इंसान के बच्चे को इंसान ही पाले, ये हमेशा जरूरी नहीं। जानिए उन बच्चों के बारे में जिन्हें इंसानों की नहीं बल्कि जानवरों की परवरिश मिली।
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जानवरों के बीच पले ये बच्चे, हरकतें भी थीं उन्हीं के जैसी
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इस लिस्ट में सबसे पहले नाम आता है ऑक्साना मलाया का। ऑक्साना को साल 1991 में युक्रेन में एक कुत्तों के बीच उनके घर में पाया गया था। तब वो आठ साल की थी। वो कुत्तों की तरह ही चार पैरों पर चलती, भौंकती और अपने जीभ को बाहर निकाले रहती। जांच के बाद पता चला कि वो पिछले छह सालों से कुत्तों के बीच ही रह रही है। उसके माता-पिता शराब के आदी थे और उसे घर को छोड़कर चले गए थे। घिसटते हुए वो बच्ची कुत्तों के बीच पहुंच गई। तभी से वो वहीं की होकर रह गई। इन दिनों वो युक्रेन के ओडीशा के एक क्लिनिक में डॉक्टरों की देख रेख में रहती है। सभी तस्वीरें बीबीसी से।
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अब जानिए भारत के शामदेव की कहानी। शामदेव लगभग चार साल का था जब उसे एक जंगल में पाया गया। वो भेड़ियों के बीच रहता था। उसका व्यवहार एकदम जानवरों सा था। वो पीने के लिए खून ढूंढता था, मिट्टी खाता था और कुत्तों के बीच रहता था। उसने कभी कुछ बोला नहीं, पर साइन लैंग्वेज थोड़ा सीख पाया। उसकी मौत 1985 में हो गई।
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मरीना चैपमैन का किस्सा भी काफी पुराना है। आज की तारीख में वो अपने पति और दो बेटियों के साथ यॉर्कशायर, ब्रिटेन में रहती हैं। उनकी कहानी अजीब है। जब वो पांच साल की थी तब उनका अपहरण हो गया था। 1954 में अपरहरणकर्ताओं ने उन्हें जंगल ले जाकर छोड़ दिया। खोज-बीन के बाद भी उन्हें नहीं ढूंढा जा सका। पांच साल तक वो बच्ची बंदरों के बीच रही। खाना ढूंढने से लेकर जानवरों जैसा ही व्यवहार करने तक सब कुछ उनके अंदर जंगली ही था। वक्त बाद उन्हें शिकारियों के एक समूह ने ढूंढा और उनकी जिंदगी लौटाई।
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जॉन सिबनया की कहानी भी हैरान करने वाली है। जॉन तब काफी छोटे थे जब उन्होंने अपने पिता को अपनी मां का घर में मर्डर करते हुए देख लिया था। ये किस्सा 1988 का है। ऐसा देखते ही वो जंगल में भाग गए थे। कोई उन्हें ढूंढ नहीं पाया। पांच सालों तक वो बंदरों के बीच ही रहे। साल 1991 में उन्हें जब पाया गया तो वो जानवरों सा ही बर्ताव करने लगे थे। लेकिन उन्हें अच्छी जिंदगी में वापस लाया गया।
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रूस की मदीना की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वो जन्म से ही कुत्तों के बीच रह रही हैं। मदीना के जन्म के बाद ही उनके पिता उन्हें छोड़कर चले गए। मां शराब की लती थीं और बच्ची को छोड़कर वो भी चली गईं। जब सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उन्हें 2013 में पाया तो वो निर्वस्त्र थी और कुत्तों की जैसे ही हरकते करती थीं। उन्हें बोलना नहीं आता था। आखिर में उसे मानसिक रोगियों के अस्पताल में ले जाना पड़ा।
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ये कहानी है फिजी के सुजित कुमार की। साल 1978 में उन्हें सड़क के बीचोबीच मुर्गों की तरह बैठे पाया गया। वो अपने हाथों को मुर्गों जैसे फड़फड़ा रहे थे और आवाज भी उन्हीं की तरह निकाल रहे थे। पता चला कि उनके मां ने सुसाइड कर लिया था और पिता का मर्डर कर दिया गया था। ऐसे में उनके दादाजी ने उन्हें घर में मुर्गों के बाड़े में बंद कर दिया था। उन्हें समाज में नहीं आने दिया। जब तक उन्हें पाया गया तब तक वो खुद भी हरकतों से एकदम मुर्गे जैसा हो गए थे।
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इस लिस्ट में एक और नाम शामिल है। रूस के ईवान मिशूकोव। जिनका कोई दोस्त नहीं होता, वो जानवरों में भी अपना दोस्त खोजने की कोशिश कर सकते हैं। ईवान के बचपन से कोई दोस्त नहीं थे। बचपन में ही अकेलेपन में वो घर छोड़कर भाग गए और कुत्तों के बीच रहने लगे। उन्हें खाना खिलाते हुए वो समूह के लीडर जैसे हो गए। लेकिन ऐसा करते हुए खुद भूल गए कि एक इंसान हैं। वक्त बाद उन्हें खोजा गया और उन्हें अनाथालय में ले जाया गया।