पर इससे ज़्यादा की उम्मीद भी नहीं थी।मां ने बताया था ऐसा ही होता है।वहां तक भी ठीक था।फिर पहली बेटी हुई ,फिर पहली मारपीट,फिर उसने पहली बार शराब पी, फिर बिस्तर में सारा गुस्सा निकला,फिर दूसरी बेटी हुई, फिर उसने काम छोड़ दिया, फिर मैंने काम करना शुरू किया,फिर तीसरी बेटी हुई।
'बेटे की चाह से जुड़ गई थी मेरी जिंदगी'
मुझसे मारपीट, मेरे कमाए पैसों से शराब और बिस्तर में शैतान की तरह मेरे ही शरीर का इस्तेमाल, सब जारी रहा, पर मैं चुप रही। औरत के साथ ये सब होता है मां ने बताया था।चौथी बार जब मैं पेट से थी तो 20 की हो गई थी। अधमरे से मेरे शरीर को जब मैडम (जिनके घर मैं काम करती थी) ने फिर फूलते देखा तो नाराज हो गईं।
पूछा, पैदा कर पाओगी? इतना खून भी है शरीर में? मैंने कहा, हो जाएगा।सोचा बड़े घर की ये औरत क्या समझेगी मेरी जिंदगी को। बेटा पैदा होने तक मुझे ये सब झेलना ही था।बैंक में पैसे जमा करने की सलाह और मदद एक बात थी पर घर-परिवार की ये बारीकी नहीं समझा सकती थी उन्हें।मन करता था कि सब चुपचाप हो जाए। किसी को पता ना चले कि मैं पेट से हूं, मेरा शरीर ना बदले, मेरी जिंदगी की कहानी भरे चौराहे पर ना ला दे।मुझे यकीन था कि बेटा हो जाएगा तो सब ठीक हो जाएगा। मारपीट, शराब, बिस्तर का वो मनहूस सिलसिला टूट जाएगा और इस बार बेटा ही हुआ!