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Childfree Marriage: शादी तो चाहिए पर बच्चा नहीं, लोग क्यों चुन रहे हैं संतान-मुक्त जिंदगी?

Thu, 11 Dec 2025 11:16 AM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Childfree Marriage Concept: साल 2025 में चाइल्ड फ्री शादी का चलन क्यों बढ़ा है। आइए जानते हैं संतानमुक्त शादी के क्या फायदे हैं और क्या चुनौतियां हैं।
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चाइल्ड फ्री शादी का चलन क्यों बढ़ रहा है? - फोटो : Amar Ujala
Childfree Marriage Concept: भारतीय परिवारों में शादी का एक मुख्य उद्देश्य वंश आगे बढ़ाना भी होता है। वैवाहिक बंधन में बंधकर लोग बच्चा पैदा करने की सामाजिक स्वीकृति प्राप्त कर लेते हैं। हालांकि बदलते दौर में अब कई दंपत्तियों के लिए बच्चा प्राथमिकता नहीं रह गया है। लोग शादी तो करते हैं लेकिन बच्चा नहीं चाहते हैं। इस नए विचार को Childfree Marriage या संतान मुक्त शादी कहते हैं। असल में बच्चे न चाहने की सोच अब गुजरती उम्र, बदलती प्राथमिकताएं और आर्थिक सामाजिक दायित्वों के बीच एक तेजी से उभरती प्रवृत्ति बन चुकी है।

जहां पितृ परंपरा कहती है कि शादी के बाद संतान अनिवार्य है, आज कई दंपत्ति अपने जीवन, अपने शौक, अपने आराम को बच्चे से ऊपर रख रहे हैं। हाल ही में चाइल्ड फ्री मैरेज का एक  उदाहरण बिग बाॅस विनर गौरव खन्ना और उनकी पत्नी अकांक्षा के जरिए देखने को मिला, जहां अकांक्षा ने बताया कि उन्हें बच्चा नहीं चाहिए, वह इसके लिए तैयार नहीं हैं। साल 2025 में कई दंपत्तियों ने संतान मुक्त जिंदगी के विचार को अपनाया। आइए जानते हैं क्यों दंपति शादी के बाद बच्चा नहीं चाहते हैं। चाइल्ड फ्री मैरिज के क्या फायदे हैं और क्या नुकसान हो सकते हैं। 
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 भारत में चाइल्ड फ्री मैरिज का विचार - फोटो : istock
 भारत में चाइल्ड फ्री मैरिज का विचार

चाइल्ड फ्री मैरिज का काॅन्सेप्ट दुनिया के कई देशों में खासकर पाश्चात्य संस्कृति में देखने को मिला लेकिन अब भारत में भी धीरे-धीरे यह विचार सामने आ रहा है। शहरों में, खासतौर पर मेट्रो-क्लास, युवा, शिक्षित दंपत्तियां अब वैवाहिक होने के बावजूद बच्चा नहीं चाहते हैं।जहां एक ओर पारंपरिक परिवार और बुजुर्गों की उम्मीदें है, वहीं दूसरी ओर बदलती आर्थिक जरूरत, बदलता जीवन-शैली, बढ़ता निजीकरण, शहरीकरण और बढ़ता खर्च सब मिलकर एक नई सोच को जन्म दे रहे हैं। युवा दंपत्ति अब खुद की पहचान, खुद की आज़ादी, अपने रिश्ते की गहराई चाह रहे हैं और संतान को अनिवार्य नहीं मानते।

क्यों बढ़ रहा है Childfree Marriage का चलन
  • आधुनिक ज़िंदगी की व्यस्तता और बढ़ती ज़िम्मेदारियां इसका एक कारण है। वर्क-प्रेशर और करियर बनाने की होड़ में बहुत से दंपत्ति महसूस करते हैं कि बच्चे पालना इन सबके बीच असंभव है।
  • एक कारण आर्थिक बोझ और भविष्य की अनिश्चितता है। बच्चों की परवरिश, शिक्षा, स्वास्थ्य, उनकी देखभाल आदि पर खर्च बढ़ गया है। कई दंपत्ति सोचते हैं कि वे जितना आराम, ट्रैवल या निजी स्वतंत्रता चाहते हैं, बच्चे होने पर उसमें कमी आ जाएगी। 
  • व्यक्तिगत आज़ादी, आत्मनिर्भरता और आत्मसंतुष्टि के लिए भी चाइल्ड फ्री मैरिज की सोच बढ़ी। कुछ दंपत्ति महसूस करते हैं कि विवाह का मतलब सिर्फ “बच्चा” नहीं, बल्कि दो आत्माओं का साथ, साझी ज़िंदगी और एक-दूसरे की पहचान है। उनके लिए बच्चा होना विवाह का मकसद नहीं। 
  • मानसिक और शारीरिक तौर पर तैया न होना भी एक मुख्य कारण है। आजकल कपल्स मानसिक या शारीरिक तौर पर बच्चे की ज़िम्मेदारी उठाने के लिए तैयार नहीं होते हैं। उनके जीवन की प्राथमिकताएं अलग होती है। 
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परिवार का दबाव - फोटो : Adobe stock
संतानमुक्त जिंदगी के फायदे


स्वतंत्रता और निजी जीवन में संतुलन

दंपत्ति समय, ऊर्जा और संसाधन अपने लिए इस्तेमाल कर पाते हैं। बच्चा न होने पर लोग अपने करियर, यात्रा, शौक और रिलेशनशिप की क्वालिटी पर वक्त दे सकते हैं।

आर्थिक स्थिरता और बचत

बच्चे पालने, पढ़ाने, उनकी ज़रूरतों, स्वास्थ्य और भविष्य सब पर खर्च बचता है। चाइल्ड फ्री मैरिज में दंपत्ति अपनी कमाई और खर्च़ों पर नियंत्रण रख सकते हैं।

रिश्ते की गहराई और साझेदारी की ताकत

जहां बच्चे होने से समय और ऊर्जा बच्चों में लग जाती है। वहीं बिना बच्चे की जिम्मेदारियों के पति-पत्नी अपने रिश्ते, एक-दूसरे को बेहतर समझने और अपनी बातें साझा करने के लिए समय निकाल पाते हैं। इससे रिश्ते में सामंजस्य और आत्मीयता बनी रहती है।

मानसिक और भावनात्मक जीवन आसान

विशेष रूप से यदि बच्चे पालने की ज़िम्मेदारी, सामाजिक दबाव, आर्थिक बोझ आदि से मानसिक तनाव हो, तो चाइल्ड फ्री जीवन तनाव और दबाव कम कर सकता है।

स्वतंत्र चुनाव और पारिवारिक पैटर्न की आज़ादी

यह दिखाता है कि विवाह और परिवार का मतलब सिर्फ संतान नहीं हैं। शादी में दो इंसानों का संबंध, उनकी साझा ज़िंदगी और उनकी खुशी भी मायने रखती है। आधुनिक सोच में यह कदम उनके लिए एक नया विकल्प बन गया है।
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बुढ़ापे का सहारा - फोटो : instagram
शादी के बच्चा न होन के नुकसान और चुनौतियां

सामाजिक-परिवारिक दबाव

चाइल्ड फ्री मैरिज को भारत जैसे देश में मान्यता नहीं मिली है। पारंपरिक सोच वाले समाज में संतान मुक्त शादी से समाज और परिवार की आलोचना का सामना कर ना पड़ सकता है। दंपति पर बेकारी, स्वार्थीपन जैसे आरोप लग सकते हैं। बिना बच्चा उनका परिवार अधूरा माना जा सकता है। 

बुढ़ापे में अकेलापन, देखभाल की कमी

बच्चों को बुढ़ापे का सहारा भी माना जाता है। बच्चों की अनुपस्थिति में वृद्धावस्था में परिवार के सहारे, देखभाल आदि में दिक्कत हो सकती है। कई लोग इसे बाद में पछतावा मानते हैं।

मनोवैज्ञानिक दबाव और आत्मीयता पर असर

समाज की टिप्पणियां, रिश्तेदारों की उम्मीदें और शादी में संतान का सवाल कभी-कभी ये दंपत्ति की मानसिक शांति भंग कर सकते हैं। उन्हें लोगों के ताने और सवालों का सामना करना पड़ सकता है।

परंपरागत मूल्य और संस्कृति से टकराव

हमारी संस्कृतिक पृष्ठभूमि में परिवार, संतान और अगली पीढ़ी बहुत अहम है। ऐसे फैसले पारिवारिक असहमति, अकेलापन, सामाजिक अलगाव ला सकते हैं।

जनसंख्या और सामाजिक संरचना पर दीर्घकालीन प्रभाव

यदि यह सोच व्यापक हो जाए, तो कम जन्म-दर सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां ला सकती है। जैसे बुजुर्गों की संख्या ज्यादा, युवा श्रमिक कम और सामाजिक सुरक्षा प्रणाली पर दबाव।
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