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गया में पितृपक्ष मेला शुरू, घूमने के लिए बेहतरीन है जगह

Mon, 16 Sep 2019 08:59 AM IST
ललित फुलारा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
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बोध गया
बिहार के गया में पितृपक्ष मेला शुरू हो गया है। हर साल की तरह इस साल भी यह मेला भीड़ से गुलजार हैं। पितृपक्ष के दौरान गया के घाटों पर लाखों हिंदू अपने पूर्वजों के पिंड दान करने आते हैं। जिस तरह से हिंदुओं के लिए फल्गु नदी का तट शुभ हैं, उसी तरह बोधगया के धार्मिक स्थल महत्वपूर्ण हैं। इस प्राचीन शहर और इसके पर्यटन स्थलों का इतिहास और पौराणिक कथाओं से गहरा संबंध हैं। आइए जानते हैं गया के दर्शनीय स्थलों के बारे में...
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गया विष्णुपद मंदिर
विष्णुपद मंदिर
विष्णुपद मंदिर फल्गु नदी के तट पर स्थित है। गया के इस मंदिर का एक महत्वपूर्ण हिंदू पौराणिक कथा से संबंध है। सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने गायसुर की छाती पर अपना बायां पैर रखकर उसका वध किया था। भगवान विष्णु के पैरों के निशान अभी भी इस मंदिर के भीतर संरक्षित हैं। हालांकि, बौद्ध धर्म के लोग भी इस मंदिर को शुभ मानते हैं। उनका मानना है कि भगवान बुद्ध के पैरों के निशान भी इन्हीं में से एक है। यह मंदिर दोनों धर्मों के लिए पवित्र है।
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गया तिब्बती मठ
तिब्बती मठ
तिब्बती मठ गया का सबसे बड़ा और पुराना मठ है। इस मठ में बड़ी संख्या में प्राचीन बौद्ध धर्मग्रंथ और दस्तावेज मौजूद हैं। गया के पर्यटन में तिब्बती मठ सबसे बड़े आकर्षणों में से एक है। इस मठ के अंदर एक बड़ा पुस्तकालय है जिसमें बौद्ध धर्म के विभिन्न पहलुओं पर किताबें हैं। इस मठ में एक अन्य आकर्षण 10 मीटर ऊंची धातु का ड्रम है। इस ड्रम को सुनहरे और लाल रंग में रंगा गया है। बौद्ध धर्म में इसे धर्मचक्र या कानून के पहिये के रूप में जाना जाता है।

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गया बोधि वृक्ष
बोधि वृक्ष
गया में एक विशाल बरगद का पेड़ हैं। इसी पेड़ के नीचे भगवान बुद्ध को 'निर्वाण' प्राप्त हुआ था। इस बात का उल्लेख बौद्ध धर्मग्रंथों में मिलता है। भगवान बुद्ध ने इस पेड़ के नीचे सात दिनों तक ध्यान किया था। इस स्थल की पवित्रता को बनाए रखने के लिए कई कानून हैं, और पर्यटकों को उनका पालन करना चाहिए। इस पेड़ की पत्तियों या टहनियों को उठाने की अनुमति नहीं है क्योंकि इस पेड़ से एक गहरा धार्मिक लगाव जुड़ा हुआ है।
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रत्नघारा
रत्नघारा जैसा कि नाम से ही इसका अर्थ स्पष्ट है रत्नों का घर। किंवदंतियों के अनुसार, भगवान बुद्ध जब ध्यान में थे तो उस समय उनके शरीर से रंग उत्सर्जित होते थे। इस शुभ घटना की याद के रूप में, रत्नाघरा को सजाने वाले कई रंगों के झंडे हैं। फिलहाल, रत्नघारा भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा के लिए मशहुर हो गया है। इस जगह की हरियाली और शांति आपका दिल जीत लेगी।
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गया के घाट
गया के घाट
'श्राद्ध' के महीने में, गया 'पिंड दान' करने वाले लोगों से भर जाता है। फल्गु नदी के किनारे विभिन्न घाट हैं जहाँ कोई भी इस अनुष्ठान को कर सकता है। हालांकि, यदि आप पिंड दान 'करने की इच्छा नहीं रखते हैं, तो आप ठंडी हवा के साथ सूर्यास्त के दृश्यों का आनंद लेने के लिए कई घाटों में से एक पर जा सकते हैं।
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