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भागी हुई लड़कियां: 'जाति का भूत प्यार का पीछा करता रहा'

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Polish Girl - फोटो : VideoBlocks
लड़कियां जब घर से अपनी ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए निकलीं तो ज्यादातर मौकों पर 'भागी हुई लड़कियां' कहलाईं। 'भागी हुई लड़कियां' कवि आलोकधन्वा की कविता भी है। जिसके लिखे जाने से पहले और लिखे जाने के बाद न जाने कितनी ही लड़कियां भागी हैं। बीबीसी हिंदी की सिरीज- 'भागी हुई लड़कियां'। सिरीज के इस नाम से हमारा मतलब इसके शाब्दिक अर्थ की बजाय उस चुनौती से है, जो इन लड़कियों ने जब समाज को दी तो 'भागी हुई लड़कियां' कहलाईं। इन लड़कियों के मन में जो सपने थे, उन्हें घरों की बंदिशें रोक नहीं पाईं। इन लड़कियों ने सिर्फ दिल की सुनी। आगे की कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी...
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couple end marriage - फोटो : Social Media
विभावरी
एक ऐसे समाज में जहां शादी को प्यार की सफलता मान लिया जाता है। शादी यानी धर्म, जाति और वर्ग को नकार कर किए प्यार के संघर्षों का अगला पायदान। शादी के मार्फ़त प्यार को एक ख़ास तरह के सांचे में ढालने की कोशिश, इस संघर्ष को लगातार जटिल बनाती जाती है। दादी-नानी की कहानियों और '…And they lived happily ever after' जैसी सोच से बिल्कुल अलग जब असल जीवन में प्यार... शादी में तब्दील होता है तो न सिर्फ दो परिवारों की अपेक्षाओं की दुश्वारियां साथ लाता है बल्कि उन दो प्रेमियों के एक-दूसरे के साथ अथवा दूर रहते हुए एक साझे स्पेस में अपनी पहचान कायम करने की कोशिशें भी इस वैवाहिक रिश्ते को तमाम तरीकों से प्रभावित करती हैं। ठीक इसी तर्ज पर शादी, हमारे प्यार की यात्रा का भी एक पड़ाव रहा।
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Marriage - फोटो : Social Media
इन हालात में जहां एक तरफ अपने पसंद के साथी को जीवन-साथी के रूप में पा लेने की खुशी आपको आश्वस्त करती है, वहीं साथी के परिवार का इस संबंध से नाखुश होना एक चुनौती बन कर उभरता है। हम दोनों के मामले में 'जाति' एक ऐसे सच के तौर पर उभरी, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। एक पक्ष की नाराजगी के बाद शादी करना खुद में ही एक बड़ी इमोशनल चुनौती थी। हमारी शादी के कुछ साल बाद जब मेरे साथी प्रियंवद के परिवार से संबंध सामान्य हुए, तब भी मेरी 'जाति का भूत' हमारे रिश्ते का पीछा करता रहा और शायद आज तक कर रहा है। इसका हासिल यह रहा कि मेरे और प्रियंवद के परिवारों के बीच आज तक वैसे संबंध न बन सके, जिसकी उम्मीद समाज करता है।

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Depression
मुझे एक वाकया याद आता है, जो पहली बार प्रियंवद के घर जाने पर मेरे साथ घटा। शादी के तीन साल बाद हम दोनों पहली बार प्रियंवद के घर गए थे। लिहाजा लोग हम दोनों से और खासतौर पर मुझसे मिलने के लिए आ रहे थे। एक सज्जन, जो इनके पिताजी के दोस्त थे और हमसे मिलने आए और मुझसे मेरे घर-परिवार और नेटिव प्लेस के विषय में पूछने लगे। इससे पहले कि मैं कुछ जवाब देती, पिताजी ने कहा, ''ये इलाहाबाद से हैं और इनकी पढ़ाई-लिखाई भी वहीं से हुई है।''
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Depression
वो अच्छी तरह जानते थे कि मैं गोरखपुर से हूं और स्कूलिंग के बाद मेरी पढ़ाई-लिखाई इलाहाबाद यूनिवर्सिटी और जेएनयू से हुई है। बावजूद इसके उनका मेरा नेटिव प्लेस इलाहाबाद बताना इसी बात की ओर इशारा कर रहा था कि वे मेरी पहचान उन पर जाहिर करना नहीं चाह रहे थे, क्योंकि उस व्यक्ति का संबंध भी गोरखपुर से था. और सही जवाब देने पर जाति समेत मेरी पूरी पहचान उन पर जाहिर हो जाने का खतरा था।
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demo pic
देखा जाए तो यह बहुत छोटी सी बात थी, जिसे 'आई-गई' समझ कर शायद भुला देना बहुत आसान रहता लेकिन प्यार का रिश्ता इस मायने में खास होता है कि यह बराबरी का मौका देता है और अगर नहीं देता है तो देना चाहिए। जब हम प्यार में होते हैं तो अपने पूरे वजूद या अपनी पूरी शख्सियत के साथ होते हैं। अपनी सकारात्मकताओं और नकारात्मकताओं के साथ होते हैं, इसलिए कोई भी ऐसी बात जो इस रिश्ते की बराबरी को चोट पहुंचाती है। वह दरअसल इस प्रेम का सम्मान तो नहीं कर रही होती और उसका विरोध होना ही चाहिए। बावजूद इसके मैं अपनी पहचान के बदले जाने पर उस वक्त और आज तक कोई विरोध नहीं कर पाई।
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Depression
आज इस विषय पर लिखते हुए बचपन की वह याद ताजा हो आती है कि जब बात-बात पर जाति पूछ लेने वाले पूर्वांचली समाज का हिस्सा होते हुए भी मेरा बालमन यह सोच कर अपनी जाति बताने से कतराता था कि समाज में मेरी जाति को सबसे निचला दर्जा मिला है। जब पापा से इस बाबत पूछती तो वो कहते कि अपनी पहचान अथवा जाति को छुपाना गलत है। जब भी कोई पूछे पूरे आत्मविश्वास के साथ बताओ कि मैं अमुक जाति की हूं! बड़ी हुई तो यह समझ विकसित हुई कि व्यक्ति की पहचान के बनने में उसकी जाति, धर्म, लिंग, नस्ल आदि का योगदान ज़रूर होता है लेकिन ये सब व्यक्ति को दी गई पहचानों का हिस्सा हैं और मनुष्य की असल पहचान वह होती है, जिसे वह खुद अर्जित करता है। लेकिन इस वाकये से मैंने महसूस किया कि मेरी अर्जित पहचान यानी मेरी शिक्षा, मेरे प्रोफेशन आदि बेमानी थे और मेरी जाति मेरी पहचान थी।
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self confidence
लिहाज़ा हमारी शादी का विरोध हुआ और इसे स्वीकार करने के बावजूद मेरी जातिगत पहचान के ज़ाहिर हो जाने का डर तमाम रास्तों से मुझ तक पहुंचता रहा। मेरे पैतृक शहर का नाम गलत बताना इसी डर का नतीजा था। आज इस राइट-अप को लिखते हुए भी मुझे नाम बदलकर लिखने का ऑप्शन दिया गया था। लेकिन मेरा इस बात पर गहरा भरोसा है कि अपने सच को अपनी पहचान के साथ कहने का हौसला आपको थोड़े वक्त के लिए तकलीफ़ भले दे लेकिन लंबे समय में खुद के प्रति अपराध-बोध से ग्रसित होने से बचा ले जाता है। लिहाज़ा अपने नाम और पहचान के साथ यह राइट-अप लिख रही हूं। और प्रेम के बारे में सिर्फ़ इतना ही कि वो क़दम-दर-क़दम एक संघर्ष है, जिसका प्रतिपक्ष कभी समाज होता है तो कभी आप खुद!
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