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सेक्स को लेकर ये सब सोचते हैं भारतीय? महिलाओं की भी है अलग सोच

Sat, 15 Feb 2020 06:27 PM IST
नवनीत राठौर लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
भारत में सेक्स ऐसा मसला है, जिसमें दिलचस्पी तो सबकी है, लेकिन बात करने से लोग हिचकते हैं। पुरुष तो फिर भी सेक्स के बारे में अपना नजरिया बयां कर देते हैं। लेकिन महिलाएं अगर खुलकर इस बारे में बात करना भी चाहें, तो उन्हें गलत नजरों से देखा जाता है। सेक्स के मामले में महिलाएं शर्म और सामाजिक बंदिशों के चलते अक्सर मौन रहती हैं।

यूं तो प्राचीन भारतीय समाज शारीरिक संबंधों को लेकर काफी खुले जहन का रहा था। जिसकी मिसाल हमें खजुराहो के मंदिरों से लेकर वात्स्यायन के विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ कामसूत्र तक में देखने को मिलती है। लेकिन जैसे-जैसे समाज आगे बढ़ा, हमारा देश जिस्मानी रिश्तों के प्रति संकुचित होता चला गया। मर्द-औरत के यौन संबंध से जुड़ी बातों में पर्देदारी और पहरेदारी हो गई। हालांकि, अब यौन संबंधों को लेकर फिर से एक बड़ा बदलाव आ रहा है। ऐसा बदलाव जो क्रांतिकारी है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
बढ़ेगा लैब में बच्चे पैदा करने का ट्रेंड
कुदरती तौर पर सेक्स का मतलब सिर्फ बच्चे पैदा करने और परिवार बढ़ाने तक ही सीमित था। लेकिन साइंस की बदौलत अब सेक्स के बिना भी बच्चे पैदा किए जा सकते हैं। आईवीएफ और टेस्ट ट्यूब के जरिए ये पूरी तरह संभव है। दुनिया का पहला टेस्ट ट्यूब बेबी 1978 में पैदा हुआ था। उसके बाद से अब तक करीब 80 लाख बच्चे इस तकनीक के जरिए दुनिया में आ चुके हैं। रिसर्चरों का मानना है कि भविष्य में इस तरीके से पैदा हुए बच्चों की तादाद में भारी इजाफा देखने को मिलेगा।

लेखक हेनरी टी ग्रीली का कहना है कि आने वाले समय में 20 से 40 साल की उम्र वाले सेहतमंद जोड़े लैब में गर्भ धारण कराना पसंद करेंगे। वो सेक्स बच्चा पैदा करने के लिए नहीं बल्कि जिस्मानी जरूरत और खुशी के लिए करेंगे। अगर बच्चे बिना सेक्स के पैदा हो सकते हैं तो फिर सेक्स की क्या जरूरत है?

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
सेक्स का काम मर्द, औरत की जिस्मानी जरूरत को पूरा करना और उन दोनों का रिश्ता मजबूत करना है। लेकिन यहां भी धर्म बहुत बड़ा रोड़ा है। हर धर्म, यौन संबंध को लेकर कई तरह की पाबंदियां और नियम-कायदे बताता है। ईसाई धर्म में कहा गया है कि मर्द-औरत को सेक्स सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिए करना चाहिए। अगर शारीरिक सुख और खुशी के लिए सेक्स किया जाए तो वो अनैतिक है। हालांकि ईसाई धर्म की भी पुरानी किताब के सोलोमोन सॉन्ग में जोश के साथ सेक्स करने को बेहतरीन बताया गया है। साथ ही यौन संबंध को पति-पत्नी के बीच ही नहीं, बल्कि दो प्यार करने वालों के बीच की निजी चीज बताया गया है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
ग्रीस के बड़े दार्शनिक अरस्तू इस विषय पर रोशनी डालते हुए कहते हैं कि प्यार कामुक इच्छाओं का अंत है। यानी अगर दो लोगों के बीच मोहब्बत है तो उसका मुकाम शारीरिक संबंध बनाने पर पूरा होता है। इनके मुताबिक सेक्स कोई मामूली काम नहीं है। बल्कि, ये किसी को प्यार करने और किसी का प्यार पाने के लिए एक जरूरी और सम्मानजनक काम है। जबकि अमरीकी समाजशास्त्री डेविड हालपेरिन का कहना है कि सेक्स सिर्फ सेक्स के लिए होता है। उसमें जरूरत पूरी करने या कोई रिश्ता मजबूत करने जैसी कोई चीज शामिल नहीं होती। हो सकता है कि जब इंसान ने सेक्स शुरू किया हो, तब वो सिर्फ शारीरिक जरूरत पूरी करने का माध्यम भर रहा हो। लेकिन जब परिवार बनने लगे, तो हो सकता है कि इसे रिश्ता मजबूत करने का भी माध्यम समझा जाने लगा।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
लेकिन आज समाज पूरी तरह बदल गया है। आज तो सेक्स पैसे देकर भी किया जा रहा है। बहुत से लोग पेशेवर जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए सेक्स को हथियार बनाते हैं। ऐसे हालात में यकीनन किसी एक की शारीरिक जरूरत तो पूरी हो जाती है। लेकिन, रिश्ता मजबूत होने या जज्बाती तौर पर एक दूसरे से जुड़ने जैसी कोई चीज नहीं होती। ऐसे में फिर सेक्स का मतलब क्या है? इसका मतलब यही है कि सेक्स सिर्फ सेक्स के लिए किया जाए। इसमें बारीकियां ना तलाशी जाएं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
सेक्स है क्या?
बदलते समय के साथ आज ना सिर्फ इंसानी रिश्ते बदल रहे हैं। बल्कि यौन संबंध को लेकर लोगों का बर्ताव और रिश्तों के प्रति सोच भी बदल रही है। 2015 में अमरीका की सैन डियागो यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर जीन एम ट्वींग ने एक रिसर्च पेपर में कहा था कि 1970 से 2010 तक अमरीका में बहुत हद तक लोगों ने बिना शादी के सेक्शुअल रिलेशनशिप को स्वीकार करना शुरू कर दिया था।

नई पीढ़ी का मानना है कि सेक्शुएलिटी समाज की बंदिशों में नहीं बंधी होनी चाहिए। रिसर्चर ट्वींग के मुताबिक सेक्शुअल नैतिकता समय की पाबंद नहीं है। उसमें बदलाव होते रहे हैं, हो रहे हैं और आगे भी जारी रहेंगे। अब तो ये बदलाव इतनी तेजी से हो रहे हैं कि शायद हम ये बदलाव स्वीकार करने के लिए तैयार भी नहीं हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
जिस्मानी रिश्ते केवल मर्द और औरत के बीच नहीं बनते। बल्कि लेस्बियन और गे रिलेशनशिप को भी कई देशों ने मान्यता देनी शुरू कर दी है। ये कोई मानसिक या शारीरिक विकृति भी नहीं है। हालांकि धार्मिक और सामाजिक दोनों ही रूप से इसे अनैतिक व्यवहार माना जाता रहा है। धर्म तो कहता है कि समान लिंग वाले जानवर तक आपस में संबंध नहीं बनाते। क्योंकि वो जानते हैं कि ये अनैतिक है। जबकि साइंस कहती है कि जापानी मकाक, फल मक्खियां, फ्लोर फ्लाइज, अल्बाट्रॉस पक्षी और बोटल नोज डॉल्फिन समेत ऐसी करीब 500 प्रजातियां हैं, जिनके बीच होमोसेक्शुएलिटी होती है। लेकिन हम इन्हें, लेस्बियन, गे या हेट्रोसेक्सुअल जैसे नाम नहीं देते।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
आखिर इन सबके बीच लाइन खींची किसने? शायद उन लोगों ने जिन्होंने सेक्स को सिर्फ बच्चे पैदा करने की जरूरत समझा। अगर 'सेक्स क्यों'? के जुमले से सवालिया निशान हटा लिया जाए तो शायद लोग इसका बेहतर मतलब समझ पाएंगे। सेक्स की ख्वाहिश कुदरती प्रक्रिया है। जैसे-जैसे यौन सबंध के प्रति लोगों की सोच बदल रही है, वैसे-वैसे लोगों ने गे और लेस्बियन रिश्तों को भी स्वीकार करना शुरू कर दिया है।
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हाल ही में 141 देशों में की गई रिसर्च ये बताती है कि 1981 से 2014 तक एलजीबीटी समुदाय को स्वीकार करने की दर में करीब 57 फीसद इजाफा हुआ है। इसमें मीडिया, मेडिकल सपोर्ट और मनोवैज्ञानिक संस्थाओं के सकारात्मक साथ ने बहुत अहम रोल निभाया है। इसके अलावा आज पोर्न देखने का चलन जितना बढ़ चका है, उससे साफ जाहिर है कि लोगों में सेक्स की भूख कितनी ज्यादा है। पोर्न देखने से कुछ मिले या ना मिले, लेकिन सेक्स की ख्वाहिश बहुत हद तक शांत हो जाती है।
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