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15वीं शताब्दी में बने मां दुर्गा के पांच मंदिर, जहांं नवरात्रि में पहुंचते हैं देशभर के भक्त

Mon, 30 Sep 2019 05:32 PM IST
पंखुड़ी सिंह लाइफस्टाइल डेस्क
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देवी मां के दर्शन करने के लिए किसी दिन विशेष की जरूरत नहीं होती बस श्रद्धा चाहिए, लेकिन नवरात्रि को खास माना गया है। भारत में देवी दुर्गा के कई मंदिर हैं, नवरात्रि में इन मंदिरों में देवी मां का दर्शन करना बहुत ही खास माना जाता है। ये कुछ ऐसे मंदिर हैं, जहां शारदीय नवरात्रि में मां की विशेष कृपा पाने के लिए देशभर से भक्तों की भारी भीड़ पहुंचती है।
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- फोटो : अमर उजाला
नैना देवी मंदिर
51 शक्तिपीठों में से एक नैना देवी मंदिर हिंदू धर्म के पवित्र गंतव्यों में से एक है। मां की आराधना के प्रमुख स्थल में शामिल यह मंदिर उत्तराखंड के नैनीताल में नैनी झील के किनारे स्थित है। सरोवर नगरी नैनीताल के उत्तरी किनारे पर स्थित मां नयना देवी मंदिर भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक है। यह मंदिर नेपाल की पैगोड़ा और गौथिक शैली का समावेश है। ऐसी मान्यता है कि ये मंदिर 15वीं शताब्दी में बनाया गया है, लेकिन भूस्खलन के कारण यह नष्ट हो गया था और बाद में 1883 में, मंदिर स्थानीय लोगों द्वारा फिर से बनाया गया। मंदिर के अंदर नैना देवी के साथ गणेशजी और मां काली की भी मूर्तियां हैं। मंदिर के प्रवेशद्वार पर पीपल का एक विशाल वृक्ष है। यहां माता पार्वती को नंदा देवी कहा जाता है। मंदिर में नंदा अष्टमी के दिन भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। 
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- फोटो : अमर उजाला
नैना देवी मंदिर 15वीं शताब्दी में बनाया गया था। 1883 में इसका पुनर्निर्माण किया गया था। ऐसी मान्यता है कि जब शिव सती का मृत शरीर लेकर कैलाश पर्वत जा रहे थे, तब जहां-जहां उनके शरीर के अंग गिरे वहां-वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। नैनी झील के स्थान पर देवी सती के नेत्र गिरे थे। इसी से प्रेरित होकर इस मंदिर का नाम नैना देवी पड़ा। प्रचलित मान्यता के अनुसार मां के नैनों से गिरे आंसू ने ही ताल का रूप धारण कर लिया और इसी वजह से इस जगह का नाम नैनीताल पड़ा। 

इस मंदिर के अंदर नैना देवी मां की दो नेत्र बने हुए हैं। इन नेत्र के दर्शन मात्र से मां का आशीर्वाद मिलता है। नैना देवी के इस मंदिर की मान्यता है कि अगर कोई भक्त आंखों की समस्या से परेशान है और अगर वह नैना मां के दर्शन कर ले तो जल्द ही ठीक हो जाएगा। नैना देवी नाम का एक अन्य मंदिर हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में भी है।

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अम्बाजी मंदिर मां का सिद्धपीठ
गुजरात और राजस्थान की सीमा पर बनासकांठा जिले की दांता तालुका में गब्बर पहाड़ियों के ऊपर अम्बाजी का मंदिर बना हुआ है। यह मंदिर लगभग बारह सौ साल पुराना है। सफेद संगमरमर से निर्मित यह मंदिर बेहद भव्य है। मंदिर का शिखर एक सौ तीन फीट ऊंचा है। शिखर पर 358 स्वर्ण कलश सुसज्जित हैं। इस मंदिर में ना तो कोई मां की मूर्ती है ना ही कोई पिंडी। इस मंदिर में मां अम्बाजी की पूजा श्रीयंत्र की आराधना से होती है जिसे भी सीधे आंखों से देखा नहीं जा सकता। यह 51 शक्तिपीठों में से एक है जहां मां सती का हृदय गिरा था। यहां एक पवित्र ज्योति अटूट प्रज्ज्वलित रहती है।
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अम्बा जी के मंदिर से 3 किलोमीटर की दूरी पर गब्बर पहाड़ भी मां अम्बे के पद चिन्हों और रथ चिन्हों के लिए विख्यात है। मां के दर्शन करने वाले भक्त इस पर्वत पर पत्थर से बने मां के पैरों के चिन्ह और मां के रथ के निशान देखने जरूर जाते हैं। कहा जाता है कि यहां पर भगवान श्रीकृष्ण का मुंडन संस्कार संपन्न हुआ था। वहीं भगवान राम भी शक्ति की उपासना के लिए यहां आ चुके हैं। नवरात्रि में मंदिर प्रांगण में गरबा करके शक्ति की आराधना की जाती है।
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ज्वाला देवी
हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा से 30 किलोमीटर दूर ज्वाला देवी का प्रसिद्ध मंदिर है। ज्वाला मंदिर को जोता वाली मां का मंदिर भी कहा जाता है। यहां किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती है, बल्कि पृथ्वी के गर्भ से निकल रही नौ ज्वालाओं को पूजा जाता है। 51 शक्तिपीठ में से एक इस मंदिर में नवरात्र में भक्तों का तांता लगा रहता है। नौ ज्वालाओं में प्रमुख ज्वाला माता जो चांदी के दीये के बीच स्थित है उसे महाकाली कहते हैं। अन्य आठ ज्वालाओं के रूप में मां अन्नपूर्णा, चण्डी, हिंगलाज, विध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका एवं अंजी देवी ज्वाला देवी मंदिर में निवास करती हैं। 

अकबर ने इस ज्वाला को बुझाने की कोशिश की थी, लेकिन वो नाकाम रहे थे। ज्वाला देवी शक्तिपीठ में माता की ज्वाला के अलावा एक अन्य चमत्कार देखने को मिलता है। यह गोरखनाथ का मंदिर भी कहलाता है। मंदिर परिसर के पास ही एक जगह 'गोरख डिब्बी' है। देखने पर लगता है इस कुण्ड में गर्म पानी खौल रहा है जबकि छूने पर कुंड का पानी ठंडा लगता है।
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सप्तश्रृंगी देवी 
महाराष्ट्र के नासिक के वणी गांव में सप्तश्रृंगी देवी मां का यह मंदिर गोदावरी नदी के किनारे बना हुआ है। इस मंदिर में स्थित मां की मूर्ति आठ फुट ऊंची है। इस प्रतिमा की 18 भुजाएं हैं। मुख्य मंदिर तक जाने के लिए करीब 472 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। इस पर्वत पर पानी के 108 कुंड हैं। जो इस स्थान की सुंदरता को कई गुना बढ़ाते देते हैं। यह मंदिर छोटे-बड़े सात पर्वतों से घिरा हुआ है इसलिए यहां की देवी को सप्तश्रृंगी यानी सात पर्वतों की देवी कहा जाता है। यहां की गुफा में तीन द्वार हैं शक्ति द्वार, सूर्य द्वार और चंद्रमा द्वार। इन तीन दरवाजों से देवी की प्रतिमा देखी जा सकती है।

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देवी को ब्रह्मस्वरूपिणी के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि ब्रह्म देवता के कमंडल से निकली गिरिजा महानदी देवी सप्तश्रृंगी का ही रूप है। सप्तश्रृंगी की महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती के त्रिगुण स्वरूप में भी आराधना की जाती है। पौराणिक कथानुसार, महिषासुर राक्षस के विनाश के लिए सभी देवी-देवताओं ने मां की आराधना की थी तभी देवी मां सप्तश्रृंगी अवतार में प्रकट हुईं और इसी जगह पर उन्होंने महिषासुर का वध किया था।
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- फोटो : कालीमंदिर बेवसाइट
काली मंदिर
कोलकाता के उत्तर में विवेकानंद पुल के पास दक्षिणेश्वर काली मंदिर स्थित है। यह मंदिर मां काली का विश्व में सबसे प्रसिद्ध मंदिर है। भारत के सांस्कृतिक धार्मिक तीर्थ स्थलों में भी दक्षिणेश्वर काली मंदिर सबसे प्राचीन माना जाता है। दक्षिणेश्वर मंदिर का निर्माण सन 1847 में प्रारम्भ हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि जान बाजार की महारानी रासमणि ने सपना देखा था, जिसके अनुसार मां काली ने उन्हें निर्देश दिया कि मंदिर का निर्माण किया जाए। इस भव्य मंदिर में मां की मूर्ति श्रद्धापूर्वक स्थापित की गई है। वर्ष 1855 में मंदिर का निर्माण पूरा हुआ। यह मंदिर 25 एकड़ क्षेत्र में स्थित है। दक्षिणेश्वर मां काली के मुख्य मंदिर के भीतरी भाग में चांदी से बनाए गए कमल के फूल की हजार पंखुड़ियां हैं।
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