हवा के संग ऊंची उड़ती पतंगें अब रोमांचित नहीं करतीं। न अब चाचा चौधरी की बातें बच्चों को भाती हैं और न ही पिंकी की शरारतें। कहीं गर्मियों की छुप्पन छुपाई के लिए अब जगह नहीं बची है तो कहीं सांप-सीढ़ी का खेल बच्चों को मजा नहीं दे पा रहा है। कैरम के लिए दिलचस्पी कम हुई तो कंचे ने बरबस ही दम तोड़ दिया। जानिए ऐसे ही खेलों के बारे में जिन्हें अब बच्चे नहीं खेलते।
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ज़रा याद इन्हें भी कर लो, ये खेल जो आपने खेले हैं
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कंचे- कांच की गोलियों से खेला जाने वाला यह खेल कभी लोगों में एक ऐसा रोमांच पैदा करता था जो शायद ही आज के दौर में तीरंदाजी भी मुश्किल से दे पाए। खैर अब ये खेल परंपरागत होकर भी चलन से बाहर हो चला है।
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पतंगबाजी- मकर संक्रांति हो, 26 जनवरी हो या फिर 15 अगस्त पतंगबाजी का खुमार हरदम तारी हुआ करता था। एक तरफ से लंबे कन्नों से बंधी तिरंगा, चांद-तारा जैसी तरह तरह की पतंगे आसमान से बातें किया करती थीं। सामने वाले की पतंग काटना और बाजू वाले की पतंग लूटना बच्चों को खूब भाता था।
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रस्सी कूदना- स्कूल और कॉलेज में पढ़ने वाली किशोरियों के लिए रस्सी कूद एक बेहद रोमांचित खेल हुआ करता था। व्यायाम के तौर पर खेले जाने वाले इस खेल को स्कूल की लड़कियां बड़े टशन के साथ इसे खेला करती थीं, लेकिन अब यह बमुश्किल से दिखा करता है।
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चिड़िया उड़- घर के बड़े बुजुर्गों के साथ टाइम पास का बेहतर खेल माना जाता था, चिड़िया उड़। एकाग्रता और चुश्ती का खेल माना जाने वाला चिड़िया उड़ भी अब बच्चों को कतई नहीं भाता।
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लूड़ो- इस खेल की लोकप्रियता भी एक दौर में चरम पर हुआ करती थी। गर्मियों की छुट्टियों का सबसे उम्दा टाइम पास हुआ करता था लूड़ो। सांप-सीडी और लूडो को कांबो पैक वाला यह खेल ग्रामीण अंचलों से लेकर शहरी क्षेत्रों में भी बड़े चाव के साथ खेला जाता था। मगर अब इसे खेलने में किसी को भी उतना चाव नहीं रह गया है।
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अंताक्षरी- शुरू करो अंताक्षरी लेकर प्रभु का नाम समय बिताने के लिए करना है कुछ काम। इन पंक्तियों के साथ शुरू होने वाली सुरों की महफिल भी अब कम ही सजती है। इसे खेल की दीवानगी भी बच्चों से लेकर बूढ़ों तक में खूब थी, लेकिन अब यह खेल भी अपने वजूद को तलाश रहा है।
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कैरम- बिना कवर के क्वीन नहीं मिलेगी और कवर क्वीन से पहले निकाला तो फाइन। सटीक निशाने और धैर्य वाला यह खेल भी आधुनिकता की भेंट चढ़ चुका हैं। अगर ग्रामीण हिस्सों को छोड़ दें तो शायद ही अब कैरम किसी के घर में दिखता हो। कंप्यूटर और टैबलेट के युग में अब शायद कैरम की जगह नहीं बची है।
ज़रा याद इन्हें भी कर लो, ये खेल जो आपने खेले हैं
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छुपन छुपाई- छुपने के लिए एक ऐसी जगह तलाश करना कि कोई ढूंढ न पाए। ऐसे रोमांचक खेल बचपन में हर किसी ने खेले होंगे। छुप्पन छुपाई का खेल भी एक अद्भुत और यादगार खेल था जो रोमांच के साथ साथ सुखद अहसास भी देता था। मगर यह खेल भी अब युवाओं के खेलों से लगभग नदारत हो चुका है।
कॉमिक्स- चाचा-चौधरी, मोटू और पतलू और पिंकी जैसी कॉम्किस पढ़ने के लिए बच्चे बड़ी बेसब्री से गर्मियों की छुट्टियों का इंतजार किया करते थे। कभी खरीद कर तो कभी किराए पर लेकर पढ़ी जाने वाली कॉमिक्सों का चस्का भी बच्चों को खूब हुआ करता था। मगर अब ये कॉमिक्सें भी गुजरे जमाने की बात हो चुकी हैं।