मैनपुरी क्षेत्र के कुड़रिया समान निवासी शहीद गया प्रसाद की अंतिम यात्रा 18 वर्ष में पूरी हुई। सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के आने पर शव का अंतिम संस्कार किया गया। पुत्र सतीश ने शहीद को मुखाग्नि दी।
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इसके साथ ही उनकी यह अंतिम यात्रा पूरी हो गई। इस दौरान सेना के अधिकारियों के अलावा हजारों की संख्या में मौजूद लोगों ने उन्हें अंतिम विदाई दी।
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यूपी में मैनपुरी के गांव कुड़रिया में बुधवार की रात अन्य रातों से बिल्कुल जुदा थी। लोगों की आंखों में न नींद थी और न दिल में शांति।
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शहीद गया प्रसाद के बुजुर्ग पिता गजाधर सिंह घर के बाहर लोगों से घिर बैठे थे। उन्होंने बताया कि बेटे ने 1982 में फौज में नौकरी शुरू की थी और नवंबर 1996 में सियाचिन में पोस्टिंग हुई थी।
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बुधवार रात 11.05 बजे सेना के जवान शहीद गयाप्रसाद का शव लेकर गांव पहुंचे।
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शव देख परिवारीजनों की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली।
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1984 में पाकिस्तान सियाचिन ग्लेशियर में कुछ क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था। पाकिस्तानी सेना को इस क्षेत्र से पीछे धकेलने के लिए वापस क्षेत्र पर भारतीय कब्जा करने के लिए आपरेशन मेघदूत चलाया था। इसी दौरान 1996 में गश्त पर निकले सैनिक गयाप्रसाद ग्लेशियर की दरार में समा गए थे।
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लगभग एक सप्ताह पहले सियाचिन में सेना के जवानों की एक टुकड़ी रुटीन गश्त पर थी। इस दौरान ग्लेशियर पर बर्फ के बाहर एक हाथ निकला दिखाई दिया। सेना के जवानों ने शव को बाहर निकाला तो उसकी पहचान गयाप्रसाद के रूप में हुई।
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18 साल पहले मिला जख्म वक्त के साथ धीरे धीरे भर गया था। गया प्रसाद की पत्नी रामादेवी ने उनकी जिम्मेदारी को परिवारीजनों के सहयोग निभाया और बेटे बेटियों की शादी की। अब जो हुआ उसकी तो किसी को भी उम्मीद नहीं थी।
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सुबह पौ फटते ही बड़ी संख्या में लोग शहीद के दर्शन करने के लिए पहुंचने लगे। दस बजे तक हजारों की संख्या में लोग दर्शन कर गांव में मौजूद थे।
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बिग्रेडियर सलीम आसिफ और कर्नल टीकेएस सेकुल के आने के बाद शवयात्रा शुरू हुई। सेना की विशेष टुकड़ी के जवान ताबूत लेकर अंतिम संस्कार वाले स्थान तक पहुंचे।
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वहां सेना के अधिकारियों और जवानों ने शहीद को श्रद्धांजलि दी। जवानों ने शास्त्र उलटे कर सलामी दी। इस दौरान सेना के बैंड के सदस्यों ने मातमी धुन बजाई।
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शहीद के बेटे सतीश ने 10.55 मिनट पर मुखाग्नि दी। इस दौरान जबरदस्त गरमी के बाद भी हजारों की संख्या में लोग मौके पर आसपास स्थित मकानों की छत पर मौजूद रहे। इनमें विभिन्न जनप्रतिनिधियों के अलावा पूर्व सैनिक और विभिन्न संगठनों के सदस्य भी शामिल थे।
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शहीद गयाप्रसाद की अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए रिश्तेदारों और गांव वालों के अलावा आसपास के गांवों के भी लोग हजारों की संख्या में शामिल हुए। अंतिम संस्कार के समय आलम यह था कि खेतों में दूर-दूर तक लोग ही नजर आ रहे थे।
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शहीद गयाप्रसाद के शव को अंतिम सलामी देने के लिए सेना की पांच टुकड़ियां और कई अन्य स्थानों से अधिकारी आए।
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18 वर्ष के बाद शहीद गयाप्रसाद के अंतिम दर्शन पत्नी रामादेवी ने कर लिए। ग्रामीण कह रहे थे कि गजाधर की बहू रामादेवी को शहीद पति का शव जवानी में नहीं बल्कि बुढ़ापे में देखने को मिला। इस दौरान घर की बहू पहले सास और अब दादी बन गई है। 18 वर्ष में शहीद गयाप्रसाद के पुत्र सतीश के भी एक बेटा और दो बेटी हो गई।
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बिग्रेडियर सलीम आसिफ ने गया प्रसाद के परिवारीजनों से मिलकर उन्हें मिलने वाली सुविधाओं के बारे में पूछा। परिवारीजनों ने बताया कि उन्हें अभी तक मिलिट्री कैंटीन का कार्ड नहीं मिला है। उन्होंने कहा कि आदेश कर दिए गए हैं। सेना की ओर से दी जाने वाली सभी सुविधाएं शीघ्र ही उन्हें मिलनी शुरू हो जाएंगी।