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बीफ खाने से होता है पर्यावरण को भारी नुकसान, जानिए कैसे

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बीफ खाने को लेकर देश भर में बेचैनी है और सभी तरह के नेता सांडों की तरह भिड़ रहे हैं। धार्मिक मत तो एक पक्ष है लेकिन बीफ न खाने को लेकर बहुत मजबूत पर्यावरणीय वजहें भी हैं। संयुक्त राष्ट्र के पर्वायवरण कार्यक्रम ने बीफ को 'जलवायु के लिए नुक़सानदेह गोश्त' बताया है। बीफ के हर ग्राम को पकाने के लिए बहुत सारी ऊर्जा खर्च होती है। औसतन हर एक हमबर्गर को बनाने में वातावरण में तीन किलो कार्बन उत्सर्जन होता है।
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बीफ खाने से होता है पर्यावरण को भारी नुकसान, जानिए कैसे

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आज अपने ग्रह को बचाने के लिए ऐसे खाने की जरूरत है जो लंबे समय तक नुकसान न दे और दुर्भाग्य से गोश्त का उत्पादन बहुत ऊर्जा खाने वाली प्रक्रिया है। विज्ञान के क्षेत्र के जाने माने लेखक पल्लव बागला ने एक लेख में कहा है कि रोम में संयुक्त राष्ट्र इकाई फूड एंड एग्रीकल्चर संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक गोश्त खाने वाले और खासकर बीफ खाने वाले दुनिया के पर्यावरण के प्रति सबसे कम दोस्ताना हैं।
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यह अचरज की बात लग सकती है लेकिन दुनिया में बीफ उत्पादन जलवायु परिवर्तन की एक मुख्य वजह है। कुछ तो यह भी कहते हैं कि बीफ गोश्त उत्पादन उद्योग का 'शैतान' है। लेकिन यह भी कह दें कि बीफ खाने के संदेह में एक आदमी की पीट-पीटकर हत्या को किसी भी समाज में सही नहीं ठहराया जा सकता। विशेषज्ञों का कहना है कि बीफ छोड़ देने से दुनिया का कार्बन उत्सर्जन कारों के इस्तेमाल के मुक़ाबले कई गुना कम हो जाएगा!

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अगर आप आंकड़ों पर नजर डालें तो समझ आ जाएगा कि क्यों मवेशी उत्पादन का हिस्सा गैसों के उत्सर्जन के जरिये ग्लोबल वॉर्मिंग में परिवहन क्षेत्र के मुकाबले अधिक है जिससे जलवायु परिवर्तन हो रहा है। एफएओ के अनुसार वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में मवेशी क्षेत्र का हिस्सा 18 फीसदी है जबकि परिवहन क्षेत्र का 15 फीसदी। 'लाइवस्टॉक्स लॉंग शैडोः एनवायरोन्मेंटल इश्यू एंड ऑप्शन' नामक अध्ययन में एफएओ का निष्कर्ष है कि "मवेशी क्षेत्र एक मुख्य कारक है और जलवायु परिवर्तन में इसका हिस्सा परिवहन क्षेत्र से ज़्यादा हिस्सा है।"
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पर्यावरण हितैषी इस बारे में आवाजें उठाने लगे हैं और गोश्त खाने वालों को सोचने को कह रहे हैं। इनमें ताजा नाम जलवायु परिवर्तन पर चर्चा के लिए कुछ हफ‍्ते बाद पेरिस में होने वाले बड़े जलवायु सम्मेलन की करिश्माई फ्रांसीसी राजदूत लॉरेंस तुबिआना का है। उन्होंने कहा, "बड़ी मात्रा में गोश्त खाए जाने से बहुत सारी चीजें नष्ट हो रही हैं (इसके लिए अभियान होना चाहिए) और बहुत ज्‍यादा गोश्त खाने वालों को इसे रोकना चाहिए। कम से कम एक एक दिन तो बिना गोश्त के गुजारो।"
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भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के 2012 के एक अनुमान के अनुसार, भारत में 51.20 करोड़ मवेशी हैं जिनमें से गाय और भैंस मिलकर 11.10 करोड़ हैं।भारत में ज्यादातर जानवरों को मारने के लिए नहीं दूध और जुताई के लिए पाला जाता है। यूएनईपी का अनुमान है कि 2012 में दुनिया में 14.30 अरब मवेशी थे। इसलिए भारतीय निश्चिंत हो सकते हैं कि वह गोश्त के मामले और मवेशियों की संख्या के हिसाब से पर्यावरण हितैषी ही माने जाएंगे। यूएनईपी की 2012 में किए गए एक ऐतिहासिक अध्ययन 'गोश्त उत्पादन की वजह से ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ता उत्सर्जन' के अनुसार एक भारतीय औसतन 12 ग्राम गोश्त रोज खाता है। यह वैश्विक औसत 115 के मुकाबले दस गुना तक कम है। इसकी तुलना में अमरीका प्रति व्यक्ति रोज 322 ग्राम गोश्त के साथ सबसे ऊपर है। चीन में यह मात्रा 160 ग्राम है।
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इस तरह गोश्त खाने वाला एक औसत अमरीकी का भारतीय मांसाहारी आदमी की तुलना में ग्लोबल वॉर्मिंग में रोज़ाना 25 गुना हिस्सा होता है।अमरीका के पशुपालन, दुग्धपालन और मत्स्यपालन विभाग के 2012 के अनुमान के अनुसार, देश में 59 लाख टन गोश्त का उत्पादन हुआ जिसमें पोल्ट्री (ज़्यादातर मुर्गा) का हिस्सा करीब आधा था और बीफ का हिस्सा पांच फीसदी से भी कम था। इसकी तुलना में 2009 में दुनिया में 27।80 लाख टन गोश्त का उत्पादन हुआ जिसका अर्थ यह हुआ कि भारत का दुनिया के कुल गोश्त उत्पादन में हिस्सा सिर्फ़ दो फ़ीसदी था जबकि आबादी दुनिया की 17 फीसदी है। इसमें कोई शक नहीं कि गोश्त में इंसान के सही विकास के लिए जरूरी प्रोटीन और पोषक तत्व होते हैं। लेकिन दूध इसका अच्छा विकल्प है।
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हालांकि दुनिया के सूखे और बंजर इलाकों में स्थानीय लोग मवेशियों को 'सेविंग बैंक' मानते हैं क्योंकि वह मुश्किल मौसम में जान बचाने वाली चीजों में शामिल होते हैं। गोश्त खाना भले ही 'ग्रीन' न हो लेकिन जैसे-जैसे लोग समृद्ध होते जा रहे हैं गोश्त फैशनेबल और समृद्धि का प्रतीक बनता जा रहा है। एफएओ का  अनुमान है कि 2050 तक दुनिया में गोश्त का उपभोग 46 करोड़ टन तक पहुंच जाएगा। दुनिया के पर्यावरण पर नजर रखने वाली संस्था यूएनईपी की सलाह है कि 'जलवायु के लिए कम नुक़सानदेह' गोश्त की तरफ़ बढ़ा जाए। संस्था जोर देकर कहती है कि "स्वस्थ भोजन न सिर्फ व्यक्ति के लिए बल्कि संपूर्ण ग्रह के लिए भी महत्वपूर्ण है।"
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