उन्होंने इस हरी रबर की मैट को 'स्टिकी मैट' का नाम दिया। जिसके बाद ब्रिटेन के छात्रों ने जर्मनी से योगा मैट का पहला रबर मैट का सेट खरीदा। जिसके बाद ये ग्रीन मैट या स्टिकी मैट के नाम से मशहूर हुए। कालीनों के नीचे मैट का उपयोग करने का ट्रेंड मर रहा था और कंपनी भी बंद हो रही थी। ऐसे में योग के लिए इन रबर मैट के उपयोग ने इन मैट को पुनर्जीवित कर दिया। बाद में, इसी तरह की नीले मैट जर्मनी में ही बनाए गए। जिसके बाद जर्मनी ही योग मैट का मुख्य निर्माता बन गया था। यद्यपि, यूके, यूरोप और अमेरिका में अयंगर योग चिकित्सकों ने इन योग मैट का उपयोग करना शुरू कर दिया, मुंबई और पुणे के छात्र ऐसा नहीं कर पाए क्योंकि ये मैट फिलहाल भारत में उपलब्ध नहीं थे और उन्हें इसकी आवश्यकता भी नहीं थी। उनके पैर फर्श पर नहीं फिसलते थे। हालांकि, विदेशी छात्र जो स्रोत सीखने के लिए पुणे आए हुए थे उन्होंने अपने मैट वही छोड़ना शुरू कर दिए। जिसके बाद योग मैट के उत्प्रेरकों ने उन्हें अपने संस्थान में रखा।