फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कोरोना वायरस: महामारियों से क्या सबक लेंगे लोग, क्या बदलेंगे अपना खानपान?

Sat, 02 May 2020 11:22 AM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
विज्ञापन
1 of 6
साल 2002 की सार्स बीमारी और 2013 में पश्चिमी अफ्रीका में फैले इबोला के वक्त भी ऐसा ही हुआ जो मौजूदा कोविड-19 की महामारी में हो रहा है। ये किसी भी दूसरी महामारी में हो सकता है। ये सभी जानवरों से इंसानों में फैली वायरस वाली महामारी के उदाहरण हैं। एक नई स्टडी के अनुसार केवल इंसान ही इन महामारियों के शिकार नहीं हैं। प्रकृति के साथ जिस तरह से छेड़छाड़ की जा रही है, उससे इन महामारियों को बढ़ावा मिलता है। 

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के वेटनरी स्कूल में रिसर्चर क्रिस्टीन जॉनसन कहती हैं कि इंसान ही विषाणुओं को जानवरों से इंसान तक का रास्ता दिखा रहे हैं। अगली महामारी का चुपचाप इंतजार करने से पहले हमें जरूरी कदम उठाने होंगे। साइंस जर्नल 'प्रोसीडिंग्स ऑफ दी रॉयल सोसायटी बीः बॉयोलॉजिकल साइंसेज' में हाल ही में इस सिलसिले में एक रिसर्च पेपर पब्लिश हुआ है।

इस रिसर्च पेपर की लीड राइटर क्रिस्टीन जॉनसन कहती हैं, "वन्य जीवों और उनके आवास के साथ हम जिस तरह की छेड़खानी कर रहे हैं, उसका सीधा नतीजा है कि ये वायरस जानवरों से निकलकर हमारी दुनिया में आ गया। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का ये नतीजा है कि अब ये जानवर अपने विषाणु हमारे साथ शेयर कर रहे हैं। इंसान की गतिविधियों ने कई प्रजातियों को विलुप्त होने के कगार पर पहुंचा दिया है। इतना ही नहीं जानवरों की दुनिया की चीजें हमारी दुनिया में दाखिल हो रही हैं। ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी बेजा दखलंदाजी ने संकट की परिस्थिति खड़ी कर दी है जैसे कि हम अभी कोविड-19 की महामारी से गुजर रहे हैं।"
विज्ञापन

2 of 6
Pangolin
क्रिस्टीन जॉनसन और उनके सहयोगियों ने ऐसे 142 ज्ञात मामलों का अध्ययन किया है जहां कोई बीमारी जानवरों से होते हुए इंसानों तक पहुंच गई। क्रिस्टीन की टीम ने इस जानकारी को विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए जानवरों की रेड लिस्ट से मिलान करके देखा। ये रेड लिस्ट इंटरनेशनल यूनियन ऑफ कंजर्वेशन फोर नेचर (आईयूसीएन) ने तैयार की है।

हालांकि ये स्टडी स्तनपायी जीवों और विषाणुओं पर फोकस थी लेकिन इसकी बानगी साफ तौर पर दिखाई देती है। जैसा कि उम्मीद थी कि सदियों से हम जिन जानवरों को पालतू बनाकर अपने साथ रखते आए हैं, वही जानवर इंसानों तक वायरस पहुंचाने का प्रमुख स्रोत रहे हैं। बीमारियों का दूसरा प्रमुख स्रोत वे जीव हैं जो प्रकृति में इंसानी आबादी के करीब रहते हैं, जैसे चूहे, बंदर और चमगादड़। लेकिन इस रिसर्च का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए जानवरों से जुड़ा हुआ है।

किसी बीमारी या गैर-इंसानी गतिविधि की वजह से लुप्त होने की कगार पर पहुंच गए जीवों की तुलना में शिकार, तस्करी और प्राकृतिक आवास के खत्म होने के कारण अस्तित्व के संकट का सामना कर रहे जीवों ने इंसानों को बीमारी वाले विषाणुओं से दोगुना नुकसान पहुंचाया है।
विज्ञापन

3 of 6
प्रतीकात्मक तस्वीर
क्रिस्टीन के मुताबिक इससे संकेत मिलते हैं कि इंसानों की दखलंदाजी से वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास का स्वरूप बदल रहा है। क्रिस्टीन कहती हैं, "हमारे पास जो डेटा है, वो ये बताता है कि लुप्तप्राय प्रजातियों से वायरस के संक्रमण की दो प्रक्रियाएं हैं। एक तरफ तो शिकार और तस्करी के जरिए वन्य जीवों का दोहन किया जा रहा है। इससे इंसान जानवरों के संपर्क में आ रहा है। जानवरों के रक्त, मल-मूत्र, या उनसे निकलने वाले अन्य चीजों के संपर्क में मनुष्य आ रहा है और इससे इंसानों में संक्रमण का जोखिम बढ़ गया है। ये जानवर बाजार में बेचे जा रहे हैं। लोग इन जानवरों को दूसरे जानवरों के साथ पकड़कर रख रहे हैं। इस माहौल में विषाणुओं का एक जानवर से दूसरे जानवर तक पहुंचना आसान हो गया है।

अगर ये वन्य जीव अपने प्राकृतिक आवास में रहते तो ऐसा कभी नहीं होता। दूसरी प्रक्रिया में पारिस्थितिकी तंत्र के साथ इंसानों की छेड़छाड़ है। वन्य जीव दूसरी प्रजातियों के साथ दुर्लभ संसाधनों के लिए होड़ कर रहे हैं। अस्तित्व बचाने के लिए इंसानी आबादी की तरफ बढ़ रहे हैं। प्राकृतिक आवास के नुकसान और जैव विविधता पर खतरे ने वन्य जीवों में बीमारियों का स्वरूप बदल दिया है। जिस तरह से इंसानों की आबादी बढ़ रही है और बढ़ती जरूरतों के लिए वो जमीन का इस्तेमाल कर रहा है, उससे आने वाले समय में नए विषाणुओं के बार-बार उभरने की आशंका बढ़ जाती है।

4 of 6
निपाह (प्रतीकात्मक तस्वीर)
वायरस से होने वाली महामारियां
साल 2012 में प्रतिष्ठित अमरीकी विज्ञान पत्रकार डेविड क्वाम्मेन ने अपनी किताब 'स्पिलोवरः एनिमल इंफेक्शन एंड द नेक्स्ट ह्यूमन पैंडेमिक' ने इस बारे में चेतावनी दे दी थी। डेविड क्वाम्मेन ने अपनी किताब में जानवरों से इंसानों तक पहुंचने वाली वायरस जनित महामारियों की लंबी लिस्ट बताई है।

ये महामारियां हैं, मारबर्ग (1967), लास्सा (1969), निपाह (1998), एचआईवी (1981), हेंड्रा (1994), एवियन इंफ्लुएंजा वायरस(1997) और स्वाइन फ्लू वायरस (2009)। साल 2002 में फैली सार्स महामारी की शुरुआत चमगादड़ से हुई थी। चीन के रेस्तराओं में परोसे जाने वाले पॉम किवेट (एक तरह का कस्तूरी बिलाव) के गोश्त में चमगादड़ों से वायरस पहुंचा था।

कोरोना वायरस के बारे में भी ऐसा अंदेशा है कि ये चमगादड़ों से शुरू हुआ लेकिन इंसानों और चमगादड़ों के बीच कौन सा जानवर बिचौलिया बना, इस पर तस्वीर साफ नहीं है। अमेरिका के मोंटाना से डेविड क्वाम्मेन ने बीबीसी मुंडो को बताया, "इंसान हमेशा से जंगली जानवरों के संपर्क में रहता आया है। इसलिए विषाणुओं का जानवरों से इंसानों तक पहुंचना कोई नई बात नहीं है। 14वीं सदी में फैला बुबोनिक प्लेग जिसे ब्लैक डेथ भी कहते हैं, इसका एक और उदाहरण है कि इंसानों को कितना नुकसान उठाना पड़ा था।"
विज्ञापन

5 of 6
निपाह (प्रतीकात्मक तस्वीर)
महामारियों से सबक
लेकिन डेविड क्वाम्मेन ध्यान दिलाते हैं कि जानवरों से इंसानों को होने वाले संक्रमण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और इसकी वजह भी है। वे कहते हैं, "इंसानों की आबादी इतनी ज्यादा पहले कभी नहीं रही। इसलिए हम प्रकृति के साथ लगातार छेड़छाड़ कर रहे हैं। ज्यादा लोग जंगली जानवरों के संपर्क में आ रहे हैं क्योंकि वे शिकार करते हैं, उन्हें खाते हैं।"

"वायरस के जानवरों से इंसानों तक पहुंचने के लिए ये बेहद अनुकूल परिस्थिति है। इसके साथ ही हमारे पास यातायात के बहुत तेज साधन है। मान लीजिए कि एक वायरस किसी इंसान को संक्रमित कर लेता है तो महज 20 घंटे के अंदर वो आधी दुनिया का सफर तय कर सकता है। हम कांगो, बोर्नियों और अमेजन जैसी जगहों पर पहुंच गए हैं। हमने वहां उद्योग लगाए हैं। उनकी जिंदगी में दखल दिया है। हम अपने पालतू जानवरों के साथ उनके बीच रह रहे हैं।"
विज्ञापन
विज्ञापन

6 of 6
खाने की थाली
कोरोना वायरस से फैली महामारी से क्या सबक मिलते हैं, इस पर डेविड क्वाम्मेन कहते हैं, "मेरी नजर में इस महामारी के दो सबक हैं। अगर हम भविष्य में ऐसी स्थिति से बचना चाहते हैं तो हमें अपने खान-पान में क्रांतिकारी बदलाव लाने होंगे ताकि जंगली जानवरों के प्राकृतिक आवास का विध्वंस रोका और कम किया जा सके।"

"और दूसरा ये कि अगर हम भविष्य में आने वाली महामारियों से बचना चाहते हैं तो हमें अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य की व्यवस्था को दुरुस्त करना होगा। हमें प्रशिक्षित लोगों की जरूरत होगी। पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट किट्स, जांच की व्यवस्था और वैक्सीन के इंतजाम में हम देरी नहीं कर सकते। राजनेताओं को समझना होगा कि महामारियां एक वास्तविक खतरा है।"
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें