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मनोरोगियों के इलाज के खौफनाक तरीके, तस्वीरें कंपा देंगी रूह

Thu, 19 Nov 2015 01:09 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली
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19वीं सदी से पहले तक दुनिया के कई इलाकों में मनोरोगियों को ऐसे अजीबों-गरीब इलाज से गुजरना पड़ा जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।
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दुनियाभर में पुरातत्व विभाग को खुदाई में ऐसे नर कंकाल मिले हैं, जिनकी खोपड़ी में खास तरह से छेद किया गया था। बताया जाता है कि पुराने समय में मनोचिकित्सकों का मत था कि दिमाग में किसी तरह बुरी आत्माओं ने प्रवेश कर लिया है, जिनको बाहर निकलने में दिक्कत न हो, इसलिए मनोरोगियों की खोपड़ियों में छेद कर दिया जाता था।
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यूरोप में 13वीं सदी में मनोरोगियों को समाज में नहीं रहने दिया गया। उनको विकलांगों और गुनहगारों के साथ रहने का प्रावधान रखा गया। इससे भी विचित्र बात ये हुई कि उन्हें कालकोठरियों में जंजीरों से जकड़कर भी रखा गया।

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भले ही विज्ञान इन बातों को स्वीकार न करें, लेकिन इतिहास को खंगाला जाए तो दुनियाभर में भूत-प्रेत और बुरी आत्माओं से प्रताड़ित लोगों की दास्तानें मिल जाएंगी। यूरोप और अमेरिका तक में मनोरोगियों के इलाज के लिए झाड़-फूंक का सहारा लिया गया।
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मध्य 20वीं शताब्दी तक अगर किसी मनोरोगी का इलाज झाड़-फूंक से नहीं हो पाता था तो उसे सांपों से भरे गड्ढे पर लटका दिया जाता था। ऐसा माना जाता था कि जो बुरी आत्माएं झाड़-फूंक से नहीं जा रही हैं वो जहरीले सांपों से डरकर भाग जाएंगी।
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मानसिक संतुलन बिगड़ने पर बिजली के झटकों से उपचार का प्रावधान हालांकि मौजूदा वक्त में भी है। इसे इलेक्ट्रोकॉन्वल्सिव थेरेपी कहते हैं। लेकिन  19वीं में मनोरोगियों को कहीं ज्यादा पीड़ादायक बिजली के झटकों से गुजरना पड़ता था। इस दौरान मैट्राजोल नामक ड्रग का इस्तेमाल किया जाता था जिसे एफडीए ने साल 1982 में बैन कर दिया।
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मनोरोगियों के इलाज के लिए हाइड्रोथेरेपी यानी जलचिकित्सा का भी इस्तेमाल किया जाता रहा है। इस दौरान कभी रोगी को ममी की तरह ठंडे पानी के तौलिए से पूरा लपेट दिया जाता था तो कभी दिन भर पानी में रखा जाता था। कई बार रोगियों को दीवार के सहारे निर्वस्त्र खड़ा करके उसके ऊपर आग बुझाने वाले यंत्र से गरम और ठंडे पानी की तेज धार मारी जाती थी।

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प्राचीन ग्रीक मनोचिकित्सा में माना जाता था कि मानसिक असंतुलन का संबंध शरीर के भीतर मौजूद पदार्थों के असंतुलन से है। सन 1600 में एक अंग्रेज मनोचिकित्सक थॉमस विलिस ने शरीर से खून के रिसाव और उलटी आदि से मनोरोगियों का इलाज शुरू किया। शरीर से खून के रिसाव के लिए खास यंत्र भी बनाए गए।

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शराब और नशीली दवाओं से भी मनोरोगियों का इलाज किया जाता था रहा है। माना जाता था कि नशे की वजह से रोगी की पुरानी यादें धुंधला जाएंगी। साल 1968 में अमेरिका ने इस तरह के इलाज पर पाबंदी लगा दी।

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यूरोप में यौन कारणों को भी मानसिक असंतुलन की वजह माना गया। ऐसे में मानसिक असंतुलन से गुजर रही औरतों का खतना तक कर दिया जाता था।

सोर्स-द रिचेस्ट
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एक समय तक औरतों को पड़ने वाले हिस्टीरिया के दौरों को भी मनोरोग माना जाता रहा है। जिसके इलाज के लिए मोनचिकित्सक औरतों का कृत्रिम तरीके से ऑर्गेस्म के जरिए इलाज करते थे।
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