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आठ बातें जो मोदी नेहरू से सीख सकते हैं

Sat, 14 Nov 2015 01:47 PM IST
रशीद किदवई/ राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
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योग्यता, नजरिया और नीति में नेहरू-मोदी भले ही अलग दिखें, लेकिन लोकप्रियता का ग्राफ दोनों ने छुआ। कुछ बातें हैं जो मोदी नेहरू से सीख सकते हैं।
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आठ बातें जो मोदी नेहरू से सीख सकते हैं

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नेहरू की सूझबूझ का लोहा पश्चिम, अरब, अफ्रीका, सुदूर पूर्व के देश और यहां तक कि कम्युनिस्ट देश मानते थे। कॉमनवेल्थ, बैंडुंग कॉनफ्रेंस, गुटनिरपेक्ष देशों के साथ जाने की नेहरू की व्यवहारिकता ने भारत को वैश्विक पटल पर एक ऊंचाई दी। वहीं मोदी में भी विदेशी नीति की पहलकदमी को लेकर एक उमंग है। मसलन चीन, रूस, अमरीका और कई विकासशील देशों को भारत में कारोबार के लिए आकर्षित करने के लिए और कुशल होने की जरूरत है। (रशीद किदवई का विश्लेषण)
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आठ बातें जो मोदी नेहरू से सीख सकते हैं

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नेहरू की तरह ही उन्हें अपनी कूटनीति के लिए साउथ ब्लॉक के मदारियों पर ही पूरी तरह निर्भर होने की जरूरत नहीं है। भारतीय सिनेमा, बिजनेस, आर्ट, खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों में काफी संभावनाएं हैं। नेहरू ने पृथ्वीराज कपूर को एक सांस्कृतिक अभियान पर दक्षिणपूर्व एशिइयाई देशों में भेजा था। मोदी चाहें तो मध्यपूर्व के देशों, अमेरिका और अन्य जगहों पर काफी लोकप्रिय शाहरुख खान को 'सांस्कृतिक डिप्लोमेसी' बढ़ाने का जरिया बना सकते है।

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राज्यों के पुनर्गठन को लेकर नेहरू ने पहली बार जस्टिस फजल अली के नेतृत्व में एक आयोग का गठन किया था। तेलंगाना बनाए जाने को लेकर जो खूनखराबा हुआ उसे देखते हुए इस बात की बहुत सख्त जरूरत है कि ऐसा ही एक दूसरा आयोग बनाया जाए ताकि गोरखालैंड, विदर्भ, हरित प्रदेश, बुंदेलखंड आदि को राज्य बनाने की मांगों को निपटाया जा सके।
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नेहरू ने पहली बार हिंदू कोड बिल में संशोधन की बात आगे बढ़ाई थी, जिसके बाद बहुत विवाद खड़ा हुआ। समाज में सुधार के उद्देश्य से लाया गया यह बिल पास तो हुआ लेकिन नेहरू को काफी पीछे हटना पड़ा। मोदी के पास यह मौका है कि वो लैंगिक गैरबराबरी, विरासत से संबंधित निष्पक्ष कानून, बाल कल्याण आदि विषयों पर देश का ध्यान आकर्षित कर सकें। वो चाहं संसद में बहस से पहले अपने घोषणापत्रों में इन बातों को शामिल कर सकते हैं।
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कुछ हद तक सभी समाजों में अंधविश्वास पाया जाता है। ब्रिटिश लोगों के एक तबके का मानना है कि जब भी किसी खेल आयोजन में प्रधानमंत्री जाते हैं तो ब्रिटेन हार जाता है। ऐसा कुछ मौकों पर हुआ ही है जैसे विम्बलडन और ओलंपिक में। लेकिन भारतीय संदर्भ में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने का क्षेत्र ऐसा है जहां मोदी नेहरू से काफी कुछ सीख सकते हैं। नेहरू चाहते थे कि सभी भारतीयों में वैज्ञानिक सोच, खुले विचार, सच्चाई के प्रति सम्मान, तार्किकता आदि का प्रसार हो।
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प्रयोगशाला वाली कक्षाओं में भी छात्रों के सिर पर संभावित परिणाम पाने का भूत सवार होता है, बजाय इसके कि बदलावों के प्रति खुले दिमाग से विचार करने के। इसका सबसे बुरा उदाहरण है इतिहास को पढ़ाते समय गैर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना। इतिहास की टेक्स्ट बुक इस तरह लिखी जाती हैं जिससे किसी की भावना आहत न हो जाए। टीपू सुल्तान और अन्य नायकों और खलनायकों की विरासत पर लड़ाई इसी की एक बानगी है। छात्रों को एक बिल्कुल अलग नजरिए से पढ़ाने की जरूरत है।

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जनता और राजनीतिक वर्ग पर नेहरू की इतना मजबूत पकड़ थी जब 1955 की गर्मियों में भारत रत्न की उपाधि के लिए नेहरू का नाम आगे किया गया तो कोई विवाद नहीं पैदा हुआ। राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के रिश्ते नेहरू से बहुत अच्छे नहीं थे क्योंकि कई मुद्दों पर उनके आपस में मतभेद थे। लेकिन उन्होंने नेहरू को यह उपाधि देने के लिए पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली ये मानते हुए कि सभी उनका समर्थन जरूर करेंगे।
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नेहरू ने मतभेद रखने वाले काबिल नेताओं को भी अपनी कैबिनेट में जगह दी। आरएसएस से जुड़े श्यामाप्रसाद मुखर्जी, अम्बेडकर और बलदेव सिंह को मंत्री बनाया और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी। मोदी के सामने भी एक मौका है कि वो भिन्न विचार रखने वाले योग्य लोगों को अपने साथ लेकर चलें।
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