भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम गोविंदा राजन ने आज से ठीक दो साल पहले देश के सबसे युवा गवर्नर के रूप में बागडोर संभाली थी। जब उन्होंने इन जिम्मेदारी को अपने कंधों पर लिया तो देश का रुपया अमेरिकी डॉलर के सामने लड़खड़ा रहा था। एक समय ऐसा आया की एक डॉलर की तुलना में रुपया का भाव 68 रुपया के स्तर तक पहुंच गया। पर रघुराम राजन को जो जिम्मेदारी सौंपी गई थी उन्होंने उसको बखूबी निभाया और देश की हचकोले खाती अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ने के रास्ते दिखाए। आज हम उनके पिछले 24 महीनों की उन 24 बातों को आपके सामने लाएगें जिसका देश के साथ विदेशी अर्थव्यवस्था पर भी असर देखने को मिला है।
रिपोर्ट- सचिन यादव/अमर उजाला, दिल्ली
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24 महीने, 24 बातें जानिए आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन की
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आरबीआई के गर्वनर रघुराम राजन का जन्म मध्य प्रदेश में हुआ था। वह एक तमिल परिवार में पैदा हुए थे और उनके पिता भारत सरकार में एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी थे। रघुराम राजन की पढ़ाई दिल्ली के आरकेपुरम में स्थित दिल्ली पब्लिक स्कूल से हुई थी। आरबीआई गर्वनर का पूरा नाम रघुराम गोविंदा राजन है। इन्होंने अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई आईआईटी दिल्ली से की है। आईआईटी दिल्ली से इन्होंने साल 1985 में इलेक्ट्रिक्ल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। वहीं वर्ष 1987 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट अहमदाबाद से पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में अपना पोस्ट ग्रेजुएट किया।
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रघुराम राजन ने विश्व की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी एमआईटी से एसेज ऑन बैकिंग विषय पर पीएचडी की। रघुराम राजन अक्टूबर, 2003 से दिसंबर, 2006 तक इंटरनेशन मॉनटेरी फंड के मुख्य अर्थशास्त्री के रूप में कार्यरत रहें। वर्ष 2008 में भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने रघुराम राजन को अपना अवैतनिक आर्थिक सलाहकार नियुक्त किया। इसी साल रघुराम राजन को योजना आयोग की एक आर्थिक सुधारों की उच्चस्तरीय कमेटी का प्रमुख बनाया गया। इस कमेटी ने रघुराम राजन की देखरेख में आर्थिक सुधारों से जुड़ी रिपोर्ट को पूरा किया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में रहे कौशिक बसु बतौर मुख्य आर्थिक सलाहकार के रूप में काम कर रहे थे।
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रघुराम राजन को 10 अगस्त, 2012 को कौशिक बसु की जगह पर भारत सरकार का मुख्य आर्थिक सलाहाकर बनाया गया। वर्ष 2012-13 के लिए आर्थिक सर्वेक्षण को तैयार करने का काम भी रघुराम राजन ने किया। वर्ष 2013 में 27 फरवरी को रघुराम राजन के नेतृत्व में तैयार किया गया आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया गया।
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6 अगस्त, 2013 को आरबीआई गवर्नर के रूप में रघुराम राजन का नाम की घोषणा की गई। 4 सितंबर, 2013 को देश के 23वें गवर्नर के रूप में रघुराम राजन नए गवर्नर बने। रघुराम राजन देश के सबसे युवा बनने वाले गवर्नरों में से हैं। अभी रघुराम राजन की उम्र 52 वर्ष है।
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रघुराम राजन ने 22वें गवर्नर डी.सुब्बाराव की जगह ली। रघुराम राजन को दो देशों की नागरिकता मिली हुई है। भारत के अलावा वो अमेरिका के भी नागरिक हैं। रघुराम राजन की पत्नी का नाम राधिका पुरी है। राधिका इस समय द यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो द लॉ स्कूल में बतौर लेक्चरर के रूप में कार्यरत हैं। रघुराम राजन ने जब रिजर्व बैंक के गवर्नर का पद संभाला तो एक डॉलर की तुलना में रुपया 68 के स्तर तक पहुंच गया था। साथ ही महंगाई को रोकने के लिए बैंक दरों को संतुलित करने की जिम्मेदारी भी रघुराम राजन के ऊपर थी। छह माह के अपने कार्यकाल के दौरान रघुराम राजन ने कई बार बैंक दरों में बदलाव किया है। इससे महंगाई रोकने में काफी हद तक मदद मिली है।
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आज जब रघुराम राजन अपने 24 महीने यानी दो साल के कार्यकाल को पूरा कर रहे हैं तो देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी रिकॉर्ड स्तर पर बढ़कर 355 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है। जब उन्होंने आरबीआई की कमान संभाली थी तब विदेशी मुद्रा भंडार 274 अरब डॉलर के स्तर पर था। वर्ष 2013 में चालू खाता घाटा 5.7 फीसदी था जो मार्च 2015 आज घटकर 1.52 फीसदी के स्तर पर आ गया है।
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जो रुपया लगातार लुढ़क कर 68 रुपए के स्तर तक पहुंच गया था उससे वापस 58 रुपए तक लाना और चीन की अर्थव्यवस्था में आई तूफानी हलचल के बाद भी आज के समय 66 के स्तर पर बचा कर रखना। कच्चे तेल की कम होती कीमतों ने भी रघुराम राजन का खूब साथ दिया। पर राजन इससे पहले ही भारत में निवेश की नीतियों में परिवर्तन कर एनआरआई लोगों के जरिये 32 अरब डॉलर का निवेश करवा चुके थे। इतना विदेशी निवेश आने पर भारतीय मुद्रा को स्थिर करने में बड़ी कामयाबी मिली।
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रघुराम राजन ने जब 23वें गवर्नर के रूप में कार्यभार संभाला तो रुपया अपने निचले स्तर की तरफ लुढ़कता चला जा रहा था। इसी को देखते हुए राजन ने आरबीआई की अपनी पहली ही समीक्षा में पॉलिसी दरों में बढ़ोत्तरी कर दी। इस निर्णय के बाद उन्होंने कहा "कुछ निर्णय जो मैं करूंगा वो पसंद नहीं किये जाएगें। थोड़ा और प्रैक्टिकल होते हुए उन्होंने कहा कि आरबीआई का गवर्नर होने का मतलब वोट मिलना या फेसबुक लाइक पाना नहीं है।"
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जब रघुराम राजन अपने पद पर आये तो उस समय देश की महंगाई दर 9.80 फीसदी के स्तर पर थी पर आज घटकर आंकड़ों के मुताबिक 3.78 स्तर पर आ गई है। महंगाई दर इतनी काम होने का प्रमुख कारण क्रूड ऑयल की कीमतों में आई 60 फीसदी से भी ज्यादा की गिरावट है। सितम्बर 2013 में क्रूड ऑयल की कीमत 1 बैरेल 114 डॉलर थी जो आज घटकर 42 डॉलर के स्तर पर आ गई है। अगर आने वाले समय में क्रूड ऑयल कीमतों में बढ़ोतरी होती है तो रघुराम राजन को इस परेशानी से भी निपटना होगा क्योंकि इसका सीधा असर महंगाई दर पर होगा।
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रघुराम राजन के अभी तक के कार्यकाल में सरकारी बैंकों में गवर्नेंस को काफी हद तक बढ़ावा दिया जा रहा है। इसका असर अभी से देखने को मिलने लगा है। पी जे नायक की देखरेख में एक समिति का गठन किया गया है। ये समिति बैंकों में गवर्नेंस के मुद्दों का रिव्यु कर रही है। सरकार ने नायक समिति की इस रिपोर्ट को मान लिया है कि सरकारी बैंकों में चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर पदों पर निजी बैंकों के लोगों की भर्ती की जा सके। पर केंद्र सरकार ने नायक समिति के उस प्रस्ताव पर मुहर नही लगाई है जिसके तहत सरकारी बैंकों को ये स्वायत्ता मिल जाए कि जो अपनी हिस्सेदारी को 51 फीसदी से काम कर सकें।
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रघुराम राजन के कार्यकाल में नए बैंकों को लाइसेंस मिलना भी शुरू हो गया है। बंधन बैंक को इसी प्रक्रिया के तहत लाइसेंस दिया गया है। कई दूसरे स्माल फाइनेंस बैंकों को इस महीने के अंत लाइसेंस दे दिए जाएगें। पहली बार ऐसा हो रहा है कि आरबीआई पेमेंट और फाइनेंस में अंतर करके बैंकिंग लाइसेंस दे रहा है।
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ग्राहकों की नजर में रघुराम राजन का कार्यकाल उनकी जेब काटने वाला भी कहा जा सकता है। रघुराम राजन ने बैंकों को इस बात की मंजूरी दे दी कि बैंक एटीएम से तय संख्या से अधिक बार पैसे निकालने के लिए ग्राहकों से शुल्क वसूल किया जाए।
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आरबीआई के आंतरिक ढांचे को और अधिक मजबूत बनाने के लिए पूरे आरबीआई को राजन ने पांच प्रमुख क्लस्टर भागों में बांट दिया है। ये क्लस्टर रेगुलेशन एंड बैंकिंग, सुपरविज़न और रिस्क मैनेजमेंट, मॉनेटरी स्टेबिलिटी, फाइनेंसियल मार्केट और इंफ्रास्ट्रक्चर, ऑपरेशंस और ह्यूमन रिसोर्स हैं।
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रघुराम राजन ने बड़े मौके पर आर्थिक जगत को आड़े हाथ लेने कभी भी देर नही की है। अगस्त 2015 में एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा "इकॉनमी के लिए आरबीआई चीयरलीडर का काम नहीं कर सकता है, उसका काम ये करना नहीं है। स्टॉक मार्केट और सेंसेक्स को के सेंटीमेंट्स को ध्यान आरबीआई काम नहीं करता है।
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फरवरी, 2015 को रघुराम राजन ने कहा अपीलेट राज को खत्म करने के लिए लाइसेंस परमिट राज से नहीं बच सकते हैं।
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दिसंबर 2014 में भारत राम मेमोरियल लेक्चर, में प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी की मेक इन इंडिया योजना पर प्रहार करते हुए कहा कि जब निर्यात आधारित ग्रोथ को पाना चाहते हैं जैसा की चीन ने किया था वही पर हम खतरे में आ जाते हैं। मुझे नहीं लगता की हमे उस तरफ अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। मेक इन इंडिया की जगह पर मेक फॉर इंडिया पर ध्यान लगाएं तो अच्छा रहेगा।
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25 नवंबर 2014 को गुजरात के इरमा में आयोजित तीसरे डॉ. वर्गीज कुरियन मेमोरियल लेक्चर में रघुराम राजन ने जानबूझकर डिफॉल्ट करने वाले और कॉर्पोरेट जगत के ठेकेदारों पर सीधे हमला कर दिया। उन्होंने कहा कि समय आ गया है कि ऐसे लोगों के प्रति माइंड सेट चेंज किया जाए। ऐसे लोगों को इंडस्ट्री का कप्तान बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता हैं। ऐसे लोग देश के मेहनतकश लोगों के ऊपर बोझ हैं।
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मुंबई में आयोजित स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के बैंकिंग कॉन्क्लेव में जब आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने एसबीआई चेयरपर्सन अरुधंति भट्टाचार्य से कहा कि नॉन परफार्मिंग असेस्ट वाले खाते के लोगों भी लोन दिया जाना चाहिए जिससे रुके हुए प्रोजेक्ट को पूरा किया जा सके। तब अरुधंति भट्टाचार्य ने जवाब दिया कि ऐसा करने पर हमें कोई इंसेंटिव नहीं मिलता है। इस तरह से आरबीआई गवर्नर की बात को उन्होंने वही पर खत्म कर दिया। आरबीआई गवर्नर भी पूर्व में एनपीए को लेकर अपना रोष जाहिर कर चुके थे। ऐसे भी भले ही सामने न पर पीछे से उनकी भी इस पर सहमति थी।
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भले ही भारत में करोड़ों की संख्या में युवा रह रहे हैं। पर पिछले दिनों रघुराम राजन ने देश के टैलेंट को लेकर बात उठा दी। उन्होंने साफ-साफ शब्दों में कहा, "देश में अच्छे अर्थशास्त्रियों की कमी हैं जिसकी वजह से नीतियां बनाने में दिक्कत का सामना करना पड़ता है। उन्होंने इस बात पर चिंता जताते हुए कहा कि देश को बहुत अच्छे इकोनॉमिस्ट की जरूरत है। हर दिन अपने काम में देखता हूं दिल्ली, मुंबई और पूरे देश में। हमने पूरी की पूरी अर्थशास्त्रियों की पीढ़ी खो दी है। यह बात राजन ने मेघनाद देसाई अकादमी ऑफ़ इकोनॉमिक्स को शुरू किये जाने के मौके पर कही थी।
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ऐसे समय में जब आरबीआई गवर्नर और केंद्र सरकार के बीच आपसी मतभेद की खबरें आ रही हो और उसी समय जब कोई रघुराम राजन को इकॉनमी का नोबेल पुरस्कार देने की बात कह दे तो चर्चा मचना लाजमी है। द ग्लूम, बूम एंड डूम रिपोर्ट के संपादक और प्रकाशक मार्क फाबेर ने रघुराम राजन को उनके कार्यों के लिए इकॉनमी का नोबेल पुरस्कार देने का समर्थन किया है। मार्क फाबेर का मानना है कि रघुराम राजन वो आदमी हैं जो केंद्रीय बैंकिंग को अच्छी तरह समझता है। उनका यहां तक मानना है पूरी दुनिया में प्रोफेसर्स के भीड़ में वो अकेले ऐसे आदमी हैं जिसकी मौद्रिक नीतियों पर अच्छी पकड़ और वो जानते हैं कि क्या कर सकते हैं और क्या नही कर सकते हैं।
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जून 2015 में आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने लंदन बिजनेस स्कूल के एक कार्यक्रम में कहा कि अगर भारत बहुत तेजी से भी अर्थव्यवस्था को बढ़ाता है फिर भी चीन को पीछे छोड़ने में भारत को लंबा सफर तय करना पड़ेगा। वर्ल्ड बैंक के डाटा के अनुसार अमेरिका की अर्थव्यवस्था 17 ट्रिलियन डॉलर, चीन की 10 ट्रिलियन और भारत की 2 ट्रिलियन डॉलर है।
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अगस्त 2015 में चीन के बाजारों में आई भारी गिरावट से पूरी दुनिया भर में आर्थिक संकट का एक दौर आ गया है। 24 अगस्त 2015 को गिरे दुनिया भर के बाजार अभी तक संभल नहीं पाये हैं। 28 जून 2015 को ही रघुराम राजन ने पूरी दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों को चेता दिया था कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के हालात वर्ष 1930 में आए ग्रेट डिप्रेशन जैसे ही हैं। गौरतलब है कि वर्ष 2007 में भी रघुराम राजन ने सबसे पहले वैश्विक मंदी आने की बात को लेकर अपना पेपर पढ़ा था। इसके बाद ही वर्ष 2008 पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी आ आ गई थी। इसलिए भी राजन की बातों को वैश्विक स्तर पर लोगों का साथ मिलता है।
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20 अगस्त, 2015 को देश भर में ऊंची-ऊंची कीमतों पर मकान बेचने वाले बिल्डर्स को भी रघुराम राजन ने सलाह दी थी कि इतनी बड़ी संख्या में जो घर नहीं बिक रहे हैं, उनकी कीमतें घटाई जानी चाहिए। कीमतें कम होने से लोग अधिक संख्या में मकान खरीदने के लिए आगे आएगें। उन्होंने बिल्डरों को साफ-साफ सन्देश दे दिया कि बार-बार होम लोन की दर कम करने की मांग से अच्छा है कि पहले मकान की कीमतें घटाई जाएं।