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Raksha Bandhan 2022: छोटे भाई- बहनों के लिए बुरा हो सकता है ओवरप्रोटेक्टिव होना

Thu, 11 Aug 2022 06:49 AM IST
स्वाति शर्मा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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ज्यादा लाड़ पैदा करता है मुश्किलें - फोटो : iStock
लाड़, दुलार, स्नेह, प्रेम और ध्यान रखना किसी भी रिश्ते में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। रिश्तों को अटूट बनाये रखने में यह भावना हमेशा मजबूत कड़ी का काम करती है। भाई-बहन का रिश्ता भी इससे अछूता नही है। लेकिन अगर ध्यान रखने की यह आदत ओवरप्रोटेक्शन में बदल जाये तो मुश्किल खड़ी हो सकती है। यह न केवल उस व्यक्ति के लिए आगे जाकर परेशानियां पैदा कर सकती है, बल्कि उसके पूरे व्यक्तित्व पर नकारात्मक असर भी डाल सकती है। 

अधिकांशतः ओवरप्रोटेक्शन की यह आदत या कहें किसी का जरूरत से ज्यादा ध्यान रखने की आदत छोटे भाई या बहनों के मामले में होती है। या फिर उन परिवारों में जहां कोई बच्चा पूरे परिवार में अकेला हो। ऐसे में परिवार का पूरा ध्यान इस ओर होता है कि उस बच्चे को कहीं गलती से भी कुछ नुकसान न पहुंचे। इस चक्कर में बच्चे के व्यक्तित्व को एक सामान्य इंसान की तरह देखा ही नही जाता और वह हमेशा के लिए दूसरों पर निर्भर होकर रह जाता है। 
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छोटे भाई को भी बनायें जिम्मेदार - फोटो : Istock
गलत है यह आदत

चाहे भाई छोटा हो या बहन, जरूरी है कि जीवन के महत्वपूर्ण सबक वह अपने बल पर सीखे। यदि हमेशा बड़ा भाई या बड़ी बहन उसके साथ छाया बनकर रहेंगे तो वह पनपेगा कैसे? ऐसा कई घरों में होता है कि छोटे भाई या बहन को या तो बाजार के काम नही करने दिए जाते, उसे कहीं अकेला नहीं भेजा जाता या अगर स्कूल एक ही है तो वहां भी बड़ा भाई या बहन उसके हर कदम पर उसके साथ होता है/होती है। इससे छोटे भाई या बहन में न तो अपने काम खुद करने की आदत पड़ती है न ही वह कोई जिम्मेदारी लेना पसंद करता है। यह बात बड़े होने पर उसके ही जीवन में बाधा की तरह आकर अड़ जाती है। इसलिए जरूरी है कि यह गौर किया जाए कि कहीं आप अपने भाई- बहन को लेकर ओवरप्रोटेक्टिव तो नहीं!
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सहज वातावरण में मिले खेलने कूदने का अवसर - फोटो : istock
क्या आप उसे दुख पहुँचने की कल्पना से भी डरते हैं?

गिरने पर लगने वाली कोई चोट हो या फिर दिल दुखने का मामला। हर इंसान गिर कर ही सम्भलना सीखता है। अगर किसी को कभी कोई चोट ही नही लगेगी तो वह दर्द को भी कैसे जानेगा और जीवन को कैसे समझेगा? इस डर के कारण अगर आप छोटे भाई या बहन को कुछ करने ही नहीं देंगे तो उसके व्यक्तित्व का विकास भी नहीं हो पायेगा। चाहे दोस्तों के साथ खेलने की बात हो या गाड़ी चलाना सीखने की, उसे आज़ादी दें कि वह सही तरीके से इन्हें सीखे और जाने। उसे गिरकर सम्भलना और चुनौतियों से लड़ना भी सिखाएं। हां, उसके साथ हमेशा संबल बनकर जरूर खड़े रहें। 

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मिलकर लें जिम्मेदारियां - फोटो : istock
तू मत जा, मैं कर देता हूँ

बाजार से कोई सामान लाना हो, छोटे भाई-बहन की स्टेशनरी लेने जाना हो, उनकी साइकिल का पंक्चर ठीक करवाना हो, उनकी गाड़ी में पेट्रोल भरवाना हो या बाहर का कोई भी काम हो, हर बार यह कहकर छोटे भाई/बहन को रोक देना कि तुम रुको, मैं कर देता हूँ/देती हूँ, गलत है । ऐसा करते रहने से वे कुछ भी खुद से करना सीख ही नहीं पाएंगे। और जब वे आगे पढ़ाई या नौकरी के लिए बाहर जायेंगे तब उन्हें किसी भी चीज की जानकारी ही नहीं होगी और छोटे छोटे काम भी उन्हें पहाड़ जैसे लगने लगेंगे। इसलिए चाहे आप कोई बिल भर रहे हों, गाड़ी की सर्विसिंग करवा रहे हों या ऐसे अन्य कोई भी काम हों, अपने छोटे भाई-बहन को भी इसके बारे में जानकारी दें और उन्हें इससे जोड़ें। जब वे इस लायक हो जाएँ कि अकेले ये काम कर सकें तो उन्हें थोड़ा थोड़ा करके काम की जिम्मेदारी भी दें। 
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आर्थिक समझदारी भी सिखाएं - फोटो : pixabay
तू पैसों की चिंता मत कर

यह बात तब संबल की तरह होती है जब आप कठिन घड़ी में किसी को हिम्मत बंधा रहे होते हैं लेकिन अगर आप अपने छोटे भाई-बहन की जिद पूरी करने के लिए हर बार अपनी चादर से अधिक पैर बाहर निकालते हैं तो यह आगे जाकर बहुत तकलीफदायक बन सकता है। बचपन में चॉकलेट या खिलौने के लिए की गई जिद आगे जाकर कोई भी बड़ा रूप ले सकती है क्योंकि इंसान के मन में यह बात बैठ चुकी होती है कि मेरा बड़ा भाई-बहन तो इसे पूरा कर ही देगा। इससे बच्चों के मन में मेहनत और पैसों को लेकर सम्मान की भावना भी नहीं रहती, न ही वह सेविंग करना सीखता है। इसलिए लाड़-प्यार में आर्थिक सीमा को भी ध्यान में रखें। केवल छोटे भाई-बहन की जिद पूरी नहीं हुई तो उसे दुःख होगा, यह सोचकर उसकी हर जिद पूरी न करें। 
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छोटों की राय को भी महत्व दें - फोटो : istock
अरे तू कैसे समझेगा, अभी बहुत छोटा है तू!

घर में भाई-बहन के बीच की उम्र का अंतर जब भी 8-10 साल तक होता है, बड़े भाई या बहन को लगता है उसका छोटा भाई या बहन बच्चा ही है। ऐसे में वे उसे किसी भी निर्णय या स्थिति (खासकर कठिन परिस्थतियों में) शामिल करने से हिचकिचाते हैं। भावनात्मक रूप से यह सोच आपके स्नेह को प्रदर्शित करती है लेकिन व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो यह छोटे भाई-बहन को स्वयं निर्णय लेने, विचार करने आदि के अवसर से ही वंचित कर देती है। ऐसे में समय आने पर वह असमंजस में पड़ सकता है या लोग उसका फायदा भी उठा सकते हैं। इसलिए परिवार के छोटे-मोटे मामलों में बचपन से छोटे भाई-बहन को भी साथ जोड़ें। उनसे राय लें और यदि राय सही लगे तो उन्हें प्रोत्साहित भी करें। 
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