ने वाली हर बच्ची की परास्नातक की पढ़ाई का जिम्मा गुरुकुल ही उठाता है।
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इस गुरुकुल की लड़कियों को पढ़ाई में अव्वल बनाने के लिए खास कोशिशें की जाती है। जिससे वह अव्वल रहें।

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इस गुरुकुल की लड़कियां बॉक्सिंग जानती हैं। जूडो में हाथ आजमाती हैं।

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यहां छात्राओं को तबला, हारमोनियम, गीत-संगीत की भी शिक्षा दी जाती है।

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डांस और म्यूजिक में तो हुनर है ही, कंप्यूटर का भी अच्छा खासा ज्ञान है।

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गुरुकुल में छात्राओं को निशानेबाजी के भी गुर सिखाए जाते हैं। इनका निशाना भी अचूक है।

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इस गुरुकुल में छात्राओं के लिए खेल कूद के भी अच्छे अवसर उपलब्ध कराए जाते हैं। जिसकी वजह से उन्होंने राष्ट्रीय स्तर का कई मेडल भी जीते हैं।

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यहां पर बच्चों की सुख-सुविधा का खास ख्याल रखा गया है। पीने के लिए साफ पानी की खास व्यवस्था की गई है। कैंपस में ऑरो लगा हुआ है।

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रश्मि आर्य का यह नाम असली नहीं है, बल्कि आर्य समाज ने दिया है। रश्मि की कहानी थोड़ी फिल्मी है। संपन्न परिवार में जन्म होने से किसी चीज की कमी नहीं थी। लेकिन, गरीब बच्चियों को देखतीं तो द्रवित हो उठतीं, पर उनके लिए कुछ न कर पाने की कसक रह जाती।

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स्टेटस की वजह से परिवार से इजाजत नहीं थी। ऐसे में 10 जुलाई 2000 को घर से निकल गईं। घर छोड़ने की बात उन्होंने केवल अपनी भाभी को बताई। गुरुकुल में लड़कियों को खेलकूद, कंप्यूटर प्रशिक्षण के साथ ही अनुशासन का भी पाठ पढ़ाया जाता है।

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छात्राओं के लिए अन्य जरूरी संसाधन भी हैं। अगर आप गुरुकुल की किसी बच्ची से मिलेंगे तो वह पहले हाथ जोड़ कर नमस्ते करेगी। नाम पूछने पर जवाब देती हैं कि आचार्य मैम से पूछिए। दरअसल, गुरुकुल का अपना नियम कानून है। बच्चों को किसी अनजान व्यक्ति का नाम बताने की इजाजत नहीं है।
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रश्मि बताती हैं कि जब उन्होंने ओमपाल के घेर में स्कूल शुरू किया था तो मुस्लिम समाज की लड़की गुलशन उनके साथ मिशन में जुट गई। आज गुलशन एमबीए के बाद एलएलबी कर रही है। वह रोज बच्चों को पढ़ाने गुरुकुल आती है। गुलशन के साथ ही उसकी बहन भी अब गुरुकुल से जुड़ गई है।
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