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Bagless Days 2025: अब बच्चा नहीं ले जाएगा स्कूल बैग! जानिए क्या है इसकी वजह

Mon, 24 Nov 2025 12:11 PM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला

सार

Bagless Days 2025: यूपी की ‘बैगलेस क्लासेज़’ उसी दिशा में एक बड़ा कदम है, जहां सीखना सिर्फ जानकारी नहीं, बल्कि अनुभव, खोज और आनंद में बदलेगा। माता-पिता के लिए भी यही समय है कि बच्चों की पढ़ाई में दबाव नहीं, संतुलन लाएं ताकि उनका बचपन हल्का रहे, खुश रहे और सीखने की ऊर्जा हमेशा बनी रहे।
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स्कूल जाता बच्चा - फोटो : Adobe
Bagless Days 2025: स्कूल जाते हुए बच्चों की पीठ पर लटकता भारी बैग सिर्फ किताबों का बोझ नहीं होता बल्कि अनावश्यक दबाव, अपेक्षाओं और पढ़ाई में सिर्फ रटने की मजबूरी भी होता है। बच्चों के कंधे अभी नाज़ुक हैं, मगर हम अक्सर भूल जाते हैं कि अगर बोझ रोज़ बढ़ता रहा तो सीखने की इच्छा धीरे-धीरे दबने लगती है। इसी सोच को तोड़ने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। क्लास 6 से 8 तक के बच्चों के लिए साल में 10 दिन ‘बैगलेस क्लास’ लागू की जाएगी। यह कदम बच्चों का बोझ कम करने और पढ़ाई को रोचक बनाने के लिए उठाया गया है।

बैगलेस डेज में बच्चों को सिर्फ क्लासरूम में पढ़ाया नहीं जाएगा, बल्कि मजेदार गतिविधियाँ, प्रैक्टिकल लर्निंग, खेल, कला, क्राफ्ट, विज्ञान और प्रकृति आधारित अनुभव, समूह सहभागिता, जीवन-कौशल आधारित शिक्षा जैसी चीज़ों से जोड़ा जाएगा। इसका उद्देश्य है कि बच्चे सिर्फ किताबों से नहीं, बल्कि अनुभव, सहभागिता और खेल के माध्यम से भी सीखें। यह प्रणाली बच्चे की छिपी प्रतिभा को पहचानने का मौका देती है, उनका आत्मविश्वास बढ़ाती है और सीखने को आनंद से जोड़ती है।

बच्चों को भविष्य में होनहार बनाना है, तो उनके कंधों से बोझ हटाकर मन को खुला और रचनात्मक बनाना होगा। यूपी की ‘बैगलेस क्लासेज़’ उसी दिशा में एक बड़ा कदम है, जहां सीखना सिर्फ जानकारी नहीं, बल्कि अनुभव, खोज और आनंद में बदलेगा। माता-पिता के लिए भी यही समय है कि बच्चों की पढ़ाई में दबाव नहीं, संतुलन लाएं ताकि उनका बचपन हल्का रहे, खुश रहे और सीखने की ऊर्जा हमेशा बनी रहे।


 
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स्कूल के बच्चे - फोटो : Istock
बच्चों के भारी स्कूल बैग के नुकसान

शारीरिक विकास पर असर

भारी बैग बच्चों की रीढ़, कंधों और गर्दन को नुकसान पहुंचा सकता है। यह भविष्य में भी पोस्चर समस्याएं पैदा करता है।

मानसिक तनाव बढ़ना

ज्यादा पढ़ाई और कम खेल का दबाव बच्चों में एंग्जाइटी, चिड़चिड़ापन और थकान बढ़ाता है।

सीखने में अरुचि

रटाई-प्रधान शिक्षा बच्चों की कलात्मकता और उत्सुकता को कम कर देती है।

खेल और खोजने की क्षमता कमजोर होना

किताबों का बोझ खेल, सामाजिक जुड़ाव और सीखने के नए तरीकों को सीमित कर देता है।
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स्कूल के बच्चे - फोटो : Istock
‘बैगलेस डेज’ क्यों हैं फायदेमंद?

सीखना होगा मजेदार

जब किताबें कम और अनुभव ज़्यादा होंगे तो बच्चे अधिक सक्रिय और उत्साहित रहेंगे।

छिपी प्रतिभा सामने आएगी

कला, खेल, समूह-काम, प्रयोग ये सब बच्चा किसमें बेहतर है, यह पहचानने में मदद करेंगे।

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शिक्षक और छात्र - फोटो : freepik
आत्मविश्वास में वृद्धि

प्रैक्टिकल एक्सपीरियंस बच्चों को बोल्ड और  बनाता है।

मानसिक राहत और खुशी

एकरसता टूटती है, बच्चे रिलैक्स रहते हैं और पढ़ाई के प्रति सकारात्मकता बढ़ती है।
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शैक्षणिक यात्रा पर शिक्षक और छात्र - फोटो : adobe
बेहतर सामाजिक कौशल

टीमवर्क, संचार और नेतृत्व क्षमता विकसित होती है।

शिक्षा का उद्देश्य पूरा होता है

सीखना सिर्फ किताबें नहीं, जीवन का अनुभव होना चाहिए। यही असली बाल विकास है।



 
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