कोलकाता में शुक्रवार को नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़े कई दस्तावेज़ सार्वजनिक किए गए। बीबीसी संवाददाता अमिताभ भट्टासाली ने बताया कि राज्य सरकार ने 64 फ़ाइलें सार्वजनिक की हैं। इन फ़ाइलों में 12 हज़ार से अधिक पन्ने हैं। अधिकतर फ़ाइलें बोस और उनके परिवार पर खुफ़िया अधिकारियों की रिपोर्ट्स हैं। इन फ़ाइलों में भारत की आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद के दस्तावेज़ शामिल हैं।
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खुफिया फाइलों से खुलेगा बोस की मौत का अहम राज, तस्वीरें
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इन फ़ाइलों को पुलिस संग्रहालय में रखा गया है। वहाँ मौजूद बोस के रिश्तेदारों ने आरोप लगाया कि पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, विधानचंद्र रॉय और सिद्धार्थ शंकर रॉय ने मिलकर कई अहम सबूत नष्ट किए, जिनसे 1945 की हवाई दुर्घटना के बाद बोस के बारे में जानकारी मिल सकती थी।
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नेताजी के रिश्तेदारों का ये भी कहना है कि इन दस्तावेज़ों में ऐसे सबूत हैं जिनसे संकेत मिलता है कि बोस की मृत्यु हवाई दुर्घटना में नहीं हुई थी और वह कम से कम 1964 तक ज़िंदा थे। उन्होंने मांग की कि प्रधानमंत्री कार्यालय के क़ब्जे में रखी गई ऐसी ही 100 से अधिक फ़ाइलों को बिना किसी देरी के सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि नेताजी की रहस्यमयी मौत से पर्दा उठ सके।
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उधर, नेताजी पर किताब लिख चुके अनुज धर ने बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत में कहा, "नेताजी से जुड़े जो सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ हैं वो तो केंद्र सरकार के पास हैं।"
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वो कहते हैं, "हालांकि पश्चिम बंगाल और ओडिशा सरकार के पास भी कई दस्तावेज हैं, लेकिन उनसे कोई बहुत बड़ी जानकारी मिलने की उम्मीद नहीं है।"
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अनुज का मानना है कि सार्वजनिक की गई फ़ाइलों से मुख्य तौर पर तीन तरह की जानकारियां मिलने की उम्मीद है।
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पहली, नेताजी के जो करीबी या रिश्तेदार थे उनकी जासूसी करवाई गई थी या नहीं। दूसरा, ये कि जासूसी की जानकारियों को ब्रिटेन की ख़ुफ़िया एजेंसियों समेत किस-किस से साझा किया गया था।
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तीसरा, शॉलमारी साधू जिनके बारे में 60 के दशक में यह दावा किया जाता रहा था कि वही नेताजी हैं, उनसे जुड़ी फ़ाइलें हो सकती हैं। अनुज का कहना है कि इसके साथ ही जवाहरलाल नेहरू और पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री विधान चंद्र रॉय के बीच हुई बातचीत के भी दस्तावेज़ सार्वजनिक किए जा सकते हैं।