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मानसिक विकारों की आहट
ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स की एक रिपोर्ट कहती है कि पूरी दुनिया में करीब 20 करोड़ लोग डे-ड्रीमर हैं। दरअसल, आप जब किन्हीं नकारात्मक भावों से संघर्ष कर रही होती हैं तो उनसे दूर भागते हुए अपनी ही एक ऐसी दुनिया बना लेती हैं, जिसमें हर चीज अपने मन-माफिक देखती हैं। अब यही दुनिया आपको अच्छी लगने लगती है और आप एक तरह से जिंदगी की असलियत से बचने लगती हैं, लक्ष्य से भटक जाती हैं। स्टूडेंट हैं तो पढ़ाई पर फोकस नहीं कर पातीं, कामकाजी हैं तो काम में मन नहीं लगता, गृहिणी हैं तो ठीक से घर नहीं संभाल पातीं। जब आप मजेदार सपनों के संसार में ज्यादा खोई रहती हैं तो अचानक सामने आई हकीकत आपको झटका देती है और आपकी बेचैनी बढ़ जाती है। इसके बाद अवसाद और ओसीडी यानी ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर जैसे मानसिक विकारों के पनपने का खतरा बढ़ जाता है।
ऐसा क्यों होता है?
ये सब तो ठीक है, लेकिन हद से ज्यादा ख्वाबों की दुनिया में खोए रहना मानसिक स्वास्थ्य को बिगाड़ सकता है। मगर अब प्रश्न उठता है कि खूबसूरत सपनों की दुनिया बीमार हकीकत में क्यों बदल जाती है? इसके कई कारण हो सकते हैं। अगर आपने बचपन में कठिन समय देखा है और उसने आपके दिमाग के किसी कोने में जगह बना ली है तो आप हर वक्त उसी के बारे में सोचेंगी। ऐसे में नकारात्मक विचार आपको बंदी बना लेंगे और तनाव बढ़ जाएगा, जिससे मन अशांत रहने लगेगा। यदि आपकी निजी जिंदगी में कोई समस्या है या कार्यस्थल पर मुश्किलें हैं और आप उन्हें किसी से बांट नहीं पा रही हैं तो अपनी खुशी इन मीठे ख्वाबों में ही खोजने की कोशिश करेंगी। अगर आप अपनी सेहत से परेशान रहती हैं तो स्वस्थ दिखाने वाले सपने प्रिय लगने लगेंगे। इस स्थिति में आप सच्चाई से भागने लगेंगी। वास्तव में, किसी भी मानसिक विकार के पीछे आपका कोई बुरा अनुभव ही होता है, अन्यथा सकारात्मक सपने आपको आगे बढ़ने का रास्ता दिखाते हैं।
महिलाएं हैं आगे
अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन की एक स्टडी के अनुसार, महिलाएं डे-ड्रीमिंग के मामले में पुरुषों से आगे हैं। डे-ड्रीमिंग यानी कल्पना और विचारों में खो जाना, महिलाओं के मस्तिष्क में रचनात्मकता और सोचने की क्षमता को बढ़ावा देता है। यह क्षमता उन्हें विभिन्न मुद्दों पर नए और अनोखे दृष्टिकोण अपनाने में मदद करती है, जो उन्हें अधिक रचनात्मक बनाती है और समस्या हल करने की क्षमता में वृद्धि करती है। लेकिन कहते हैं न कि अति किसी भी चीज की अच्छी नहीं होती, इसलिए जीवन की सच्चाई को स्वीकार करें। इसके लिए ध्यान, योग और व्यायाम की मदद लें। अगर इसके बाद भी आपको लगता है कि डे-ड्रीमिंग आपके लिए परेशानी का सबब बन रही है तो इसकी पहचान कर मनोवैज्ञानिक से परामर्श करें।
अगर आप ज्यादा सोचती हैं...
आर्यभट्ट कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. वर्षा सिंह कहती हैं, मस्तिष्क की यह चमत्कारिक योग्यता है कि आप किसी भी चीज की कल्पना कर उस क्षण का मजा उठा सकती हैं। इससे आपको अच्छा महसूस होता है और खुशी का हार्मोन ‘डोपामाइन’ का स्तर बढ़ता है। असल में, दिन में सपने देखना एक आम प्रक्रिया है, जो सभी में होती है। सभी लोग दिन में ख्वाब देखते हैं। इसके कई फायदे हैं। कई बार आप सोचते-सोचते, कल्पना करते-करते अपनी समस्या का समाधान कर लेती हैं या फिर दिल से खुश हो जाती हैं। दिन में सपने देखना रचनात्मक भी होता है, जैसे आपको सोचते-सोचते अचानक कोई बेहतरीन आइडिया आ जाए।
इसके अतिरिक्त यह तनाव को कम करने में भी मदद करता है, एंग्जायटी को कम करता है। लेकिन जैसा कि कहते हैं कि किसी भी चीज की अति खराब होती है तो आप अगर ज्यादा ही सपने देखने लग जाती हैं तो यह स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। अगर आप ज्यादा सोचती हैं तो आपको एंग्जायटी हो सकती है। विशेष रूप से सोशल एंग्जायटी। यह आपके दिन भर के कामों को प्रभावित कर सकता है। आप कक्षा में हैं, किसी जरूरी मीटिंग में हैं और सपने देख रही हैं तो आप जहां हैं, आपका मन वहां नहीं लगेगा और जरूरी बातें आप सुन भी नहीं पाएंगी। दिन में सपने देखने पर आपको कोई मानसिक रोग हो, इसकी संभावना कम ही है, लेकिन हकीकत में जीना सबसे जरूरी है।