फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बेटों में भी डालिए घरेलू कार्यों की आदत, आगे चलकर फायदे में रहेंगे आप भी और वो भी

Sat, 21 Apr 2018 10:03 AM IST
नाज खान
विज्ञापन
विज्ञापन
अगर किसी बात पर लड़का रोए तो कहा जाता है, ‘लड़कियों की तरह क्यों रो रहे हो?’ किचन से उसे यह कहकर बाहर कर दिया जाता है कि किचन लड़कों के लिए नहीं होता? इस तरह की बातें करके हम खुद बेटा और बेटी में फर्क करते हैं। भारतीय घरों में शायद ही बेटों को कभी खाना बनाना सिखाया जाता हो। घर की साफ-सफाई जैसे छोटे-मोटे कामों से लेकर किचन में काम करने, मेहमानों की आवभगत करने जैसी कोई उम्मीद भी उनसे शायद ही की जाती हो। इसका कारण यही है कि घरेलू कामों को महज लड़कियों से जोड़कर देखा जाता रहा है। कई बार जब कभी बेटे को किसी काम के लिए कहा जाता है, तो घर के बड़े-बुजुर्ग कहने लगते हैं कि लड़का है,
विज्ञापन


लड़कियों वाले काम क्यों करेगा? 
अभिभावकों की ऐसी बातें सुनकर लड़कों को बल मिलता है। उन्हें भी लगने लगता है कि घरेलू काम लड़के नहीं, लड़कियों को करने चाहिए। भले ही यह परंपरा सदियों से चली आ रही हो, लेकिन अब वक्त बदल गया है। अब बेटे आैर बेटियों को एक-सी शिक्षा और परवरिश दी जा रही है, तो घरेलू काम को किसी एक जेंडर से जोड़कर देखना कितना सही है? जरूरी है कि सभी पूर्वाग्रहों को तोड़ते हुए बेटों को भी हर पहलू पर आत्मनिर्भर बनाया जाए। उनमें भी बेटियों की तरह कुकिंग, सिलाई और साफ-सफाई जैसे छोटे-छोटे काम बचपन से ही सिखाने की आदत डाली जाए।
 

पेरेंट्स को समझना होगा कि बेटों का उज्ज्वल भविष्य महज शैक्षणिक या व्यावसायिक सफलता से ही तय नहीं होता, बल्कि असल सफलता का मतलब यह है कि सुकून भरा जीवन बिताते हुए वे आत्मनिर्भर भी हों। इसलिए घर का जितना काम बेटी करती है, उतना ही बेटे से भी करवाना चाहिए, ताकि जब उसे किसी काम के कारण घर से दूर रहना पड़े, तो किसी तरह की मुश्किल न हो। इसी तरह से बेटियों को भी प्रेरित करें कि वे बाहर का काम आत्मविश्वास के साथ कर सकें।
  
किचन सिर्फ लड़कियों की बात नहीं
घरेलू काम में लिंग के आधार पर बंटवारा बच्चों के मन में लिंग-भेद के अंतर को और गहरा कर देता है। वे इस सोच के साथ बड़े होते हैं कि किचन, घर की साफ-सफाई आदि काम लड़कियों का होता है, जबकि घर के बाहर के सभी काम लड़कों की जिम्मेदारी होती है। इस सोच के साथ बड़े होते लड़कों का ही नहीं, लड़कियों का विकास भी प्रभावित होता है। अगर लड़का पारिवारिक वातावरण में लड़कियों या महिला सदस्यों को किसी प्रकार से दबा हुआ देखता है, तो वह भी मन-ही-मन अपने आपको लड़कियों से बेहतर समझने लगता है। उसके मन में यह बैठ जाता है कि लड़कियां कमजोर होती हैं और उन्हें आसानी से टारगेट किया जा सकता है। यह सोच लड़कियों की सुरक्षा और सम्मान के लिए खतरनाक है। 

लड़के को बनाएं आत्मनिर्भर 
अगर आप चाहती हैं कि भविष्य में आपका बेटा घर-बाहर के सभी काम करे और भविष्य में आपका या आपकी बहु का हाथ बंटाए, तो इसकी शुरुआत आपको अपने घर से ही करनी होगी। बेटा और बेटी दोनों को घर-बाहर के कामों में बराबर अवसर दें। चाहे वह काम किचन का ही क्यों न हो? ऐसे समय में जहां महिलाएं और पुरुष दोनों कामकाजी हैं। ऐसे में किसी फन के तौर पर बचपन से ही बेटों में कुकिंग के लिए रुचि पैदा करें। यह समझना होगा कि कुकिंग सीखना बेटों को कम पुरुष नहीं बनाएगा, बल्कि उन लोगों की तुलना में ऐसे लड़के कहीं अधिक आत्मनिर्भर बनते हैं, जो कुकिंग न आने की वजह से अक्सर भूखे रह जाते हैं। अपने बच्चों के साथ किचन में वक्त गुजारें और उनको उत्साहित करें कि वह एन्जॉय करते हुए कुछ स्वदिष्ट व्यंजन भी बनाएं। ऐसे में आप कल्पना कर सकती हैं कि आपका बेटा विपरीत परिस्थितियों में कभी भूखा नहीं रहेगा। 

न्यूक्लियर फैमिली का चलन 
मनोवैज्ञानिक राजेश पांडे कहते हैं, ‘न्यूक्लियर फैमिली का चलन बढ़ा है। ऐसे में एक परिवार में दो ही लोग होते हैं, तो दोनों को सारे ही काम आने चाहिए, ताकि एक-दूसरे की समस्या के समय दोनों एक-दूसरे के काम आ सकें। बेटों की बेहतर कुकिंग के साथ घर के कामों को करने की आदत होने का मतलब यह है कि वे एक आत्म-निर्भर इंसान, अच्छे बेटे और भविष्य में बहुत अच्छे पति साबित होंगे। ऐसे में पुरुष भविष्य में न सिर्फ एक सहयोगी पार्टनर के तौर पर रिश्तों की गरिमा बढ़ाते हैं, बल्कि अपने बच्चों के लिए एक उज्ज्वल भविष्य की संभावना भी छोड़ते हैं। वहीं जब बच्चे अपनी शिक्षा या काम के सिलसिले में दूर शहर में होते हैं, तो अभिभावकों को यह चिंता नहीं रहती कि उनका ख्याल कौन रख रहा होगा और उन्हें कौन खाना बनाकर खिला रहा होगा। इस तरह की आदतें लैंगिक पूर्वाग्रहों को दूर करने में मदद करती हैं और उन लोगों के लिए एक सबक हैं, जो मर्दों के घरेलू काम करने को लेकर अन्यथा सोचते हैं और इसे अहम का विषय बनाते हैं। एक तरह से कहें, तो वे अपने बेटों से भविष्य के कुछ अहम पहलू छीन लेते हैं।’ 

मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि घर प्रबंधन, कुकिंग जैसे काम सीखना, इसलिए भी अहम है, क्योंकि यह समायोजन में बढ़ाेतरी करते हैं और लड़कों को अधिक आत्मनिर्भर और आजाद बनाते हैं। शेफ संजीव कपूर, राकेश सेठी, मुक्केबाज खिलाड़ी मैरी कॉम आैर भारोत्तोलक कर्नल मल्लेश्वरी जैसे उदाहरण अभिभावकों के सामने हैं ही। जहां पुरुषों के समझे जाने वाले क्षेत्र में महिलाओं ने और महिलाओं के समझे जाने वाले क्षेत्रों में पुरुषों ने नाम रोशन किया है। ऐसे में बेटों में घरेलू कामों की आदत विकसित करने में हर्ज ही क्या है? 

सहानुभूति का पाठ 
शादी से लड़कों के सभी काम उनकी मां संभालती है, तो शादी के बाद वही सारे काम उनकी पत्नियों के जिम्मे आ जाते हैं। ऐसे में लड़कों को हमेशा से ही इन कामों को लेकर ढील मिलती आई है। किसी बहु के लिए यह किसी तोहफे से कम नहीं होता कि उसका पति घरेलू काम जानता हो। घर की साफ-सफाई में उसका हाथ बंटाए। दरअसल, इन कामों के जरिए पति-पत्नी की भावनाएं जुड़ती हैं। वे भावनात्मक तौर पर और करीब आते हैं। जब पुरुष स्त्रियों के साथ उनके काम में हाथ बंटाते हैं, तो वे कहीं-न-कहीं उनके साथ भावनात्मक तौर पर भी जुड़ रहे होते हैं और ऐसे में वे उनकी भावनाओं को समझना सीख जाते हैं। 

काम का कोई जेंडर नहीं होता
बेटों पर शुरुआती प्रभाव उनकी मांओं का ही पड़ता है। इसके बावजूद ज्यों-ज्यों वे बाहरी दुनिया से जुड़ते हैं और लड़के-लड़कियों के कामों में जेंडर को लेकर जो फर्क देखते हैं, उनके बड़ा होने के साथ ही ये उनके अहम का हिस्सा बन जाते हैं। 

कहीं-न-कहीं बचपन से पनप रही यही सोच उनमें एक अलग तरह की भावना पैदा करती है और उनमें लड़कियों को लेकर इसी अलग सोच का नतीजा है कि महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा, रेप जैसी घटनाएं सामने आती हैं। इस समाज में अक्सर लिंग के आधार पर हो रहे भेदभाव को नकारने की आवाजें तो उठती हैं, मगर हमारे व्यवहार और रिश्तों में भेदभाव बना रहता है। एक बच्चा जब जन्म लेता है, तब वह बेटी हो या बेटा, उनके जन्म और जरूरतों में कोई अंतर नहीं होता, लेकिन जैसे-जैसे वे बड़े होते जाते हैं माता-पिता और समाज उनके जेंडर को लेकर उनमें फर्क पैदा करते हैं। ऐसा न हो, इसके लिए जरूरी है कि शुरुआत से ही बेटों से घर के छोटे-छोटे काम जैसे-चाय बनाना, अपनी प्लेट उठाकर रखना, अपना बर्तन धोना और अपना सामान सलीके से एक जगह रखना जैसी आदतें उनमें बचपन से विकसित की जाएं। यह बात आपको समझनी होगी कि आज का बच्चा कल किसी का पति भी होगा। जब पति-पत्नी दोनों कामकाजी होंगे, तब परिवार की जिम्मेदारी दोनों को साझा करनी ही पड़ेगी, वरना विवाद पैदा होंगे। इसके लिए भी जरूरी है कि बचपन से ही लड़कों में अपने कामों के साथ ही उन्हें कुछ घरेलू काम की जानकारी भी हो। ऐसे में एक पिता के तौर पर वे अपनी जिम्मेदारी को समझेंगे। जब वह खुद एक पिता के अनुभव से गुजर रहे होंगे, तो उनके लिए अपने बच्चों को तैयार करके स्कूल भेजना, होमवर्क करवाना जैसे काम आसान होंगे।

महिलाओं का सम्मान
बच्चों को उनकी नाजुक उम्र से ही लिंग-भेद से दूर रखकर उन्हें बराबरी की सोच के साथ बड़ा करना कोई मुश्किल काम नहीं है। अगर आप चाहती हैं कि आपका बेटा महिलाओं का सम्मान करना सीखें, तो इसकी सीख आपको उसे बचपन से ही देनी होगी। और यह तभी संभव है, जब बच्चों के साथ बिना लिंग-भेद के व्यवहार किया जाए, इसलिए हर मां को अपने बेटे को दूसरी महिलाओं का सम्मान करने की सीख देनी चाहिए। उसे बताना चाहिए कि महिलाओं से जुड़ा हर रिश्ता सम्मान वाला होता है। महिलाओं के प्रति किसी भी प्रकार की हिंसा को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, यह उसके मन में बचपन से ही बैठाना जरूरी है। बिना भेदभाव के अगर आप बेटा और बेटी दोनों को एक सम्मान परवरिश दे रही हैं, तो कोई शक नहीं कि आपके बेटे का व्यवहार बाहर भी ठीक हो। 
विज्ञापन

मनोविशेषज्ञ भी मानते हैं कि जिन परिवारों में महिलाओं का अपना कोई मत नहीं होता, उनको कोई अहमियत नहीं दी जाती हैं, तो वहां लड़कियों में बचपन से ही हीनभावना पनपने लगती है। वे अपने आपको लड़कों से कमजोर समझने लगती हैं। ऐसे परिवार के लड़के भी लड़कियों को सम्मान नहीं दे पाते हैं। याद रखें, अच्छे-बुरे की पहली सीख बच्चों को घर से ही मिलती है। जो वह अपने आस-पास देखता है, वही वह सीखता है। ऐसे में जरूरी है कि घर में महिला सदस्यों के प्रति कोई भेदभाव न हो। उन्हें भी उतना सम्मान आैर अहमियत मिलनी चाहिए, जितना की पुरुष सदस्यों को मिलती है। तभी बच्चों को आप अच्छी सीख दे पाएंगी। 

बहुत-सी माएं अपने बेटे को रोते समय बोलती हैं कि तुम लड़की हो क्या? इस तरह की बातें करके आप अपने बच्चे के साथ अन्याय कर रही हैं, क्योंकि इस प्रकार तो वह धीरे धीरे स्वार्थी हो जाएगा। भावनात्मक होना कोई शर्म की बात नहीं है। यह एक तरह से आपके बेटे के लिए अच्छा ही है। इससे वह सबके प्रति दया का भाव रखेगा। 
मतलब साफ है कि हमारे बेटों को पता होना चाहिए कि खाना कैसे बनाते हैं? घर की साफ-सफाई कैसे करते हैं? दूसरी तरफ उसे बेटियों का सम्मान करना भी सिखाना होगा। ऐसा करके ही आप बेटों के मन में महिलाओं के लिए सम्मान पैदा कर सकेंगी। 

एक्सपर्ट कहते हैं-
लड़कों के लिए रोना मना है। लड़कियां तो हरदम रोती रहती हैं। ऐसी बातें जो हम रोजमर्रा की जिंदगी में बेहद हल्के-फुल्के ढंग से कहते रहते हैं, मगर इसका बालमन पर बेहद गहरा असर पड़ता है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें