चारधाम यात्रा
- फोटो : Ai
चार धाम का इतिहास और धार्मिक मान्यता
चार धाम यात्रा का इतिहास काफी प्राचीन है। माना जाता है कि इसे आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में पुनर्जीवित किया था। इनका इतिहास पौराणिक है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस यात्रा को पूरा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और जीवन के पापों से मुक्ति मिलती है।
महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने अपने पापों के प्रायश्चित के लिए भगवान शिव को खोजा, जिन्होंने यहां बैल का रूप धारण किया था। इसलिए केदारनाथ में शिव का बैल स्वरूप आधा धण स्थापित है।
यह स्थल भगवान विष्णु को समर्पित है। विष्णु जी ने नर-नारायण के रूप में अवतार लेकर यहां हजारों वर्षों तक तपस्या की। वहीं माता लक्ष्मी ने बद्री यानी बेर के पेड़ का रूप धारण कर नर-नारायण की रक्षा की। यह नर-नारायण की तपोस्थली है।
इस पवित्र स्थल में मां गंगा का वास माना जाता है। कहते हैं कि राजा भागीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा नदी पृथ्वी पर इस स्थान पर अवतरित हुई थीं।
यह स्थान यमुना नदी का उद्गम स्थल माना जाता है। यमुना सूर्य देव की पुत्री हैं।