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सिंहल की जिंदगी से जुड़ी कई बातें जो आप नहीं जानते होंगे

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ओजस्वी वक्ता और हिंदुत्व की पहचान अशोक सिंहल संगीत के भी महान साधक रहे। बुलंद आवाज के धनी सिंहल के गीत राष्ट्र भक्तों के भीतर ऊर्जा का संचार करते रहे। उनके करीबियों को सन् 1970 का वह दिन अब भी याद है जब उनकी ओर से प्रस्तुत वंदेमातरम गीत पर वक्त जैसे ठहर सा गया था।
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उस समय आयोजित विश्व हिंदू सम्मेलन में मौजूद एक लाख स्वयं सेवकों की भीड़ उनके गीतों पर पूरी तरह से मुग्ध हो गई थी। सिर्फ सिंहल की आवाज में वंदेमातरम की गूंज थी और पूरा माहौल राष्ट्र भक्ति से ओत-प्रोत। संगीत के प्रति उनके प्रेम का ही नतीजा था कि सिंहल के गीतों का एक कैसेट भी तैयार किया गया।
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग के प्रोफेसर राजाराम यादव का कहना है, ‘सिंहलजी ने मुझे संगीत सिखाया है। उनके निर्देशन में अनेकों स्वयं सेवकों ने संगीत की साधना की है। मेरे लिए तो वो सब कुछ रहे।’ उन्होंने बताया कि शास्त्रीय संगीत के प्रति अशोक सिंहल की बचपन से ही रुचि रही।

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राष्ट्रीय स्वयं संघ के कई गीतों की लय सिंहल ने ही बनाई है। उनके गाए गीतों का कैसेट भी है, जिसे संघ और विश्व हिंदू परिषद के कार्यक्रमों में सुनाया जाता है। भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ.नरेंद्र कुमार सिंह गौर ने बताया कि पूर्व सर संघचालक डॉ.राजेंद्र सिंह रज्जू भइया और अशोक सिंहल संघ के कार्यक्रमों में गीत प्रस्तुत करते थे। उनकी आवाज स्वयं सेवकों के लिए प्रेरणादायी होती थी। ‘शुद्ध सात्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है’ गीत वह हमेशा गाते थे। ‘चरण कमल पर माता तेरे प्राणों का संगीत न्यौछावर’ गीत भी वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद के कार्यक्रमों में अक्सर गाया करते थे। इन गीतों को उन्होंने खुद के जीवन में भी उतारा।

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विश्व हिन्दू परिषद के पूर्व अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंहल जीवन भर स्वयं को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का समर्पित प्रचारक ही मानते रहे। नब्बे के दशक में जिस वक्त श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन चरम पर था, सिंहल की गरजना से रामभक्तों के हृदय हर्षित हो जाते थे। अशोक सिंहल का जन्म 27 सितंबर 1926 को आगरा में हुआ था। घर में धार्मिक वातावरण के कारण उनके मन में बचपन से ही हिन्दू धर्म के प्रति प्रेम जागृत हो गया। घर पर संन्यासी और धार्मिक विद्वान आते रहते थे। उन्होंने कक्षा नौ में महर्षि दयानंद सरस्वती की जीवनी पढ़ी। उससे उनका देश के हर क्षेत्र में संतों की समृद्ध परम्परा एवं आध्यात्मिक शक्ति से परिचय हुआ।

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1942 में इलाहाबाद में पढ़ते समय प्रोफेसर राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’ ने सिंहल का संपर्क राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से कराया। रज्जू भैया ने सिंहल की मां को संघ के बारे में बताया और संघ की प्रार्थना सुनाई, जिसके बाद मां ने अशोक को शाखा जाने की अनुमति दे दी। 1947 में देश विभाजन के बाद सिंहल ने अपना जीवन संघ कार्य के लिए समर्पित करने का निश्चय कर लिया। 1948 में संघ पर प्रतिबंध लगा तो सिंहल सत्याग्रह कर जेल गए। वहां से आकर उन्होंने बीई अंतिम वर्ष की परीक्षा दी और प्रचारक बन गए। उनकी सर संघचालक गुरुजी से घनिष्ठता रही। यहां उनका संपर्क रामचंद्र तिवारी नाम के विद्वान से हुआ। वेदों के प्रति उनका ज्ञान विलक्षण था।

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सिंहल अपने जीवन में इन दोनों महापुरुषों का प्रभाव स्वीकार करते रहे। 1975 से 1977 तक देश में आपातकाल और संघ पर प्रतिबंध रहा। उस दौरान सिंहल तानाशाही के खिलाफ संघर्ष के लिए लोगों को जुटाते रहे। आपातकाल के बाद वे दिल्ली में प्रांत प्रचारक बने। 1981 में डॉ. कर्णसिंह के नेतृत्व में दिल्ली में हुए विराट हिन्दू सम्मेलन के पीछे शक्ति सिंहल और संघ की थी। इसके बाद सिंहल को विश्व हिन्दू परिषद के काम में लगा दिया गया। इस बीच परिषद के काम में धर्म जागरण, सेवा, संस्कृत, परावर्तन, गोरक्षा आदि अनेक नए आयाम जुड़े। इसमें श्रीराम जन्मभूमि मंदिर आंदोलन सबसे महत्वपूर्ण रहा, जिससे परिषद का काम गांव-गांव तक पहुंचा।

सिंहल की जिंदगी से जुड़ी कई बातें जो आप नहीं जानते होंगे

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इस आंदोलन ने देश की सामाजिक और राजनीतिक दिशा बदल दी। वर्तमान में विश्व हिन्दू परिषद की ख्याति के पीछे सर्वाधिक योगदान सिंहल का ही है। परिषद के काम के विस्तार के लिए इसी वर्ष अगस्त में सिंहल ने इंग्लैंड, हॉलैंड और अमेरिका में प्रवास भी किया। विश्व हिंदू परिषद के संरक्षक अशोक सिंहल को राम जन्म भूमि आंदोलन का जनक भी कहा जाता है। उन्होंने कई मौकों पर इसे परिभाषित किया।

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 1990 में राम जन्म भूमि आंदोलन के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों को रोकने के लिए अयोध्या और उसके आसपास के जिलों में खासी सुरक्षा व्यवस्था कर दी। तगड़ी सुरक्षा व्यवस्था होने के बाद भी सिंहल पुलिस को चकमा देते हुए बाइक से अयोध्या स्थित कारसेवक पुरम पहुंच गए। उनके वहां पहुंचते ही राम जन्म भूमि आंदोलन ने गति पकड़ ली। सिंहल के करीबियों के मुताबिक उनके अयोध्या पहुंचने की कहानी बड़ी ही दिलचस्प है। तत्कालीन मुख्यमंत्री नहीं चाहते थे कि सिंहल अयोध्या पहुंचे। सो उन्होंने वहां तगड़ी घेराबंदी करवा दी थी।

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उधर, सिंहल ने भी ठान लिया था कि वह अयोध्या पहुंचकर ही रहेंगे। अक्तूबर 1990 में वह इलाहाबाद से फैजाबाद जाने वाली सरयू एक्सप्रेस में सवार हुए। पुलिस को सूचना मिली तो समर्थकों संग उन्हें प्रतापगढ़ रेलवे स्टेशन पर उतार लिया गया। सिंहल जिला संघ चालक सियाराम के घर चले गए। वहां रात भर रुके। तड़के वह अपने समर्थकों के साथ तीन बाइकों से सुल्तानपुर के लिए चल दिए। वहां पहुंचने के बाद उन्होंने और समर्थकों ने अपना हुलिया बदल लिया।

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सुल्तानपुर-फैजाबाद बॉर्डर पर पुलिस ने तीनों बाइक  रुकवा लीं लेकिन पुलिस किसी को पहचान नहीं सकी। विहिप के प्रचारक अशोक यादव ने बताया कि सिंहल के साथ मौजूद लोगों ने पुलिस को बताया कि वे एक शादी में जा रहे हैं। सुरक्षा के चलते पुलिस ने सभी को मुख्य मार्ग के बजाय पगडंडी से जाने की सलाह दी। बस फिर क्या था, पगडंडी से होते हुए सिंहल अयोध्या स्थित कारसेवक पुरम पहुंच गए। 30 अक्तूबर को 1990 को अशोक सिंहल कारसेवक पुरम से भारी हुजूम के साथ बाहर निकले तो उन्हें वहां देखकर पुलिस और प्रशासनिक अफसर हक्के-बक्के रह गए।

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भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के अंतर्राष्ट्रीय संरक्षक अशोक सिंहल देश भर के सभी प्रमुख शहरों में वेद विद्यालय की स्थापना करवाना चाह रहे थे। उन्हें इस प्रयास में काफी हद तक सफलता भी मिली। उनके प्रयास से ही 22 वेद विद्यालय खुल गए। इतना ही नहीं, इलाहाबाद के हाशिमपुर रोड स्थित अपने पैतृक आवास ‘महावीर भवन’ का आधा हिस्सा उन्होंने वेद विद्यालय के लिए दान कर दिया। इसमें काफी संख्या में छात्र वेदों का नियमित अध्ययन करते हैं। अशोक सिंहल ने जिन 22 वेद विद्यालयों की स्थापना कराई, उनमें से दो वेद विद्यालय इलाहाबाद में ही हैं। अक्तूबर माह में ही विहिप के केसर भवन स्थित कार्यालय में दूसरा वेद विद्यालय खुला।

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इसके अलावा उन्होंने वाराणसी, हरिद्वार, कानपुर, लखनऊ, असम और जम्मू कश्मीर में भी वेद विद्यालय खुलवाने में अपनी अहम भूमिका निभाई। ‘महावीर भवन’ स्थित वेद विद्यालय की स्थापना के लिए अशोक सिंहल ने अपने आवास की ऊपरी मंजिल दान कर दी। साथ ही विद्यालय के संचालन के लिए बजट भी उपलब्ध कराया। अपने आवास में अरुंधती वशिष्ठ अनुसंधान पीठ की भी स्थापना की, जहां समय-समय पर गोष्ठियां एवं विहिप से जुड़े अन्य कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। अशोक सिंहल के करीबियों का कहना है कि उनका गौ प्रेम भी अटूट था। देश भर में उन्होंने कई गौ शालाएं बनवाईं। समय-समय पर गौ शालाओं के निरीक्षण के लिए भी जाते थे।

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अशोक सिंहल के निर्देश पर ही विहिप के महिला संगठन दुर्गा वाहिनी के जरिये मलिन बस्तियों में रहने वाले बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के लिए समय-समय पर बालवाड़ी का आयोजन कराया जाता है। इलाहाबाद में केसर भवन स्थित विहिप कार्यालय प्रमुख सुनील कुमार का कहना है कि महाराष्ट्र के नागपुर में जो गौ शाला उन्होंने बनवाई थी वहां गौ मूत्र से दवाएं भी बनाई जाती हैं। इसके सेवन से सैकड़ों लोगों को स्वास्थ्य लाभ भी मिला।

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विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के पूर्व अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंहल भले ही इस दुनिया में नहीं लेकिन इलाहाबाद की सांसों में वह हमेशा शामिल रहेंगे। अपने जीवन काल में तमाम महत्वपूर्ण निर्णय उन्होंने इलाहाबाद में ही लिए। इसमें मुख्य रूप से राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े तमाम निर्णय शामिल हैं। सिंहल की वजह से ही राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान इलाहाबाद बड़ा केंद्र बिंदु बनकर उभरा। तब सिंहल विहिप के महासचिव थे। इतना ही नहीं सूबे की तत्कालीन मुलायम सरकार की ओर से कारसेवकों के खिलाफ की गई कार्रवाई के दौरान सिंहल सिर पर ईंट लगने से घायल भी हो गए थे।

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विश्व हिंदू परिषद के पूर्व अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंहल का एकेडमिक करियर भी काफी शानदार रहा। उनके पिता महावीर प्रसाद पेशे से इंजीनियर थे। शायद इसी वजह से अशोक सिंहल ने 1950 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से एमटेक की डिग्री हासिल की। पढ़ाई-लिखाई में वह शुरू से ही मेधावी रहे। संघ से जुड़ने की कहानी भी उनकी बेहद दिलचस्प रही। सात भाई और एक बहन के परिवार में अशोक सिंहल पांचवें नंबर के थे। उनके करीबियों की मानें तो एमटेक करने के बाद उनकी अमेरिका जाने की प्लानिंग थी। अमेरिका जाने से पहले वह एक दिन वाराणसी केलहुरावीर स्थित संघ कार्यालय गए। वहां उनकी मुलाकात नाना जी देशमुख से हुई।

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बाद में अशोक सिंहल संघ के प्रचारक बन गए। वह इमरजेंसी के दौरान गिरफ्तार भी हुए। 1983 में वह विहिप में शामिल हुए। इसके बाद वर्ष 1984 में राम जन्म भूमि आंदोलन की शुरुआत हुई तो उन्होंने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने कई यात्राएं भी निकालीं। इसमें राम जानकी रथ यात्रा प्रमुख रूप से शामिल है। वर्ष 2001 से 2013 तक वह विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। फिलहाल वह संरक्षक का दायित्व बखूबी निभा रहे थे।

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विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय संरक्षक  अशोक सिंहल हाशिमपुर रोड स्थित अपने आवास से महज 200 मीटर की दूरी पर बने भारद्वाज पार्क को हिंदू तीर्थ पर्यटन के रूप में विकसित करना चाहते थे। उनकी इच्छा थी कि इलाहाबाद को लोग संगम के साथ भारद्वाज आश्रम के लिए भी जानें लेकिन जीते-जी उनका यह सपना पूरा न हो सका। भारद्वाज आश्रम के प्रति प्रशासनिक उपेक्षा से वह काफी आहत थे।
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सिंहल ने कहा कि प्रयाग की दो आत्मा हैं। पहला संगम और दूसरा भारद्वाज आश्रम। कुंभ मेले की वजह से संगम तो विश्व विख्यात है लेकिन भारद्वाज आश्रम अब भी उपेक्षा का शिकार है। अगर भारद्वाज आश्रम हिंदू तीर्थ पर्यटन के रूप में विकसित किया जाए तो विश्व पटल में इलाहाबाद सबसे बड़े तीर्थ स्थान के रूप में उभरकर सामने आ सकता है। कहा कि इस बारे में पर्यटन मंत्री से बात करेंगे लेकिन उनकी यह अधूरी ख्वाहिश पूरी न हो सकी।

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