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चेन्नई बाढ़ की तस्वीरें: क्योंकि पानी पर धारा 144 नहीं लगती...

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हम में से जिस किसी के संबंधी चेन्नई में रहते हैं उनकी उँगलियां फोन पर चल-चल के घिस रही हैं। हमारे प्रियजन पानी में कितनी देर से फँसे होंगे? क्या खा रहे होंगे? राहत उन तक पहुँची होगी या नहीं? बचाव के बाद कहाँ जा कर आश्रय लेंगे? न जाने कितने लोग बाहर से चेन्नई अपने घर पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं, चाहे फिर उन्हें हजारों रुपए तक में मिल रहे हवाई टिकट ही क्यों न लेने पड़ें। हमारी एअरलाइन कंपनियां आपदा को भी मुनाफे में बदल रही हैं। इस आपदा को एक और तरीके से भी देख सकते हैं। आमतौर पर चेन्नई पानी की किल्लत की वजह से सर्खियों में रहता है। (सोपान जोशी/बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए)
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हमारे हर बड़े शहर की तरह ही चेन्नई को भी दूर के इलाकों का पानी छीन लेने की गंदी आदत है। कई वर्षों की योजना के बाद 1996 में आंध्र प्रदेश से कृष्णा नदी के पानी को 177 किलोमीटर चेन्नई लाया गया। वहाँ के किसानों ने विरोध किया तो चेन्नई के नेताओं ने अनशन तक किया। लेकिन कृष्णा से आया पानी चेन्नई की प्यास बुझा नहीं पाया। फिर 2004 में वीरानम तालाब का पानी वहां 230 किलोमीटर दूर चेन्नई की सेवा में भेजा गया। वीरानम जलाशय कोई एक हजार साल पहले चोल राजाओं ने सिंचाई के लिए बनवाया था।  ये तालाब छह महीने सूखा रहता है, सो चेन्नई के खर्चे पर उसके तल में 45 बोरवेल ड़ाले गए।
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वहाँ का भूजल गिरता गया, किसान विरोध करते गए, पर उनकी एक न चली।  बल्कि अगले ही साल मुख्यमंत्री जयललिता ने इस परियोजना का दूसरा चरण भी प्रस्तुत कर दिया। इस बार मामला हाईकोर्ट पहुँच गया।  इस लूट के दूसरे चरण पर रोक लग गई है। यहां के किसानों की आँखों के आगे से उनका पानी एक पाइपलाइन के जरिये दूर चेन्नई जाता रहा है। अगर वे चेन्नई को एक लुटेरे नगर की तरह देखते हैं तो उसमें कोई अचरज नहीं होना चाहिए। जब उनके कुएं और ट्यूबवेल सूख जाते हैं और उन्हें एक के बाद दूसरी फसल सूखती हुई दिखती है तो उनके मन में चेन्नई और उसमें रहने वाले ताकतवर लोगों के प्रति आशीर्वाद तो नहीं ही निकलता होगा।

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तो क्या चेन्नई की बाढ़ को मजबूर, तरसते किसानों का श्राप नहीं कहा जा सकता? कोई पूछ सकता है- जब किसी शहर में इतनी तेज बारिश हो तो उसका क्या कसूर?इतनी तेज बारिश और ऊपर से बाँधों से छोड़ा पानी अगर किसी शहर में आ जाए तो फिर इसमें शहर की क्या गलती है? पिछले कुछ दिनों की बारिश ने रिकॉर्ड़ तोड़ दिए हैं।  ऐसे में लोग पूछना भूल जाते हैं कि यह रिकॉर्ड़ कितना पुराना है।  1901 में भी कुछ इस तरह की बारिश हुई थी। आँकड़े तो एक अलग कहानी बताते हैं।  हर दशक में कम से कम एक बार तो तमिलनाड़ु के इस इलाके में तेज बरसात होती है। प्रचंड बारिश के सालों की कड़ी तो देखिए 1969, 1976, 1985, 1996, 1998, 2005 और फिर 2015। 1976 में चेन्नई की अड़यार नदी अपना किनारा लाँघ रिहाइशी इलाकों में बहने लगी थी।
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इन सालों में इतनी बर्बादी इसलिए नहीं हुई थी क्योंकि चेन्नई (तब उसे मद्रास के नाम से जाना जाता था) अपने जल स्रोतों को पूरी तरह से भूला नहीं था। अड़यार और कूअम नदियों में पानी रहा करता था, केवल मैला पानी नहीं।  पूंदी, रेड़हिल्स और चोलावरम के जलाशय इतनी आसानी से सूखा नहीं करते थे। पहाड़ी शृंखलाओं की आड़ में आने वाला तमिलनाड़ु का यह इलाका दक्षिण-पश्चिम मानसून से बचा रह जाता है। यहाँ बरसात लौटते मानसून के दौरान, चौमासा बीत जाने के बाद होती है, नवंबर और दिसंबर में।  चेन्नई पूर्वी घाट की हल्की ढ़लान के अंत में, समुद्र के छोर पर बसा है। पूर्वी घाट की ढ़लान पर तालाब बनाने की प्राचीन परंपरा रही है। बरसात कम हो या ज्यादा, इस इलाके के लोग अपने नगर और गाँव, पानी के हिसाब से बनाते रहे हैं। वरना यहाँ इतने शक्तिशाली राज्य और इतनी पुरानी सभ्यता कैसे पनप सकती थी?
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-आज जिसे सभ्यता और विकास कहा जाता है वह अपने भूगोल, अपनी परंपरा की अवहेलना से ही चलता है। नगर दूसरों का पानी छीन कर लाने की ताकत रखते हैं, इसलिए अपने जल स्रोत पाट कर उन पर भवन बना देते हैं। जमीन की कीमत पानी से ज्यादा होती है।  लेकिन जब बरसात थोड़ी बढ़ जाती है तो पानी अपना पुराना रास्ता ढ़ूँढ़ता है।  उसे अपने रास्ते में भवन मिलते हैं। पानी पर कोई धारा 144 नहीं लगती। वह ढ़ाल देख कर, गुरुत्वाकर्षण के हिसाब से चलता है। और जब वह अपनी चाल पर आता है तो दूसरों का पानी लूटने वाले ताकतवर नगरों का उथलापन उजागर हो जाता है।
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हमारे हर नगर के हर ताकतवर समाज को आगे-पीछे इस पानीदार सच्चाई का सामना करना पड़ेगा। इसका एकमात्र समाधान है अपने जल स्रोतों की देखभाल करना, उनका सम्मान करना।  उन्हें केवल मैला पानी बहाने वाले सीवर न बनने देना। कुछ दिनों में चेन्नई की बाढ़ और इससे निकली मुश्किलें आई-गई हो जाएंगी।  फिर चेन्नई के विकास की भूख वापस आ जाएगी। लेकिन जब तक गर्मी के सूखे में हमारे शहर पानी का ठीक इंतजाम करना नहीं सीखेंगे तब तक इस तरह की आपदाएं लौट-लौट कर आती रहेंगी। चेन्नई की बाढ़ में फँसे लोगों के प्रति उमड़ती संवेदना का एक हिस्सा उन किसानों को भी जाना चाहिए जिनके हिस्से का पानी लूट कर यह अपनी प्यास बुझाता रहा है। (पर्यावरण और विज्ञान के पत्रकार सोपान जोशी दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान से जुड़े हैं। )
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