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ऐसी खतरनाक सजाएं कि आप तस्वीरें भी न देख पाएं

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बदला लेना और सजाएं देना पुराने समय से ही चला आ रहा है लेकिन मध्यकालीन दौर में जिस जिस तरह की सजाएं दी जाती थीं वे जान कर आप सिहर जाएंगे। इसके लिए जसि तरह के मशीन व हथियार बनाए गए उन्हें देख कर ही दर्द का अंदाजा लगाया जा सकता है। आगे तस्वीरों में देखिए सालों पहले कैसे होता था मानव पर अत्याचार। 
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ऐसी खतरनाक सजाएं कि आप तस्वीरें भी न देख पाएं

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इसे कहते हैं टब में बैठने की सजा। दोषी को लकड़ी के एक टब में बिठाया जाता था जिसमें सिर्फ उसका सिर बाहर रहता था। फिर जल्लाद उसके चेहरे पर दूध औऱ शहद पोतता था जिसके बाद मक्खियां उसे अपना भोजन बना डालती थीं। दोषी को हर दिन भरपेट खाना भी खिलाया जाता था ताकि वह टब में ही अपना मल छोड़े और उसी में पड़ा रहे। गंदगी मे सड़ रही लाश को कीड़े खा जाते थे।

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यह एक ऐसी बड़ी सी कैंची थी जो दोषियों की जबान काटने के लिए इस्तेमाल की जाती थी। पहले उनका मुंह जबरन खुलवाया जाता था, इस कैंची को उनकी जबान के बीच रखा जाता था औऱ फिर पेंच को कसा जाता था ताकि झट से जबान कट जाए।

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इसे सौ टॉर्चर यानी आरी से किया गया अत्याचार कहते थे। इसमें दोषी के हाथ पैर बांध कर उल्टा लटका दिया जाता था। उल्टा इसलिए ताकि खून सिर की तरफ भागे और वे ज्यादा समय तक अत्याचार सह पाएं। इसके बाद उनके शरीर को आरी से बिलकुल आधा- आधा काट दिया जाता था। कुछ को सिर्फ पेट तक काटा जाता था ताकि उन्हें लंब वक्त तक दर्द सहना पड़े।
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इसे हेरेटिक फॉर्क कहते हैं। अत्याचार करने के लिए इस औजार को मेटल से बनाया जाता था जिसमें दोनो तरफ काटें लगे होते थे औऱ बीच में एक बेल्ट। इसे दोषी के ठुड्डी और गले के बीच में इस तरह लगाया जाता था कि गलती से भी आदमी का सिर लटके और ये कांटे गले के आर पार हो जाएं। सोर्स- लिस्ट25.कॉम।

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ये सीमेंट के जूते थे। इसे अमरीकिन माफिया ने खोजा था जब उसने कई दुश्मनों, जासूसों और धोखेबाजों को मार डाला था। इसके लिए अंगारों के बीच दुश्मन के पैर रखे जाते थे और फिर गीली सीमेंट से भर देते थे। सीमेंट सूखने के बाद पैर भारी हो जाते थे और उस इंसान को जिंदा समंदर में फेंक दिया जाता था। वजन ज्यादा होने से वह पानी में डूब कर मर जाता था।
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इसे कॉफिन टॉर्चर कहते थे। इसमें इंसानों को मेटल से बने कॉफिन के अंदर डाल देते थे, कई बार बड़े और मोटे लोगों को उसके कद काठी से कम के कॉफिन में डालते थे ताकि उन्हें उसके अंदर भी परेशानी महसूस हो। इसके बाद उसे पेड़ से टांग दिया जाता था और कौए उनके शरीर को खा खा कर अपना पेट भरते थे।

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ऐसा नहीं है कि इन अत्याचारों से महिलाएं बच जाती थीं। यह हथियार स्तन फाड़ने के लिए बनाया गया था। लोहे से बने इस हथियार को गर्म कर के महिलाओं के स्तन पर रखा जाता था औऱ जोर से खींच लिया जाता था। हथियार के ये नुकीले पंजे महिलाओं के स्तन का काफी मांस अपने साथ खींच लेते थे।

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इसे आयरन मेडन कहते थे। यह लोहे से बनी एक मूर्ती जैसी थी जिसके अंदर नुकीले तीर से लगे रहते थे। दोषी को इसके अंगर बंद किया जाता था और वह तीरों के डर से जरा भी हिल नहीं पाता था। जैसे ही हिलता था, उसे तीर चुबते थे। बाहर से उससे सवाल पूछे जाते थे और जवाब न देने पर धारदार चीजें भुकाते थे।

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ये अंगूठे और उंगलियां कुचलने के लिए बनाई गई मशीन थी। इसे थंबस्क्रू कहते थे और कुछ तो इतनी बड़ी होती थीं कि घुटने और कुहनियां भी कुचल सकें।  यही नहीं, सिर कुचलने के लिए भी मशीन बनाई गई थी। इसके जरिए दोषियों पर जुर्म कबूल करवाने और सवालों के जवाब देने का दबाव बनाया जाता था।

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यह हथियार मेटल या लकड़ी से बनाया जाता था। इसे दोषी के गले में डाल दिया जाता था। हालत यह हो जाती थी कि वे कई दिनों तक न खाना खा पाते थे न सो पाते थे न आसानी से चल फिर पाते थे और न सिर झुका सकते थे।
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इसे पीतल की बैल की सजा बोलते थे जो मिस्त्र में शुरू हुई थी। पीतल को एक बैल जैसा आकार दिया जाता था जिसमें एक दरवाजा और कुंडी भी होती थी। दोषी को इसके अंदर डालते थे और बैल के नीचे आग लगा दी जाती थी। धीरे-धीरे उसके अंदर पड़ा आदमी चीखते चिल्लाते जल कर मर जाता था। इसे बैल के आकार का इसलिए बनाया जाता था ताकि जब इंसान चिल्लाए तो ऐसी आवाज आए जैसे बैल चीख रहा है।
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