दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा का उत्सव देश में बड़े स्तर पर मनाया गया। मथुरा, वृंदावन, नाथद्वारा और देश भर के कृष्ण मंदिरों का यह मुख्य उत्सव रहता है। इस दिन गाय-बैल, बकरी, ऊंट, पशुधन की पूजा की जाती है। वैसे यह पर्व किसानों और गौ पालकों, गौशाला या पशुपालकों द्वारा बड़े उत्साह से मनाया जाता है। लेकिन, कृषि के आधुनिक यंत्र यानी ट्रैक्टरों के बढ़ते इस्तेमाल से देश में बैलों की संख्या भी लगातार घट रही है।
किसान अब आधुनिक हो गया है। फसल बोने के लिए, खेतों की सफाई के लिए बक्खर, खलों में फसल की सफाई और अन्य कार्यों में बैलों का उपयोग बहुत कम हो गया है। अब पशुधन का रखरखाव और देखभाल महंगा हो गया है। साथ की कार्य में समय भी लगता है, इसलिए किसान ने खेती के कार्यों में मशीनों का उपयोग तेज कर दिया है। पहले बैलगाड़ियों से यात्रा होती थी, किसान खेतों से फसल लाने ले जाने या अपने अन्य कार्यों के लिए बैलगाड़ी का प्रयोग करते थे, लेकिन आज बैलगाड़ी अतीत की बात और दुर्लभ हो गई है। बैलगाड़ी की जगह ट्रैक्टरों ने ली है।
गोवर्धन पूजा के दिन पशु तो हैं पर बैलों की संख्या अब बिलकुल कम हो गई है और कुछ स्थानों पर तो बिलकुल भी नहीं है।
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1980 से शुरू हुआ कृषि का मशीनीकरण
भारत में अनादि काल से खेती में बैलों का प्रयोग होता आया है। देश के आजाद होने के बाद फसल उत्पादन और कृषि पर विशेष ध्यान दिया गया। पंचवर्षीय योजनाओ में मंथन कर कई योजनाएं बनाई गईं। 1960 के बाद देश में कृषि उत्पादन बढ़ाने की पहल के तहत 1966 से हरित क्रांति का श्रीगणेश हुआ और फसल उत्पादन वृद्धि की दिशा में प्रयास किए गए। इसके लिए मशीनों के प्रयोग पर जोर दिया गया। हरित क्रांति के बाद कृषि के मशीनीकरण के लिए 1980 के बाद से अधिक प्रयोग हुए। इससे पूर्व काफी पार्ट्स आयात कर ट्रैक्टर असेंबल किए जाते थे। धीरे-धीरे खेतो में ट्रैक्टरों से फसलों की कटाई, बुवाई जैसे कार्य कम समय में ही होने लगे, खेतों से फसलों की ढुलाई भी इनसे ही होने लगी। इस आधुनिकरण से बैलों पर निर्भरता कम होती गई।