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धार्मिक यात्रा: सिर्फ बांके बिहारी और राधारमण नहीं, ठाकुर जी के हैं सात रूप, जानिए कहां मिलेंगे दर्शन

Wed, 30 Sep 2026 01:51 PM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

7 Forms of Thakur Ji Of Vrindavan: वृंदावन का बांके बिहारी मंदिर और राधा रमण मंदिर लोकप्रिय है, जहां दूर दराज से भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि ठाकुर जी के सिर्फ ये दो रूप नहीं हैं, बल्कि कुल सात ठाकुर जी के स्वरूप विराजमान हैं।
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वृंदावन के ठाकुर जी के 7 रूप - फोटो : Ai

Sapt Devalaya:  बृज श्रीकृष्ण की नगरी है। यहां गोकुल-वृंदावन की गलियों से लेकर मथुरा और बरसाना तक हर जगह कृष्ण महिमा देखने को मिलती है। कृष्ण भक्त वृंदावन में कई प्राचीन मंदिरों के दर्शन कर कान्हा की अनुभूति करते हैं। वृंदावन का बांके बिहारी मंदिर और राधा रमण मंदिर लोकप्रिय है, जहां दूर दराज से भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि ठाकुर जी के सिर्फ ये दो रूप नहीं हैं, बल्कि कुल सात ठाकुर जी के स्वरूप विराजमान हैं।

इन्हें वृंदावन के श्री विग्रह कहा जाता है। कृष्ण के ये सभी स्वरूप प्रकट हुए या फिर गोस्वामियों द्वारा खोजे गए हैं यानी सभी स्वयंभू हैं। ठाकुर जी की ये सातों प्रतिमाएं प्राण प्रतिष्ठा के उपरांत जीवंत स्वरूप में विराजती हैं। 

अगर आपने अभी तक वृंदावन के प्रमुख श्री विग्रहों के दर्शन नहीं किए हैं तो पहले ये जान लीजिए कि ठाकुर जी के इन सातों स्वरूपों के क्या नाम हैं और सभी ठाकुर जी कहां विराजमान हैं। 

7 श्री विग्रह

1. गोविंद देव जी
2. मदन मोहन जी
3. गोपीनाथ जी
4. बांके बिहारी जी
5. राधा रमण जी
6. राधा वल्लभ जी
7. जुगल किशोर जी


16वीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु के निर्देश पर उनके शिष्यों ने वृंदावन आकर साधना की और गोवंश या जमीन के भीतर से इन दिव्य विग्रहों को खोजा। उनके तीन शिष्यों के नाम हैं, रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी और लोकनाथ गोस्वामी

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गोविंद जी महाराज जयपुर - फोटो : Ai

गोविंद देवजी

5000 वर्ष पहले भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र महाराज वज्रनाभ ने अपनी दादी के बताए वर्ण के आधार पर श्रीकृष्ण के स्वरूप की तीन सुंदर मूर्तियां बनाई। तीसरी और अंतिम मूर्ति गोविंद देव जी की थी, जिसमें भगवान के मुखारविंद का बिल्कुल सटीक चित्रण था। समय के साथ ये दिव्य विग्रह लुप्त हो गया।  बाद में रूप गोस्वामी जी को वृंदावन के गौमा टीला से यह विग्रह प्राप्त हुआ था। मान्यता है कि एक गड़रिए बालक के रूप में कृष्ण जी ने गोस्वामी जी के स्वप्न में दर्शन देकर बताया था कि उसका यह स्वरूप कहां है। हालांकि वर्तमान में गोविंद देवजी राजस्थान के जयपुर में विराजमान हैं।

वृंदावन में गोविंद देव जी के भव्य मंदिर का निर्माण राजा मानसिंह ने कराया था। लेकिन औरंगजेब के शासनकाल में जब मंदिरों पर संकट आन पड़ा तो मंदिर के पुजारी गोविंद देवजी को जयपुर में महाराजा सवई जयसिंह द्वितीय के महल में ले आए। यहां सिटी पैलेस के जयनिवास बाग के पास मंदिर स्थापित कर गोविंद देवजी को विराजमान कराया गया। 
 

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श्री मदन मोहन जी मंदिर करौली - फोटो : Ai

मदन मोहनजी

वज्रभान ने जिन तीन मूर्तियों का निर्माण किया था, उसमें से पहली मदन मोहन जी की थी, जिनके स्वरूप में श्रीकृष्ण के चरणों की झलक मानी जाती है। कलयुग में अद्वैत आचार्य या श्री सनातन स्वामी को वृंदावन के कालीदह यानी द्वादशादित्य टीले में एक वृक्ष के नीचे से इस प्रतिमा को प्राप्त किया। एक व्यापारी ने लाल बलुआ पत्थर से मदन मोहन जी के भव्य मंदिर का निर्माण कराया।

लेकिन औरंगजेब के आक्रमण के दौरान करौली के राजा गोपाल सिंह मदन मोहन जी की मूल प्रतिमा को करौली ले आए, जहां वे आज भी भव्य मंदिर में विराजमान हैं।

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गोपीनाथ जी, जयपुर - फोटो : Ai

गोपीनाथ जी 

वृंदावन के वंशिवट के पास ये पावन विग्रह प्रकट हुए थे, जो वर्तमान में जयपुर में पूजे जाते हैं। दरअसल, कृष्ण जी के प्रपौत्र द्वारा निर्मित तीन मूर्तियों में से दूसरी गोपीनाथ जी की है। समय के साथ यह विग्रह भी विलुप्त हो गया। बाद में यमुना नदी के कटाव और बाढ़ के कारण वंशीवट के पास रेत के नीचे दबी इस प्रतिमा को परमानंद भट्टाचार्य ने खोज निकाला। उन्होंने इसे निधिवन के समीप स्थापित किया और सेवा पूजा मधु पंडित गोस्वामी को सौंप दी।

हालांकि औरंगजेब के शासनकाल में 1792 को जयपुर के दीवान रहे श्री खुशहाली राम बोहरा इस पावन विग्रह को जयपुर ले आए और पुरानी बस्ती स्थित हवेली में प्रतिष्ठित किया। 
 

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बांके बिहारी जी - फोटो : Ai

बांके बिहारी जी 

मान्यता है कि स्वामी हरिदास जी को बांके बिहारी स्वरूप की प्राप्ति वंशीवट क्षेत्र से हुई थी। कहते हैं स्वामी हरिदास जी की संगीत साधना और निस्सीम भक्ति से प्रसन्न होकर राधा-कृष्ण की युगल जोड़ी एकाएक स्वयं एक विग्रह के रूप में प्रकट हुई थी। पहले निधिवन में इस त्रिभंग स्वरूप की पूजा की जाती थी, लेकिन बाद में वृंदावन धाम में इनका प्रसिद्ध मंदिर स्थापित किया गया। वर्तमान में वृंदावन के सबसे बड़े मंदिरों में बांके बिहारी का नाम आता है।

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राधा रमण मंदिर - फोटो : Instagram

राधा रमण जी 

संत गोपाल भट्ट गोस्वामी गंडकी नदी गए, जहां उन्हें 12 शालिग्राम शिलाएं प्राप्त हुई, जिसे वे वृंदावन ले आए और सेवा करने लगे। कथा है कि एक दिन एक भक्त ने उन्हें ठाकुर जी के वस्त्र और आभूषण देने की इच्छा व्यक्त की। गोपाल भट्ट गोस्वामी के मन में विचार आया कि अगर शालिग्राम शिला विग्रह यानी ठाकुर जी के आकार में होती तो उनका श्रृंगार कर पाता। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर वर्ष 1542 में उसी रात 12 शालिग्राम शिलाओं में से एक शिला त्रिभंग मुद्रा में बांसुरी बजाते हुए कृष्ण की दिव्य विग्रह में बदल गई।
 

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राधा वल्लभ लाल वृंदावन - फोटो : Ai

राधा वल्लभ जी 

हित हरिवंश महाप्रभु द्वारा स्थापित यह दिव्य विग्रह श्री वृंदावन में सुशोभित है। मान्यता है कि राधा वल्लभ जी की यह प्रतिमा असल में भोलेनाथ की थी। एक बार आत्मदेव नाम के ब्राह्मण ने भोलेनाथ की तपस्या की। वरदान में शिव जी के हृदय के सबसे अधिक प्रिय वस्तु मांगी। भोलेनाथ ने अपने हृदय से ही लाल के दिव्य विग्रह का प्रकट किया और आत्मदेव को सौंप दी। बाद में श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने आत्मदेव की पुत्रियों से विवाह किया। इसपर राधावल्लभ की ये प्रतिमा उन्हें दहेज स्वरूप प्राप्त हुई। प्रतिमा वे वृंदावन ले आए और स्थापना के साथ राधा वल्लभ की सेवा शुरू की।

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