मोहर्रम की दस तारीख को यौमे आशूरा कहा जाता है। मोहर्रम हिजरी कैलेंडर का पहला महीना है। इसी महीने से नया हिजरी साल शुरू होता है।
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हाय हुसैन! मोहर्रम का मातम...
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मोहर्रम की दस तारीख से इस्लामी इतिहास की बहुत सी महत्वपूर्ण घटनाएं जुड़ी हैं। इसीलिए इस महीने का मुसलमान बहुत आदर करते हैं।
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इस महीने की दस तारीख यानी यौमे आशूरा को ईशदूत आदम अलैहिस्सलाम की तौबा कुबूल हुई थी।
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दिल्ली में शिया मुसलिम महिलाएं आशूरा के दिन मातम मनाती हुईं। इस दिन हजरत हुसैन की मौत पर मातम मनाते हुए खुद को कोसा जाता है।
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आशूरा पर शिया मुसलिम पुरुष शोक मनाते हुए। इस दौरान वे खुद को सजा देते हुए दुख प्रकट करते हैं।
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माना जाता है कि आशूरे के दिन यानी 10 मुहर्रम को एक ऐसी घटना हुई थी, जिसका विश्व इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है।
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इराक स्थित कर्बला में हुई यह घटना दरअसल सत्य के लिए जान न्योछावर कर देने की जिंदा मिसाल है। इस घटना में हजरत मुहम्मद के नवासे (नाती) हजरत हुसैन को शहीद कर दिया गया था।
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हजरत हुसैन इराक के शहर करबला में यजीद की फौज से लड़ते हुए शहीद हुए थे।
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मोहर्रम की दस तारीख को अधिकतर मुसलमान रोजा रखते हैं।
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मातम में पुरुष जलते हुए अंगारों पर भी चलते हैं और धारदार कोड़े से अपने शरीर वार करते हैं।
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गम मनाने के दौरान अधिकतर महिलाएं पूरी तरह काले लिबाज में नजर आती हैं।
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आशूरा के दिन ताजिए को बड़े जुलूस के साथ मातम मनाते हुए शिया मुसलिम करबला तक लेकर जाते हैं।
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जुलूस में इमाम हसन और हुसैन की याद में उनके नारे लगाए जाते हैं।
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देश की विभिन्न जगहों पर आशूरा के दिन अलग-अलग तरह से मातम मनाया जाता है।