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गोवर्धन पूजा पर विशेष: आधुनिकता की भेंट चढ़ रहे गोवंश, लगातार घट रही बैलों की संख्या

सार

किसान अब आधुनिक हो गया है। फसल बोने के लिए,  खेतों की सफाई के लिए बक्खर, खलों में फसल की सफाई और अन्य कार्यों में बैलों का उपयोग बहुत कम हो गया है। अब पशुधन का रखरखाव और देखभाल महंगा हो गया है। साथ की कार्य में समय भी लगता है, इसलिए किसान ने खेती के कार्यों में मशीनों का उपयोग तेज कर दिया है।
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कृषि के आधुनिक यंत्र यानी ट्रैक्टरों के बढ़ते इस्तेमाल से देश में बैलों की संख्या भी लगातार घट रही है। - फोटो : अमर उजाला
दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा का उत्सव देश में बड़े स्तर पर मनाया गया। मथुरा, वृंदावन, नाथद्वारा और देश भर के कृष्ण मंदिरों का यह मुख्य उत्सव रहता है। इस दिन गाय-बैल, बकरी, ऊंट, पशुधन की पूजा की जाती है। वैसे यह पर्व किसानों और गौ पालकों, गौशाला या पशुपालकों द्वारा बड़े उत्साह से मनाया जाता है। लेकिन, कृषि के आधुनिक यंत्र यानी ट्रैक्टरों के बढ़ते इस्तेमाल से देश में बैलों की संख्या भी लगातार घट रही है। 

किसान अब आधुनिक हो गया है। फसल बोने के लिए,  खेतों की सफाई के लिए बक्खर, खलों में फसल की सफाई और अन्य कार्यों में बैलों का उपयोग बहुत कम हो गया है। अब पशुधन का रखरखाव और देखभाल महंगा हो गया है। साथ की कार्य में समय भी लगता है, इसलिए किसान ने खेती के कार्यों में मशीनों का उपयोग तेज कर दिया है। पहले बैलगाड़ियों से यात्रा होती थी, किसान खेतों से फसल लाने ले जाने या अपने अन्य कार्यों के लिए बैलगाड़ी का प्रयोग करते थे, लेकिन आज बैलगाड़ी अतीत की बात और दुर्लभ हो गई है। बैलगाड़ी की जगह ट्रैक्टरों ने ली है।
गोवर्धन पूजा के दिन पशु तो हैं पर बैलों की संख्या अब बिलकुल कम हो गई है और कुछ स्थानों पर तो बिलकुल भी नहीं है।

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1980 से शुरू हुआ कृषि का मशीनीकरण
भारत में अनादि काल से खेती में बैलों का प्रयोग होता आया है। देश के आजाद होने के बाद फसल उत्पादन और कृषि पर विशेष ध्यान दिया गया। पंचवर्षीय योजनाओ में मंथन कर कई योजनाएं बनाई गईं। 1960 के बाद देश में कृषि उत्पादन बढ़ाने की पहल के तहत 1966 से हरित क्रांति का श्रीगणेश हुआ और फसल उत्पादन वृद्धि की दिशा में प्रयास किए गए।  इसके लिए मशीनों के प्रयोग पर जोर दिया गया। हरित क्रांति के बाद कृषि के मशीनीकरण के लिए 1980 के बाद से अधिक प्रयोग हुए। इससे पूर्व काफी पार्ट्स आयात कर ट्रैक्टर असेंबल किए जाते थे। धीरे-धीरे खेतो में ट्रैक्टरों से फसलों की कटाई, बुवाई जैसे कार्य कम समय में ही होने लगे, खेतों से फसलों की ढुलाई भी इनसे ही होने लगी। इस आधुनिकरण से बैलों पर निर्भरता कम होती गई। 

 
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कृषि के आधुनिक यंत्र यानी ट्रैक्टरों के बढ़ते इस्तेमाल से देश में बैलों की संख्या भी लगातार घट रही है। - फोटो : अमर उजाला
प्रदेश में ट्रैक्टरों की स्थिति 
वर्ष 2024-25 में प्रदेश में करीब एक लाख बीस हजार ट्रैक्टरों का विक्रय हुआ। इसमें प्रदेश का शिवपुरी जिला प्रथम था। रायसेन और विदिशा जिला भी अग्रणी रहा।  सड़क परिवहन विभाग द्वारा देश में सर्वाधिक ट्रैक्टर वाले देश के शीर्ष 20 जिलों में प्रदेश के ये तीन जिले सम्मिलित हैं।

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बैलों की जगह ट्रैक्टरों ने ली 
वर्ष 2019 में हुई पशुधन गणना में मध्य प्रदेश में बैलों की संध्या डेढ़ करोड़ से अधिक थी। परंतु यह संख्या अब धीरे -धीरे कम होती जा रही है। उसकी वजह कृषकों का अब ट्रैक्टरों पर अधिक निर्भर होना है। कृषि में बैलों की उपयोग के स्थान पर ट्रैक्टरों के प्रयोग ने गोवर्धन पूजा में बैलों की संख्या सीमित कर दी है। गाय, भैंस तो हैं, पर बैल अब बहुत ही कम रह गए हैं। किसान अब ट्रैक्टरों की पूजा करने लगे हैं। पहले किसान पशु को परिवार का सदस्य समझता था, उनसे एक भावनात्मक रिश्ता रहता था, जो अब मशीनों ने ले लिया है।

इसलिए बढ़ी ट्रैक्टरों पर निर्भरता
इंदौर जिले के डबलचौकी के पास ग्राम दतोदा के रमेश बरोड़ का कहना है कि ट्रैक्टर बैल की अपेक्षा अधिक कार्य करता है। जल्दी और समय पर काम हो जाता है, इसलिए बैलों पर निर्भरता कम हो गई है। ग्राम चौबा पिपल्या के नीलेश और कड़ोला के रंजीत सिंह राजपूत का कहना है कि ट्रैक्टर से कृषि कार्य के साथ अन्य कार्यों में कार्य से आर्थिक आय भी होती है। कृषि में मशीनों के प्रयोग से कार्य सरल और जल्दी होने लगा है।
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