अस्थमा की बीमारी से जूझ रहे हैं तो भूलकर भी ये 6 चीजें न खाएं। बचाव ही उपाय है, अगर ध्यान नहीं दिया तो बुरा अंजाम भुगतेंगे। जान पर भी बन सकती है। ऐसे में खाने-पीने पर ध्यान देना जरूरी है, डॉक्टर्स भी एहतियात बरतने की सलाह देते हैं।
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योग और स्वास्थ्य
बता दें कि अस्थमा, एक ऐसा रोग है, जिससे अक्सर पीड़ित और उनके परिवार वाले घबरा जाते हैं, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए। यदि समय पर रोग विशेषज्ञ के पास ले जाएं तो अस्थमा का उपचार आसानी से किया जा सकता है। आज अस्थमा लाइलाज बीमारी नहीं रह गई है। रोगियों और उनके परिजनों को बीमारी के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। जानकारी होगी तो आत्मविश्वास के साथ अपना उपचार करवा पाएंगे। वहीं इलाज में देरी और कोई भी लापरवाही, गंभीर परिणाम दे सकती है।
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इसे कहते हैं अस्थमा
अस्थमा फेफड़ों में श्वास नलियों में सिकुड़न का नाम है। श्वास नलियों का काम वातावरण से हवा लेकर फेफड़ों तक पहुंचाना है। इसके साथ ही बहुत सारे धूल के कण भी श्वास नलियों में पहुंच जाते हैं। यही धूल के कण हमारी श्वास नलियों में सूजन पैदा करते हैं और वे काफी अधिक सिकुड़ जाती हैं, जिससे दमा होता है। अस्थमा से न सिर्फ व्यस्क पीड़ित होते हैं, बल्कि बच्चों को भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। यदि बीमारी के प्रति जागरूक रहे तो इस पर आसानी से काबू किया जा सकता है।
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एलर्जी से होती है शुरुआत
अस्थमा की शुरुआत एलर्जी से होती है। कुछ लोगों को मौसम बदलने पर एलर्जी होती है और कुछ को धूल आदि से और कुछ को तो पूरे साल एलर्जी रहती है। यही एलर्जी बाद में दमा के रूप में सामने आती है। दमा के मुख्य लक्षण है कि बार-बार खांसी आना, छाती में घुटन या सांस फूलना आदि। छाती में जोर से आवाज होना। अस्थम अनुवांशिक रोग भी है यानी माता-पिता में से किसी को यह रोग है तो बच्चों को भी इसके होने की संभावना बनी रहती है। अस्थमा, अनुवांशिक और पर्यावरण, दोनों के कारण हो सकता है।
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ऐसे पता चलता है कि अस्थमा है
अस्थमा के लक्षण दिखने पर आपको एक रोग विशेषज्ञ के पास जाना चाहिए और एक साधारण सा टेस्ट करना होता है, जिसे स्पाइरोमैट्री कहते हैं। इससे सांस की रुकावट का पता लगाकर अस्थमा की जानकारी मिलती है। इसका उपचार प्रमुख तौर पर विशेष दवाओं से किया जाता है। वहीं श्वास नलियों में सूजन कम करने की दवाएं भी उपलब्ध हैं, क्योंकि रोग यहीं से बढ़ता है। ऐसे में इनको ठीक करके राहत प्राप्त की जा सकती है। इसके अलावा कुछ मरीजों में पीक फ्लो व लंग्स फंक्शन टेस्ट भी किया जाता है।
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अस्थमा का कारण
पशुओं की त्वचा, बाल व रोंए। घास व पौधों के पराग व धूल के कणों से। सिगरेट के धुएं व वायु प्रदूषण से। ठंडी हवा या मौसमी बदलाव से। पेंट की गंध, परफ्यूम या रूम फ्रेशनर से। भावनात्मक मनोभाव (जैसे रोना या लगातार हंसना) और तनाव से। वंशानुगत कारण। गर्भावस्था में यदि महिला तंबाकू के धुएं के बीच में रहती है, तो उसके बच्चे को अस्थमा हो सकता है।
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ये सावधानी बरतें
दवाएं नियमित रूप से लें। सूखी सफाई यानी झाड़ू से घर की साफ-सफाई से बचें। बेडशीट, सोफा, गद्दे आदि की भी नियमित सफाई करें, खासकर तकिया की क्योंकि इसमें काफी सारे एलर्जी वाले तत्व मौजूद होते हैं। हफ्ते में एक बार चादर और तकिए के कवर बदल लें और दो महीने में पर्दे धो लें। कॉकरोच, चूहे, फफूंद आदि को घर में जमा न होने दें। मौसम के बदलाव के समय एहतियात बरतें। बहुत ठंडे से बहुत गर्म में अचानक नहीं जाएं और न ही बहुत ठंडा या गर्म खाना खाएं। रुटीन ठीक रखें। वक्त पर सोएं, भरपूर नींद लें और तनाव न लें।
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ये कदम भी उठाएं
मरीज को खुद का ध्यान रखने की बेहद जरूरत है। धूल मिट्टी से दूर रहें। घर पर ही रहें। पालतू जानवर से दूर रहे हैं। पालतू कुत्ते को हर हफ्ते नहलाएं। साफ-सफाई का काम न करें। इससे उड़ने वाली धूल परेशान कर सकती है। धूम्रपान बिलकुल न करें। अगर आपके घर में कोई करता है, तो उसे भी इससे दूर रहने के लिए कहें। डाक्टरी सलाह पर रोज व्यायाम करें। अपना इन्हेलर अपने पास रखें। डॉक्टर की सलाह लेने के बाद ही योग या एक्सरसाइज करना शुरू करें।
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क्या नहीं खाना चाहिए
दूध और दूध से बने पदार्थ दमा के साथ नहीं चल सकते। ज्यादातर लोगों में दमा की 60 फीसदी वजह दूध और दूध से बने पदार्थ ही होते हैं। अगर दमा के मरीज दूध और दूध से बने पदार्थों का सेवन करना बंद कर दें तो उनका आधा रोग तो अपने आप ठीक हो सकता है। इसके अलावा केला, कटहल, पकाई हुई चुकंदर न लें। कच्ची चुकंदर ले सकते हैं। मौसमी सेम या फलियां, लोबिया आदि भी नुकसानदायक हैं।
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क्या खाना चाहिए
शहद से शरीर को आवश्यक गर्मी मिलती है। शहद और काली मिर्च गर्म पानी के साथ लेने से अस्थमा ठीक हो सकता है। अगर यही प्रयोग लगातार किया जाए तो अस्थमा से छुटकारा मिल सकता है। नीम के पत्ते को शहद में लपेटकर रोजाना सुबह ले सकते हैं। शहद और भीगी हुई मूंगफली श्वसन नली से बलगम को हटा देती है। तुलसी के कुछ पत्ते शहद और काली मिर्च में भिगोकर चबा लें। इसके अलावा रोजाना योग और प्राणयाम करना चाहिए।
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चार आसन असरकारक
अनुलोम-विलोम में सांस लेने की विधि को दोहराया जाता है। शुरू में इसे तीन मिनट तक और आदत पढ़ने के बाद 10 मिनट तक करना शुरू करें। उत्तानासन में आपको झुक कर खड़ा होना होता है। इससे अस्थमा में आराम तो मिलता ही है, कब्ज आदि की समस्या भी दूर होती है। शवासन सबसे आसान आसनों में से एक माना जाता है। इससे अस्थमा के साथ-साथ तनाव भी दूर होता है। अर्धमत्स्येन्द्रासन से फेफड़ों में आराम से ऑक्सीजन जाती है। दमा रोगियों के लिए यह आसन बहुत फायदेमंद रहता है।
यदि मरीज को सही समय पर रोग विशेषज्ञ के पास ले जाए तो अस्थमा का उपचार किया जा सकता है। मेडिकल जगत में काफी विकास हुआ है और आज अस्थमा कोई लाइलाज रोग नहीं है। - डॉ. एसके गुप्ता, प्यूमोनोलॉजिस्ट, आईवी अस्पताल, पंचकूला