मृत्युदंड से बड़ा दंड भी भला हो सकता है क्या? इन खौफनाक तस्वीरों पर गौर करें तो यकीन हो जाएगा।
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फांसी तो बहुत आसान सजा है, इन सजाओं से बचने को मौत मांगते थे लोग
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पूर्वी और दक्षिणी एशिया में नुकीले बांस से यातना देकर लोगों को सजा देने का प्रचलन था। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जापानी सैनिकों ने अमेरिका और उससे संबंध रखने वाले कई सैनिकों को बांस से यातना देकर मौत के घाट उतार दिया था। जापानी अक्सर कैदियों के साथ भी ऐसा ही बर्ताब करते थे।
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इतिहास में ऐसे वाक्ये भी घटे हैं जब जिंदा इंसान की चमड़ी उधेड़कर मारने की सजा दी जाती थी।
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जिंदा दफन करने का आखिरी मामला सन 1937 का है जब जापानी सैनिकों ने चीनी नागरिकों को ताबूत में जिंदा दफन कर मार डाला था।
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15वीं शताब्दी में नुकीले पोल्स पर लोगों को बैठाकर सजा दी जाती थी। एक बार रोमानिया के शासक ने 20 हजार लोगों को इसी तरह की सजा दी। पोल्स से घायल होकर इंसान कुछ दिनों में तड़प-तड़प कर मर जाता था।
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पिरामिड की तरह नुकीले ढांचे पर बैठाकर लोगों को यातना देकर मारने का भी चलन इतिहास में दिखता है।
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चीन में 20वीं शताब्दी तक इंसान के टुकड़े-टुकड़े कर सजा देने का प्रचलन रहा है।
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एक समय तक स्पेन में जिंदा इंसान को नुकीले हथियारों से फाड़कर मार देने की सजा दी जाती थी।
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रोम में जलते हुए कोयले पर लोहे की जाली पर इंसान को जिंदा जलाकर भून डालने की सजा का प्रचलन था।
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शरीर पर भारी बेलन चढ़ाकर शरीर को बेकार कर देने की सजा भारत समेत दुनिया के कई देशों में रही है। कई दफे इस सजा से गुजरने वाले शख्स की मौत तक हो जाती है।
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पुराने समय में पारसी लोग सजा पाए इंसान को जिंदा नंगा और भूखा दो नांव के बीच में बांधकर उसके आंख-कान और निजी अंगों पर दूध और शहद डालते थे ताकि ज्यादा से ज्यादा कीड़े उस पर हमला कर सकें। उसके बाद धूप में उसकी नाव को किसी तालाब में छोड़ दिया जाता था। इस तरह से कई दिनों तक उसको यातना दी जाती थी। इस तरह से यातना देने पर वो शख्स घातक डिहाइड्रेशन और भुखमरी का शिकार हो जाता था और अंत में उस इंसान की तड़प-तड़प कर मौत हो जाती थी।
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खौलती हुई चांदी को आंखों में भरने की सजा भी दी जाती रही है। इसमें इंसान अंधा तो होता ही था, कई बार मौत तक हो जाती थी।
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जहाज की तलहटी में बांधकर मार देने की सजा का भी चलन था।
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चौदहवीं शताब्दी में लकड़ी के एक बड़े पहिए में लोगों को बांध कर उन पर लोहे की रॉड या लकड़ी के डंडे से वार किया जाता था। इस सजा को पाने के बाद 3-4 दिन में उस शख्स की मौत हो जाती थी।
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ग्रीस में कांसे की धातु से बने सांड़ के पेट में सजा पाने वाले को रखा जाता था और उसके नीचे तब तक आग जलती रहती थी जब तक की उस शख्स की चीख और धुआं सांड़ के मुंह से न निकल आता।
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इस सजा को पाने वाले की पीठ पर बाज की तरह निशान बनाया जाता फिर धारदार हथियार से उन जगहों को गोदा जाता था। इसके बाद खाल को खींच दिया जाता था और नमक लगाया जाता था। इसके बाद फेफड़ों को निकाल लिया जाता था और सजा पाने वाला जीते जी मौत के मुंह में समां जाता।
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सन 1531 में किंग हेनरी तृतीय के राज्य के दौरान खौलते हुए तेल, पानी, एसिड या टार में लोगों को उबालकर सजा दी जाती रही, ये सिलसिला 1911 तक चला।