फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

भारत-बांग्लादेश के इस पुराने रिश्ते के पीछे है एक 'महायोद्धा' की कहानी

विज्ञापन
1 of 17
भारत और बांग्लादेश मोदी और शेख हसीना के नेतृत्व में दोस्ती और सहयोग की नई ईबारत लिख रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कौन था वो आदमी जिसके दम पर पाकिस्तान से अलग होकर नया मुल्क बना बांग्लादेश। वो व्यक्ति थे भारतीय सेना के जनरल 'सैम बहादुर' यानि जनरल एसएचएफ मानेकशॉ। जिनके नेतृत्व में भारत ने दुनिया का भूगोल बदलते हुए पाकिस्तान के पूर्वी हिस्से को काटकर अलग मुल्क की इबारत लिख दी। आइए हम आपको बताते हैं सैम मानेकशा से सैम बहादुर और पूर्वी पाकिस्तान से बांग्लादेश बनने के किस्से के बारे में।
विज्ञापन

द्वितीय विश्व युद्ध में सात गोलियां खाकर भी जिंदा थे 'सैम बहादुर'

2 of 17
करीब 46 साल पहले भारत ने पूर्वी पाकिस्तान पर हमला कर उसे जनरल याहया खान के जुल्मों से मुक्ति दिलाई थी। जिसके बाद नए मुल्क बांग्लादेश का जन्म हुआ। कहा जाता है कि ये दुनिया का अकेला युद्ध था जिसमें एक दिन में 93 हजार सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया था। इस युद्ध के असली हीरो थे जनरल सैम मानेकशा। जिन्हें इस युद्ध में उनके अदम्य साहस और सूझबूझ के लिए देश के पहले फील्ड मार्शल की उपाधि दी गई थी। द्वितीय विश्व युद्ध के अलावा चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध में हिस्सा ले चुके मानेकशा को उनकी बहादुरी और सूझबूझ के कारण 1969 में उस समय भारतीय सेना का अध्यक्ष बनाया गया था जब चीन युद्ध में हार के बाद सेना का हौसला टूटा हुआ था।
विज्ञापन

द्वितीय विश्व युद्ध में सात गोलियां खाकर भी जिंदा थे 'सैम बहादुर'

3 of 17
सैम मानेकशा का पूरा नाम सैम होर्मूसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ था। मानेकशा का जन्म 3 अप्रैल 1914 को अमृतसर में एक पारसी परिवार में हुआ था। उनका परिवार गुजरात के शहर वलसाड से पंजाब आ गया था। मानेकशा ने प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर में पाई, बाद में वे नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में दाखिल हो गए। वे देहरादून के इंडियन मिलिट्री एकेडमी के पहले बैच के लिए चुने गए 40 छात्रों में से एक थे।

द्वितीय विश्व युद्ध में सात गोलियां खाकर भी जिंदा थे 'सैम बहादुर'

4 of 17
सेना के सबसे चर्चित जनरल रहे मानेकशा के बारे में ढेरों किस्से प्रचलित हैं। जिनमें एक ये भी है कि 17वी इंफेंट्री डिवीजन में तैनात मानेकशा को एक युवा अधिकारी के रूप में द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए बर्मा के मोर्चे पर भेजा गया। वहां फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट के कैप्टन के तौर पर बर्मा अभियान के दौरान सेतांग नदी के तट पर जापानियों से लोहा लेते हुए वे गम्भीर रूप से घायल हो गए थे।
विज्ञापन

द्वितीय विश्व युद्ध में सात गोलियां खाकर भी जिंदा थे 'सैम बहादुर'

5 of 17
उन्हें सात गोलियां लगी थी। गंभीर हालत में उनका अर्दली एक गोरखा जवान उन्हें अपने कंधे पर डालकर ही बेस कैंप तक पहुंचा और डॉक्‍टर से उनके इलाज का आग्रह किया। लेकिन सैम की गंभीर हालत देख डॉक्टर ने उनका इलाज करने से ही मना कर दिया। डॉक्टर का तर्क था कि सैम की जान बचने की गुंजाइश कम है इसलिए इनके बजाय किसी दूसरे मरीज पर ध्यान दिया जाए। यह देख गोरखा ने डाक्टर पर रायफल तान दी और गुर्राया ".....मेरे साब का हुक्म है जब तक जान बाकी है तब तक लडो। अगर तुमने इनका इलाज नहीं किया तो मैं तुम्हे गोली मार दूंगा।" जान जाती देख डॉक्टर ने सैम का इलाज शुरू किया और आश्चर्यजनक रूप से उनकी जान बच गई।
विज्ञापन

द्वितीय विश्व युद्ध में सात गोलियां खाकर भी जिंदा थे 'सैम बहादुर'

6 of 17
ऐसा ही एक प्रचलित किस्सा है, चीन युद्ध में हार के बाद भारतीय जवानों का हौसला बढ़ाने के लिए वह पूर्वी मोर्चे पर पहुंचे। वहां उन्होंने मोर्चे पर मौजूद अग्रिम पंक्ति के जवान से निगाहें मिलाकर कहा कि ''याद रखना तुम उस आदेश तक यहां से पीछे नहीं हटोगे जब तक तुम्हे ऐसा करने के लिए नहीं कहा जाए'' यह कहकर मानेकशा मुडे और ‌पीछे से आवाज लगाकर उस जवान से कहा, ''याद रखना वो आर्डर तुम्हारे लिए कभी नहीं आएगा।''
विज्ञापन

द्वितीय विश्व युद्ध में सात गोलियां खाकर भी जिंदा थे 'सैम बहादुर'

7 of 17
निडर स्वभाव के मानेकशा खुलकर अपनी बात कहने वालों में से थे। उन्होंने एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को 'मैडम' कहने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि यह संबोधन 'एक खास वर्ग' के लिए होता है। मानेकशा ने कहा कि वह उन्हे प्रधानमंत्री ही कहेंगे। चीन युद्ध के बाद जब सैम को चौ‌थी कौर का कमांडर बनाया गया तब कमान हाथ में लेने के पांच दिन बाद पं. नेहरू तेजपुर के सेना मुख्यालय में आए। उनके साथ श्रीमती इंदिरा गांधी तथा थल सेना अध्यक्ष जनरल चौधरी भी थे।

द्वितीय विश्व युद्ध में सात गोलियां खाकर भी जिंदा थे 'सैम बहादुर'

8 of 17
 
मानेकशा ने उन्हें बताया कि उनके जवान अब पूरे मोर्चे पर आगे बढ़ रहे हैं। यह सुनते ही नेहरू उखड़ गए और बोले- "उन्हें रोको, मैं अब अधिक लोगों को युद्ध में नहीं मरवाना चाहता।" जनरल चौधरी प्रधानमंत्री को यह कहकर समझाने की कोशिश करने लगे वे सेना को रोकने का आदेश दे देंगे। यह सुनकर मानेकशा से नहीं रहा गया। जनरल चौधरी से उन्होंने कहा- "सर, या तो मुझे मेरे हिसाब से काम करने दीजिए अन्यथा मुझे और कहीं भेज दीजिए।" 7 जून 1969 को सैम मानेकशॉ ने जनरल कुमारमंगलम के बाद भारत के 8वें चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ का पद ग्रहण किया था।

द्वितीय विश्व युद्ध में सात गोलियां खाकर भी जिंदा थे 'सैम बहादुर'

9 of 17
ऐसा ही एक किस्सा ये भी है कि एक बार एक वरिष्ठ नौकरशाह दिल्‍ली में सेना के अधिकारियों की मीटिंग ले रहे थे। इस दौरान कमरे की खिड़की खुली होने के कारण बाहर से तेज आवाज अंदर आ रही थी। यह देख उस नौकरशाह ने वहां बैठे एक कर्नल से कहा, 'ए मिस्टर खिड़की बंद कर दीजिए'। इसी दौरान कक्ष में सेनाध्यक्ष मानेकशा की एंट्री होती है और उनके कानों तक अधिकारी का यह हुक्म पहुंच जाता है। इस पर मानेकशा अपनी कुर्सी छोड़ चुके कर्नल को वापस बैठने का इशारा करते हैं और उस नौकरशाह से मुखातिब होते हुए कहते हैं कि 'मिस्टर सेक्रेटरी वह मिस्टर नहीं मेरी सेना का अधिकारी है।'

द्वितीय विश्व युद्ध में सात गोलियां खाकर भी जिंदा थे 'सैम बहादुर'

10 of 17
मानेकशा के सेनाध्यक्ष बनने के बाद भारतीय सेना के स्तर में जबरदस्त सुधार हुआ। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जो पूर्व में मानेकशा की काबिलियत देख चुकी थी ने उन्हें पाकिस्तान से युद्ध की जिम्मेदारी दी गई। इसको लेकर भी एक चर्चित किस्सा है। पूर्वी पाकिस्तान में जनरल याहया खान के बढ़ते जुल्मों की दास्तां सुनकर इंद‌िरा गांधी काफी बेचैन ‌थीं वे चाहती थी कि पाकिस्तान पर तुरंत हमला किया जाए।

द्वितीय विश्व युद्ध में सात गोलियां खाकर भी जिंदा थे 'सैम बहादुर'

11 of 17
इसलिए उन्होंने 1971 में जब जनरल याहया खान के जुल्म से तड़फते पूर्वी पाकिस्तान पर हमला करने की प्लानिंग की तो इसका सबसे पहला जिक्र तत्कालीन सेनाध्यक्ष मानेकशा से ही किया। कैबिनेट की मीटिंग में इंदिरा ने मानेकशा को बुलाया और उनसे कहा कि वह पूर्वी पाकिस्तान पर हमले की तैयारी करें। बेलौस मानेकशा ने तपाक से जवाब दिया कि क्या आप युद्ध हारना चाहती हैं। उनके इस जवाब से इंदिरा स्‍तब्‍ध रह गईं।

द्वितीय विश्व युद्ध में सात गोलियां खाकर भी जिंदा थे 'सैम बहादुर'

12 of 17
इंदिरा को मानेकशा से ऐसे जवाब की उम्‍मीद नहीं थी। इंदिरा ने कहा नहीं, तब मानेकशा बोले मुझे युद्ध के लिए कुछ दिन का समय चाहिए। मैं अभी इसके लिए तैयार नहीं हूं। एक इंटरव्यू में मानेकशा ने बताया कि वह युद्ध के लिए तैयारियां करना चाहते थे। इंदिरा ने उन्हें एक महीने का वक्त दिया। जिसके बाद उन्होंने अपने सैनिकों को प्रशि‌क्षित करना शुरू किया और सीमा पर तैयारियां शुरू कर दीं।

द्वितीय विश्व युद्ध में सात गोलियां खाकर भी जिंदा थे 'सैम बहादुर'

13 of 17
इसके बाद जो हुआ वो इतिहास बन गया। भारत ने पूरी तैयारी के साथ भारत ने तीन दिसंबर को पाकिस्तान के पूर्वी हिस्से पर हमला किया। मानेकशा की कुशल रणनीति के सामने पाकिस्तानी सेना ने 13 दिनों में ही घुटने टेक दिए। पाक सेना के 93 हजार जवानों ने लेफ्टिनेंट जनरल एए कियानी के नेतृत्व में पूर्वी कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इस जीत के बाद अरोडा और मानेकशा दोनों हीरो बने गए।

द्वितीय विश्व युद्ध में सात गोलियां खाकर भी जिंदा थे 'सैम बहादुर'

14 of 17
भारत की इस बड़ी जीत ने इंदिरा गांधी को दुनियाभर में एक मजबूत नेता के तौर पर तो स्‍थापित किया ही मानेकशा को भी विशिष्ट दर्जा मिल गया। इस जीत के बाद इंदिरा इतनी उत्साहित थीं कि मानेकशा को उन्होंने सैम बहादुर कहकर संबोधित किया। मानेकशा से मिलते ही इंदिरा ने कहा, "सैम यू डन इट"।

द्वितीय विश्व युद्ध में सात गोलियां खाकर भी जिंदा थे 'सैम बहादुर'

15 of 17
उनके अदम्य साहस के लिए साल 1972 में उन्हें पदम विभूषण की उपाधि से सम्मानित किया गया। जबकि एक साल बाद ही उन्हें देश के पहले फील्ड मार्शल की उपाधि से सम्मानित किया गया। सैम का नाम आज भी सेना में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है।

द्वितीय विश्व युद्ध में सात गोलियां खाकर भी जिंदा थे 'सैम बहादुर'

16 of 17
1937 में एक सार्वजनिक समारोह के लिए लाहौर गए सैम की मुलाकात सिल्लो बोडे से हुई। दो साल की यह दोस्ती 22 अप्रैल 1939 को विवाह में बदल गई। जिनसे उन्हें दो बेटियां शैरी और मैरी हुईं। सैम के बारे में कहा जाता है कि वो जितने सख्त जनरल थे उतने ही हंसमुख और मजाकिया इंसान भी ‌थे। इस  बारे में उनकी बेटी शैरी अक्सर बतातीं हैं कि डैड घर में होते थे तो हम लोग यह सोचकर परेशान रहते थे कि वो अब क्या करने लगें। उन्हें हर समय मजाक सूझता रहता था। शैरी बताती हैं कि वो जब घर में घुसते तो मैं जोर से चिल्लाती "डैड इनफ"।
विज्ञापन

द्वितीय विश्व युद्ध में सात गोलियां खाकर भी जिंदा थे 'सैम बहादुर'

17 of 17
1973 में सेना प्रमुख के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वे वेलिंगटन में बस गए थे। वृद्धावस्था में उन्हें फेफड़े संबंधी बिमारी हो गई थी और वे कोमा में चले गए थे। उनकी मृत्यु वेलिंगटन के सैन्य अस्पताल के आईसीयू में साल 2008 में हुई।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें