फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

क्या कोरोना काल में समय जल्दी बीत रहा है, इन दो महीनों में कैसा रहा आपका तजुर्बा?

Fri, 29 May 2020 01:55 AM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
विज्ञापन
1 of 10
आपको नहीं लगता कि ये सवा दो महीने बड़ी जल्दी बीत गए? - फोटो : PTI
दो महीने से ज्यादा के लॉकडाउन के बाद अब दुनिया के तमाम देशों में इसे धीरे धीरे हटाया जा रहा है। ऐसे में आपको नहीं लगता कि ये सवा दो महीने बड़ी जल्दी बीत गए? हमने सोचा भी नहीं था कि लॉकडाउन का मुश्किल दौर इतनी जल्दी गुजर जाएगा। हम घर में, पाबंदियों में रहने की आदत ही डाल रहे थे कि इससे रियायतें भी मिलने लगी हैं। आम तौर पर होता यही है कि बुरा वक्त बिताना मुश्किल होता है।
विज्ञापन

2 of 10
फ्लाइट का इंतजार - फोटो : Pixabay
आप ट्रेन या फ्लाइट का इंतजार करते हों, तो समय बिताते नहीं बीतता। मगर, किसी प्रिय के साथ हों या किसी पसंदीदा जगह घूमने जाते हों, तो समय मानो फुर्र से उड़ जाता है। ऐसे में लॉकडाउन का वक्त, जिसे ज्यादातर लोगों ने बुरा समय ही माना था, वो इतनी जल्दी कैसे गुजर गया?
विज्ञापन

3 of 10
अभी समय कितनी जल्दी बीत रहा है? - फोटो : PTI
असल में हम समय के गुजरने का आकलन दो तरह से करते हैं। पहला तो ये कि अभी समय कितनी जल्दी बीत रहा है? और, पिछला हफ्ता या पिछला दशक कैसे बीता था? लॉकडाउन के दौरान हम सब अपने परिजनों, रिश्तेदारों, दोस्तों से दूर रहने को मजबूर थे। खाना पकाना सीख कर, बागबानी करके या फिर ऐसे ही अन्य काम करके अपना वक्त बिता रहे थे। 

4 of 10
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
लेकिन, जब आप अपने हर दिन को घर में ही, एक जैसे बिता रहे हों, तो दिन एक जैसे मालूम होते रहते हैं। दिन, हफ्ते में और हफ्ते महीने में बीत जाते हैं। पिछले दिन या पिछले हफ्ते का तजुर्बा, अगले हफ्ते जैसा ही था। तो दिनों के बीच फर्क करना नामुमकिन था।
विज्ञापन

5 of 10
इन दिनों हम रोज एक जैसा ही अनुभव करते हैं - फोटो : Pexels
अगर हम रोज एक जैसा ही तजुर्बा करते हैं, तो हमारे जहन में नई यादों का पिटारा नहीं बनता। असल में हम यादों के सहारे ही ये तय करते हैं कि कितना वक्त गुजर गया। अगर आप किसी नई जगह पर घूमने जाते हैं, तो समय तेजी से बीतता है। मगर आप नई यादों के साथ लौटते हैं। नई यादों के साथ ये गुजरा हुआ समय लंबा लगता है।
विज्ञापन

6 of 10
मां बच्चों को इन दिनों पूरा समय दे पा रही हैं (फाइल फोटो) - फोटो : Facebook@CKS
मगर, लॉकडाउन के दौरान इसका उल्टा हुआ। एक जैसे दिन रात और हफ्तों ने हमारे लिए नई यादों की पोटली नहीं तैयार की। अब जब पिछले और अगले दिन में अंतर ही नहीं है, तो आखिर हम कैसे महसूस करें कि कितना दिन बीता या कितने हफ्ते गुजर गए। लॉकडाउन के दौरान भले ही आपके दिन व्यस्तता भरे रहे हों। घर के तमाम काम करने पड़े हों। मगर, नई यादें सहेजने के लिहाज से इनमें कुछ भी नया नहीं था।
विज्ञापन

7 of 10
भविष्य के ख्वाब (प्रतीकात्मक तस्वीर)
सामान्य दिनों में हम भविष्य के ख्वाब सजाते हैं। मगर, लॉकडाउन के दौरान हम आज में जीने को मजबूर थे। भविष्य में झांकने के लिए हमारे पास आज का कोई खास तजुर्बा नहीं था। और हमें ये भी नहीं पता था कि आगे हालात कैसे होगे। नतीजा ये कि न तो नई यादें इकट्ठा हुईं। न ही हम आगे की सोच पाए।

8 of 10
प्रतीकात्मक तस्वीर
आने वाले समय में जब हम इस दौर के बारे में सोचेंगे, तो शायद इतना ही याद रहेगा कि फलां रोज हमारे देश में वायरस आया था और उसके कितने दिनों बाद लॉकडाउन लगा था। मनोवैज्ञानिक इसे फ्लैशबल्ब मेमोरी कहते हैं। ये तब होता है जब हम किसी बड़ी घटना के बारे में सुनते हैं।

9 of 10
लोधी गार्डन में योगाभ्यास करता शख्स(File Photo) - फोटो : PTI
लेकिन, जब लॉकडाउन शुरू हो गया, तो ऐसी कोई बड़ी घटना तो हुई नहीं, जो बाकी दिनों से अलग हो। नतीजा ये कि हम पिछले और अगले हफ्ते में फर्क नहीं कर सके। अक्सर हम दिनों में भेद तब कर पाते हैं, जब एक साथ हमारे जीवन में कई घटनाएं घट रही होती हैं। जैसे कि किसी ने नई नौकरी शुरू की, या किसी के जन्मदिन की पार्टी की। मगर, लॉकडाउन के दौरान ऐसा नहीं हुआ। जब आप बमुश्किल ही घर से बाहर निकल पा रहे हो। तो सारे दिन मिल कर एक जैसे हो गए।
विज्ञापन

10 of 10
लॉकडाउन के दिन
यही कारण है कि जब लॉकडाउन के दिन शुरू हुए, तो कुछ दिन के बाद हमारे लिए उनमें अंतर कर पाना मुश्किल हो गया। दिन लगभग उतने ही बीते हैं, जितने दिन से लॉकडाउन लगा है। ये तो हमारी यादों का पिटारा ही इतना सीमित है कि हमें लगता है कि लॉकडाउन का दौर जल्द बीत गया।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें