Depression
आज इस विषय पर लिखते हुए बचपन की वह याद ताजा हो आती है कि जब बात-बात पर जाति पूछ लेने वाले पूर्वांचली समाज का हिस्सा होते हुए भी मेरा बालमन यह सोच कर अपनी जाति बताने से कतराता था कि समाज में मेरी जाति को सबसे निचला दर्जा मिला है। जब पापा से इस बाबत पूछती तो वो कहते कि अपनी पहचान अथवा जाति को छुपाना गलत है। जब भी कोई पूछे पूरे आत्मविश्वास के साथ बताओ कि मैं अमुक जाति की हूं! बड़ी हुई तो यह समझ विकसित हुई कि व्यक्ति की पहचान के बनने में उसकी जाति, धर्म, लिंग, नस्ल आदि का योगदान ज़रूर होता है लेकिन ये सब व्यक्ति को दी गई पहचानों का हिस्सा हैं और मनुष्य की असल पहचान वह होती है, जिसे वह खुद अर्जित करता है। लेकिन इस वाकये से मैंने महसूस किया कि मेरी अर्जित पहचान यानी मेरी शिक्षा, मेरे प्रोफेशन आदि बेमानी थे और मेरी जाति मेरी पहचान थी।