दक्षिण भारत में दिवाली के मौके पर खास पकवान बनता हैं जो औषधियों गुणों से युक्त होता है
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खान-पान
नरक चतुर्थी की पूर्व संध्या पर महिलाएं एक खास दवा ‘मारूंदू’ बनाती हैं। इसमें काली मिर्च, सोंठ, काला जीरा, पिपली, मुलेठी और कई अन्य औषधियों को शामिल करके सबको कूटने और छानने के बाद गुड़ की चाशनी में डालकर पकाया जाता है। इसमें ढेर सारा घी, तिल्ली का तेल आदि डाले जाते हैं।
माना जाता है कि त्योहार में अलग-अलग पकवान खाने के बाद तबीयत खराब न हो, इसलिए पहले ही यह दवा खिला दी जाती है, जो कि पाचक होती है। इसके बाद पहले से ही बनाकर रखीं मिठाइयां और व्यंजन भगवान के सामने रखे जाते हैं। इस दिन सभी लोग आस-पड़ोस में जाकर ‘गंगा स्नान हो गया क्या?’ पूछते हैं। सुबह-सुबह रिश्तेदारों के घर आते-जाते हैं और दोपहर को विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन, जैसे कि चावल, सांभर, रसम, पायसम, तीन-चार तरह की सब्जियां, रायता, मेदु वड़ा आदि बनाए जाते हैं और पापड़ तले जाते हैं। इस तरह बिल्कुल पारंपरिक भोजन तैयार किया जाता है, जिसका आदान-प्रदान कई दिनों तक चलता रहता है।