निर्भया के नाबालिग दोषी की रिहाई के बाद केंद्र सरकार पर किशोर न्याय बिल को पास कराने का दबाव बढ़ गया है। मंगलवार को राज्यसभा में बिल पर फैसला हो सकता है। निर्भया के परिजनों ने इसे पास कराने का बीड़ा उठा लिया है। हालांकि संविधान के जानकार बिल के कई प्रावधानों पर सवाल उठा रहे हैं। पढ़िए बिल की 10 महत्वपूर्ण बातें-
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कितना कठोर है नाबालिगों के लिए बन रहा नया कानून, 10 बातें
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ये बिल कानून बनने के बाद जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंडे प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन) एक्ट, 2000 का स्थान लेगा। बिल में प्रावधानों के अनुसार जघन्य अपराध की स्थिति में 16 से 18 साल के किशोर को प्रौढ़ अपराधी मानकर मुमदमा चलेगा।
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बिल में प्रावधान है कि देश के हर जिले में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड और चाइल्ड वेलफेयर कमेटी बनाई जाए।
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जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ये तय करेगा कि नाबालिग अपराधी को रिहैबिलीटेशन के लिए भेजा जाए या प्रौढ़ अपराधी के रूप में मुकदमा चले।
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बच्चों के खिलाफ क्रूरता, उन्हें ड्रग देना, अपहरण या बिक्री के अपराधों सजा का प्रावधान किया गया है।
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विशेषज्ञों की इस मुद्दे पर अलग-अलग राय है कि नाबलिग आरोपियों पर वयस्क आरोपी के रूप में मुकदमा चले या नहीं। कई का कहना है कि मौजूदा कानून पर्याप्त नहीं है, जबकि कई का मानना है कि अपराधियों के प्रति सुधारात्मक रवैया रखने से बार-बार अपराध करने के आशंका खत्म होगी।
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विशेषज्ञों का कहना है कि जघन्य अपराध के दोषी के किशोर पर वयस्क के रूप में मुकदमा चलाने पर संविधा के आर्टिकल 14 और आर्टिकल 21 का उल्लंघन होगा।
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16 से 18 वर्ष का किशोर किसी गंभीर अपराध को करने के बाद अगर 21 वर्ष की उम्र के बाद पकड़ा गया तो उस पर वयस्क के रूप में मुकदमा चलेगा।
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विशेषज्ञों का कहना है कि एक ही अपराध के लिए 21 वर्ष की उम्र के बाद पकड़े जाने पर अलग सजा देना और किशोर उम्र में अलग, आर्टिकिल 20 (1) का उल्लंघन है।
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बच्चों के अधिकारों के लिए बने यूएन कन्वेंशन के मुताबिक, सभी सदस्य देशों को 18 साल से छोटे बच्चों को एक बराबर मानना चाहिए।