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कुंभ मेला: पहले शाही स्नान में हजारों ने लगाई आस्था की डुबकी

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उसके बाद निरंजनी और आनंद अखाड़े के साधु महंतों ने कुशावर्त में स्नान किया।

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कुंभ मेला: पहले शाही स्नान में हजारों ने लगाई आस्था की डुबकी

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महाराष्ट्र के नासिक में चल रहे सिंहस्थ कुंभ के पहले ‘शाही स्नान’ के मौके पर शनिवार को विभिन्न अखाड़ों के महंतों समेत हजारों श्रद्धालुओं ने गोदावरी नदी के घाटों पर पवित्र डुबकी लगाई। नासिक के त्र्यंबकेश्वर के कुशावर्त में जूना, अग्नि, आवाहन अखाड़े के महामंडलेश्वर और साधु-महंतो ने ब्रह्म मुहूर्त में तड़के 4.16 बजे शाही स्नान किया।
ब्यूरो/अमर उजाला, मुबंई।
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कुंभ मेला: पहले शाही स्नान में हजारों ने लगाई आस्था की डुबकी

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पवित्र स्नान के बाद साधु-संतों ने त्र्यंबकेश्वर मंदिर में पूजन किया।

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अखाड़ों के साधु-महंतो के स्नान के बाद सुबह 10 बजे कुशावर्त आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया।
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इसी तरह नासिक के रामकुंड में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत ज्ञानदास महाराज ने सुबह 7.15 बजे पहली डुबकी लगाई।
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उनके साथ निर्वाणी अखाड़ा के साधु-संतो ने शाही स्नान किया। इसके बाद दिगंबर अखाड़े ने अपने महंत कृष्णदास के नेतृत्व में स्नान किया।
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निर्मोही अखाड़े के साधु-संतो के शाही स्नान के बाद खालसे ने भी पवित्र गोदावरी में डुबकी लगाई।

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वैष्णव अखाड़े के साधु-संतों का शाही जुलूस तपोवन के लक्ष्मीनारायण मंदिर से शुरू हुआ और रामकुंड तक गया। फूल-मालाओं से लदे साधु-संतो की शाही सवारी में वाहन के अलावा घोडे़ और ऊंट भी शामिल थे।

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नासिक में सिंहस्थ कुंभ का पहला शाही स्नान हुआ। लेकिन, सीताकुंड में महिला साधुओं को जगह नहीं मिली। इससे नाराज साध्वी त्रिकाल भवंता ने कुंभ स्नान का बहिष्कार किया। साध्वी ने सीताकुंड मेंअलग स्नान की व्यवस्था के साथ ही महिला साध्वियों के लिए अलग अखाड़े को मान्यता देने की मांग की थी, लेकिन उनकी एक भी मांग पूरी नहीं हुई।

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साध्वी त्रिकाल भवंता ने सीताकुंड में महिला साध्वियों के लिए अलग स्नान का समय मांगा था लेकिन जिला प्रशासन ने इसे नामंजूर कर दिया। उन्होंने कोर्ट में भी याचिका दाखिल की लेकिन अदालत ने मामले को आपस में हल करने का फैसला दिया।
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इसके साथ ही जिला न्यायालय ने इस मामले को मीडिएशन कोर्ट के सुपुर्द कर दिया जहां सोमवार को सुनवाई होनी है। इस बारे में मेला अधिकारी रघुनाथ गावंडे ने कहा कि महिला साध्वियों के लिए अलग से स्नान का समय निश्चित करने से सारी योजना बिगड़ सकती थी। इसलिए साध्वियों की मांग पूरी नहीं की जा सकी।
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