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क्यों बढ़ रहे बच्चियों के यौन शोषण के मामले, रिसर्च में हुआ है चौंकाने वाला खुलासा

Fri, 22 Jun 2018 06:10 PM IST
बीबीसी
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मुझे आज भी याद है, जब एक अजनबी ने मेरी नंगी टांगों को बुरी नजर से घूरा था। ये वाकिया उस वक्त का है, जब गर्मियों के दिन थे और मेरी उम्र 11 बरस भी नहीं थी। मैं घर के पास की ही एक किराने की दुकान पर गई थी। वो आदमी मेरी और मेरी मां के पीछे लाइन में खड़ा था। वो मुझे लगातार ऊपर से नीचे तक घूर रहा था। वो शख्स मेरे पिता की उम्र का रहा होगा लेकिन मुझे उसकी निगाहें बिल्कुल भी दोस्ताना नहीं लगीं। मैं अपनी बाकी सहेलियों के मुकाबले जल्दी बड़ी हो गई थी। मेरे अंग कम उम्र में ही विकसित हो गए थे और मैं अपनी हम-उम्रों से ज्यादा बड़ी नज़र आने लगी थी।
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मेरा जहन, शरीर में आए इन बदलावों से ताल-मेल बिठाने में मुश्किल महसूस कर रहा था। बड़ी उम्र के मर्दों की घूरती निगाहें मुझे परेशान करती थीं। मैं परेशान हो जाती थी। असुरक्षित महसूस करती थी। मेरे पास से गुजरते अजनबी जब भी चुंबन लेने वाली आवाज़ निकालते, तो मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगता था और कलेजा मुंह को आता था। आज भी अगर मैं अपनी आंखें बंद कर लूं, तो करीब से गुजरती गाड़ियों से आती वो अश्लील और भद्दी आवाजें मुझे आज भी सुनाई देती हैं। मैं फिर से वही दस बरस की बच्ची बन जाती हूं, जो सब के सामने छोटे कपड़े पहनने से डरती हो। अनचाहे भद्दे कमेंट झेलना, खुद को घूरे जाने का तजुर्बा फिर भी दूसरे यौन अपराधों के मुकाबले छोटा मालूम होता है। फिर भी, तमाम स्टडी बताती हैं कि वो किसी बच्चे के लिए बेहद तकलीफदेह हो सकती हैं।
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car gang rape
उन्हें मनोवैज्ञानिक चुनौतियों का सामना करने का जोखिम उठाने को मजबूर होना पड़ सकता है। इसका असर उनके जहन पर पूरी जिंदगी रह सकता है। आज #MeToo जैसी मुहिम चलाकर कामकाजी महिलाएं यौन उत्पीड़न के प्रति आवाज बुलंद कर रही हैं लेकिन बच्चों का यौन उत्पीड़न आज भी ज्यादा चर्चा में नहीं है जबकि आज ये मुद्दा इतना अहम हो गया है कि इस पर चर्चा की सख्त जरूरत है। वजह साफ है। आज कल लड़कियां बड़ी कम उम्र में सयानी हो रही हैं। सयाने होने से मतलब ये कि आज लड़कियों की माहवारी बहुत कम उम्र में शुरू हो रही है। उनका शारीरिक विकास बहुत तेजी से कच्ची उम्र में ही होने लगा है। जैसे कि 1970 के दशक में अमरीका में बच्चियों के स्तनों के विकास की औसत उम्र 12 बरस हुआ करती थी। साल 2011 की एक स्टडी बताती है कि आज अमरीका में बच्चियों के अंगों के विकास की औसत उम्र घटकर 9 बरस रह गई है।

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एक शोध से पता चला है कि अमरीका में 18 फीसद गोरी, 43 प्रतिशत अश्वेत गैर-हिस्पैनिक और 31 फीसद हिस्पैनिक लड़कियों का मासिक धर्म नौवां जन्मदिन आते-आते शुरू हो जाता है। अब इसकी वजह क्या है इस पर रिसर्च अभी भी हो रही है। लेकिन कम उम्र में लड़कियों के शरीर का विकास होने की वजह से आज 6 से 8 बरस की बच्चियों के यौन शोषण का खतरा बढ़ गया है। जो लड़कियां कम उम्र में सयानी हो जाती हैं, उनके यौन उत्पीड़न का खतरा अपनी हम-उम्र उन लड़कियों के मुकाबले बढ़ जाता है जिनके अंगों का विकास देर से होता है। कम उम्र में सयानी होने वाली लड़कियों पर हम उम्र लड़कों की भी निगाहें होती हैं और उन्हें उम्र में बड़े वयस्कों की भी बुरी नजरों का सामना करना पड़ता है। कई बार तो ऐसी बच्चियों को जान-बूझकर निशाना बनाया जाता है।
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girl with laptop
लड़के या लड़कियां दोनों ही अगर वक्त से पहले जवान होने लगते हैं तो उनके यौन शोषण का जोखिम बढ़ जाता है। ब्रिटेन में बीबीसी की एक रिसर्च से पता चला है कि 6 साल की उम्र तक के बच्चों को स्टेशनों और रेल गाड़ियों में यौन उत्पीड़न का शिकार बनाया गया। अमेरिका के ओरेगन की रहने वाली कैरी जुएर्गेंस को आज भी 11 बरस की उम्र में हुआ एक हादसा याद है। तब वो अपने परिवार के साथ एक वाटर पार्क गई थीं। एक उम्रदराज शख्स ने कैरी का पीछा एक हॉट टब तक किया। उसने टब में अपना हाथ कैरी के ठीक पीछे रखा। फिर वो कैरी से बातें करने लगा। पूछने लगा कि 'तुम कितने बरस की हो, किस स्कूल में पढ़ती हो'। कैरी बताती हैं कि वो उस शख्स से बचने के लिए वाटर पार्क के तमाम हिस्सों में भागती फिरने लगीं लेकिन वो आदमी उनका पीछा करता रहा और उन्हें गुदगुदाने की कोशिश करता रहा।
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girl rape
कैरी कहती हैं, 'मुझे पता ही नहीं था कि इसका सामना कैसे करूं, क्योंकि लड़कियों को तो हमेशा विनम्र रहने की सीख दी जाती है।' कैरी कहती हैं, 'मैं आज भी उस दिन अपने जहन में आई बात याद करती हूं। तब मैंने सोचा कि औरत बनने का यही मतलब है तो मुझे औरत नहीं बनना।' यूं तो हर बच्ची को माहवारी शुरू होने और स्तनों के विकास के दौरान मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। मगर बहुत कम उम्र में सयानी होने वाली बच्चियों के लिए तो ये और भी बड़ी चुनौती है। हाल ही में 14 साल की उम्र वाली करीब 7 हजार बच्चियों पर एक रिसर्च की गई। पता चला कि पहली माहवारी के साथ ही ऐसी लड़कियों में तनाव पनपने लगता है। खाने की आदतें बदलने लगती हैं। बड़े होने पर भी ऐसी बच्चियों में डिप्रेशन, खान-पान की दिक्कतें और असामाजिक बर्ताव देखने को मिलता है।
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girl child hang suicide
अमेरिका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान की प्रोफेसर जेन मेंडल ने मासिक धर्म के मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर काफी रिसर्च की है। प्रोफेसर मेंडल कहती हैं, 'जल्दी माहवारी शुरू होने के मनोवैज्ञानिक सेहत पर बुरे असर की बातें दुनिया के तमाम देशों में रिसर्च से सामने आई हैं।' इसकी एक वजह ये भी हो सकती है कि ऐसी लड़कियां मर्दों की अनचाही नजरों का शिकार ज्यादा होती हैं। शरीर के उभरते अंगों के बारे में भद्दी बातें सुनने को मिल जाती हैं जो दिमाग पर बुरा असर डालती हैं। सयानापन जल्दी आने से लड़कियों का शरीर तो महिलाओं की तरह विकसित होने लगता है पर, उनकी सोच तो बच्चों वाली ही रहती है। किसी बच्ची के स्तन कम उम्र में ही विकसित हो गए हैं, तो उसका दिमाग तो बचपने वाला ही होता है। मासूम मस्तिष्क ऐसे वयस्कों वाले भद्दे कमेंट से जख्मी हो जाता है। प्रोफेसर जेन मेंडल कहती हैं, 'लड़कियों के शरीर का विकास, सब को दिखता है। पता चल जाता है।'

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save girl child
दस बरस की उम्र में मेरा पसंदीदा काम गुड़ियों से खेलना और छोटे भाई के साथ डिज्नी चैनल देखना था। जज्बाती तौर पर मैं खुद मर्दों की निगाहों का सामना करने के लिए तैयार नहीं थी। जिन देशों में लड़कियों के वयस्क होने यानी मासिक धर्म शुरू होने को शादी से जोड़कर देखा जाता है वहां स्थिति और गंभीर हो जाती है। यूनीसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में करीब 25 करोड़ लड़कियों की शादी 15 साल की उम्र से पहले कर दी जाती है। ये स्थिति सिर्फ विकासशील देशों की नहीं है बल्कि अमेरिका जैसे विकसित देश में भी देखने को मिलती है। ज्यादातर अमरीकी राज्यों में नाबालिग की शादी कुछ खास हालात में करने के कानून हैं। कई राज्यों में तो 13 साल से भी कम उम्र में शादी की इजाजत है।

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एक स्वयंसेवी संस्था, 'अनचेनड एट अ ग्लांस' के मुताबिक साल 2000 से 2010 के बीच अमरीका में करीब दो लाख 48 हजार बच्चों की शादी 12 साल तक की उम्र में की गई थी। बांग्लादेश के कबाइली इलाकों में तो पहली माहवारी के बाद ही शादी कर दी जाती है। जल्दी शादी करने के नतीजे बहुत खराब और लंबे समय तक रहने वाले होते हैं। सबसे पहले तो ऐसी बच्चियों की पढ़ाई छूठ जाती है। दूसरे, वो पूरी तरह शरीर विकसित होने से पहले ही गर्भवती हो जाती हैं। ऐसी हर 110 लड़कियों में से एक के मां बनने के वक्त मौत होने का अंदेशा रहता है। ये जोखिम 20 से 24 साल की उम्र में मां बनने से पांच गुना ज्यादा है। इथियोपिया जैसे देश में तो 10 साल की उम्र में शादी का सीधा ताल्लुक लड़कियों के खुदकुशी से पाया गया है। समस्या ये है कि लड़की जैसे ही बड़ी होने लगती है, तो उसके घर वालों को डर सताने लगता है कि कहीं वो किसी के साथ यौन संबंध न बना ले।

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नतीजा ये होता है कि कई बार तो लड़कियों की शादी, उनकी माहवारी शुरू होने से पहले ही इज्जत बचाने के नाम पर कर दी जाती है।विकासशील देशों जैसे नेपाल और बांग्लादेश में लड़कियों के बारे में ये सोच आम है कि वो मां-बाप के घर एक अनजान मर्द की अमानत होती हैं। लिहाजा मां-बाप जल्द से जल्द अमानत के अनजान दावेदार को ढूंढकर उसे सौंप देना चाहते हैं। नेपाल और बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर ऐसे हालात देखने को मिलते हैं। एक स्वयंसेवी संस्था 'केयर' से जुड़ी जेंडर स्पेशलिस्ट निदाल करीम का कहना है कि लड़कियों की सेक्सुआलिटी लड़कियों को छोड़कर सारे जमाने के लिए चिंता का विषय है।

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परीक्षा केंद्र पर लगी लंबी कतार। - फोटो : amar ujala
उन्हें जमाने से बचाने की कोशिश तो की जाती है लेकिन, लड़कियों को ये नहीं समझाया जाता कि अब वो जिंदगी के किन रास्तों से गुजरेंगी और खुद अपनी हिफाजत कैसे करनी है। जिन देशों में बाल विवाह आम बात नहीं है, वहां भी लड़कियों की माहवारी जल्दी शुरू होना बड़ी समस्या है। अमेरिका की रहने वाली पॉउलीन कैम्पोस फ्रीलांस लेखिका हैं। वो बचपन में यौन उत्पीड़न की शिकार हुई थीं। पाउलीन कहती हैं कि आठ बरस की उम्र में ही वो बी-कप साइज वाली ब्रा पहनने लगी थीं और ढीली-ढाली कमीज से अपने उभारों को छुपाने की कोशिश किया करती थीं। पाउलीन कहती हैं, 'मुझे अजीब महसूस होता रहता था। मेरा शरीर तो तेजी से बढ़ रहा था, मगर मेरा दिमाग उसके साथ कदम-ताल नहीं कर पा रहा था।' साल 2016 की एक स्टडी के मुताबिक 11 से 13 साल की उम्र में यौन शोषण का शिकार हुई बच्चियों में अपने शरीर के प्रति घृणा, तनाव और खुद को खत्म करने का भाव पनपने लगता है।

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बढ़ते शरीर और उभरते बदन का गहरा मनोवैज्ञानिक असर होता है। लड़कियां खुद को एक 'चीज' समझने की मनोवैज्ञानिक चुनौती का सामना करने लगती हैं। कई बार व डिप्रेशन में चली जाती हैं। समाजशास्त्री सीलिया रॉबर्ट का कहना है कि यौन उत्पीड़न किसी भी बच्चे को दूसरों के हाथ का खिलौना होने का एसहास कराता है। जबकि जो बच्चे इस तजुर्बे से नहीं गुजरे उन्हें वयस्कों की दुनिया खुद को समझने और अलग नजरिए से देखने का मौका देती है। बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न ज्यादातर स्कूल जैसी सुरक्षित जगहों पर ज़्यादा होता है। कई केस में देखा गया है कि बच्चों के साथी समूह में ही उन्हें शिकार बनाया गया है। अमेरिका में हुई रिसर्च बताती है कि 56 फीसद किशोरी लड़कियां और 40 फीसद किशोरों ने स्कूल में यौन उत्पीड़न की शिकायत की है।

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और ये सिलसिला उनके 6वीं कक्षा में पहुंचने से पहले ही शुरू हो गया था जबकि तब उनकी उम्र 11 से 12 बरस की रही होगी। इस उम्र की एक तिहाई लड़कियों का उनके साथी लड़के यौन उत्पीड़न अमेरिका में कर चुके होते हैं। जेन मेंडल कहती हैं कि कई बार हम उम्र बच्चे किसी लड़की के शरीर में आ रहे बदलाव के प्रति जिज्ञासु होते हैं। मगर कई बार वो बदनीयती से भी बहुत सी शैतानियां कर जाते हैं। माहवारी शुरू होने से लेकर स्तनों के विकास तक लड़कियों के सामने बहुत सी मनोवैज्ञानिक चुनौतियां होती हैं। उन्हें नहीं पता होता है कि उनका किरदार, उनकी पहचान क्या होगी। अक्सर ट्रांसजेंडर युवा और लेस्बियन लड़कियां भी शारीरिक विकास की वजह से यौन शोषण का शिकार होती हैं। 
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girl rape
अमेरिका में एक रिसर्च से पता चला है कि 81 फीसद ट्रांसजेंडर और 72 फीसद लेस्बियन लड़कियां यौन उत्पीड़न की शिकार हुईं। अश्वेत लड़कियों को तो और भी यौन शोषण झेलना पड़ता है। गड़बड़ी ये नहीं कि लड़कियां कम उम्र में जवान दिखने लगती हैं बल्कि समाज की सोच गलत है। स्वीडन की यूनिवर्सिटी ऑफ गोथेनबर्ग में मनोविज्ञान की प्रोफेसर थेरेसा स्कूग का कहना है कि ऐसे जागरूकता प्रोग्राम शुरू करने की जरूरत है जिनके जरिए लोगों को समाज में सभ्य तरीके से रहने का सलीका सिखाया जाए। उससे भी ज्यादा जरूरी है बच्चों को सेक्स एजुकेशन देना। वो सयाने होने से पहले समझ सकें कि कौन उन्हें किस नजर से देख रहा है ताकि वो दुलार और हवस में फर्क कर सकें। और हां, यौन शोषण के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' की नीति से भी काफी फर्क पड़ेगा।
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