सैन्य दिवस पर पढ़िए अदम्य साहस की 21 गाथाएं। ये उन 21 सूरमाओं की कहानी है, जिन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया है। इनमें 20 भारतीय सेना के जवान हैं, जबकि एक वायुसेना के।
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आर्मी डे: अदम्य साहस की 21 परम-वीर गाथाएं
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मेजर सोमनाथ शर्मा देश के पहले परमवीर चक्र विजेता थे। नवंबर, 1947 में कश्मीर में पाकिस्तानी सैनिकों और कबायलियों के हमला किया था। उस वक्त श्रीनगर एयरपोर्ट से उन घुसपैठियों को बाहर निकालने में मेजर शर्मा ने अदम्य साहस का परिचय दिया। उन्हें परणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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नायक जदुनाथ सिंह 1947 में कश्मीर में पाकिस्तान कबायलियों के खिलाफ जंग में शामिल रहे। उन्हें भी मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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मेजर राम राघोबा राणे कर्नाटक के थे, 1947 में कश्मीर में पाकिस्तान कबायलियों के खिलाफ जंग में इन्होंने भी अदम्य साहस का परिचय दिया था।
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कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह को भी 1947 में कश्मीर में पाकिस्तान कबायलियों के खिलाफ जंग में अदम्य साहस का परिचय देने के लिए परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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सुबेदार व मानद कैप्टन करम सिंह को भी 1947 में कश्मीर में पाकिस्तान कबायलियों के खिलाफ जंग में अदम्य साहस का परिचय देने के लिए परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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कैप्टन गुरुबचन सिंह सलेरिया को 1961 में परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। उन्हें कांगो में एक सैन्य मिशन में अदम्य साहस का परिचय देने के लिए ये पुरस्कार मरणोपरांत दिया गया।
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लेफ्टिनेंट कर्नल धन सिंह थापा को 1962 के भारत-चीन युद्घ में अदम्य साहस का परिचय देने के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। चीन ने जब भारत पर हमला किया था, तब वे लद्दाख में अग्रिम चौकी पर तैनात थे।
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सुबेदार जोगिंदर सिंह को 1962 के भारत-चीन युद्घ में अदम्य साहस का परिचय देने के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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मेजर शैतान सिंह भाटी को भारत चीन युद्घ में 17,000 फीट पर तैनात एक टुकड़ी का साहसपूर्ण नेतृत्व करने के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद को 1965 में पाकिस्तान के खिलाफ हुई जंग में शौर्य का अद्भुत परिचय देने के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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लेफ्टिनेंट कर्नल आर्देशिर बुर्जोरजी तारापोर को 1965 में पाकिस्तान के खिलाफ हुई जंग में अदम्य साहस का परिचय दिया था। उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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लांस नायक अल्बर्ट एक्का को 1971 में भारत और पाकिस्तान के युद्घ में वीरता का परिचय देने के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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फ्लाइंग ऑफिसर निमरत सिंह जी शेखों एयरफोर्स के अधिकारी थे। 1971 की जंग में पाकिस्तानी एयरफोर्स ने श्रीनगर एयरबेस पर हमला कर दिया था, उस वक्त निमरत सिंह शेखों ने अकेले ही उस एयरबेस की सुरक्षा की थी।
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सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल को 1971 की जंग में अदम्य साहस का परिचय देने के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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कर्नल होशियार सिंह दहिया को भी 1971 की जंग में वीरता का अद्भुत परिचय देने के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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सुबेदार मेजर व मानद कैप्टन बाना सिंह को 1987 में परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। नायब सुबेदार के रूप में उन्होंने उस टीम का नेतृत्व किया था, जिसने सियाचीन को पाकिस्तान से छीन लिया।
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मेजर रामास्वामी परमेश्वरम को 1987 में परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। वे श्रीलंका में भारत की ओर से भेजी गई शंति सेना के शामिल थे और आतंकियों के हमले का साहसपूर्वक सामना करते हुए मारे गए।
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कैप्टन मनोज कुमार पांडेय को 1999 में पाकिस्तानी घुसपैठियों की खिलाफ हुई कारगिल की जंग में अदम्य साहस का परिचय देने के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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सुबेदार योगेंद्र यादव सिंह यादव को 1999 में हुई कारगिल की जंग के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। उन्हें मात्र 19 साल की उम्र में ही ये सम्मान दिया गया था। परमवीर चक्र पाने वाले सबसे नौजवान सैनिक वही हैं।
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रायफलमैन संजय कुमार को कारगिल की जंग के बाद परमवीर चक्र दिया गया। उन्हें मस्कोह घाटी की एक चोटी का फतह करने का जिम्मा सौंपा गया था, जिसे उन्होंने साहसपूर्वक निभाया।
कैप्टन विक्रम बत्रा को कारगिल की जंग के बाद मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था। पाकिस्तान सेना उन्हें अपनी बातचीत में शेरशाह कहती थी, उन्हें भी एक चोटी को फतह करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उन्होंने सफलतापूर्वक उस मिशन को अंजाम दिया था।