Parenting Tips: वो कहावत है न कि जहां चार बर्तन होते हैं, वो खटकते ही हैं। ऐसे ही जिस घर में चार लोग रहते हैं, वहां लड़ाई-झगड़ा होना भी बेहद आम बात है। खासतौर पर शादीशुदा कपल्स के बीच तो लड़ाई-बहस होना बेहद आम बात है। इस दौरान परिवार के बड़े-बुजुर्ग अक्सर हस्तक्षेप करने का सोचते हैं। पर, ऐसा नहीं करना चाहिए। खासतौर पर जब लड़ाई आपके बेटे-बहू में हो रही हो तो।
ऐसा हम इसलिए बता रहे हैं, क्योंकि जब आप अपने बेटे-बहू के झगड़े के बीच में बोलते हैं तो इससे उनका झगड़ा काफी बढ़ सकता है। ऐसे में जब आपके बेटे-बहू झगड़ रहे हैं तो आपको समझदारी से काम लेना चाहिए। यहां हम आपको कुछ ऐसे ही टिप्स आपको बताने जा रहे हैं, जिनको आप उस वक्त फॉलो कर सकते हैं, जब आपके घर में बेटे बहू झगड़ रहे हैं।
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हस्तक्षेप करने से बचें
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हस्तक्षेप करने से बचें
जब तक झगड़ा गंभीर न हो, तब तक अपने बेटे-बहू के झगड़े में हस्तक्षेप करने से बचें। अगर आप बीच में बोलेंगे तो हो सकता है कि ये बात आपके बच्चों को अच्छा न लगे। उन्हें अपना झगड़ा खुद से ही सुलझाने दें। क्योंकि झगड़ा क्यों हो रहा है, इस बारे में सिर्फ उन्हें पता होता है। इसीलिए उन्हें अपना झगड़ा खुद ही सुलझाने दें।
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पक्षपाती वाक्य तो कतई न बोलें
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पक्षपाती वाक्य तो कतई न बोलें
कभी भी "तुमने मेरी बहू से ऐसा क्यों कहा?" या "हमारे बेटे की गलती नहीं है" जैसे पक्षपाती वाक्य न बोलें। ऐसा बोलना आपके बच्चों के बीच के झगड़े को भी बढ़ा सकता सकता है। यदि आप ऐसा बोलेंगे तो इससे आपके प्रति भी आपके बेटे या बहू के मन में गलत भावना पैदा हो सकती है। इसलिए कभी भी एक व्यक्ति का पक्ष लेकर झगड़े के बीच में न बोलें।
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समझदार मार्गदर्शक बनें
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समझदार मार्गदर्शक बनें
झगड़े के बाद किसी एक पर हावी तो कतई न हों। इसकी बजाय दोनों को शांत दिमाग से बैठाकर न्यायप्रिय दृष्टिकोण से बात करें। उन्हें इस बात का एहसास दिलाएं कि आप किसी का पक्ष नहीं ले रहे, बल्कि पूरे परिवार की भलाई चाहते हैं। पूरी बात को सुनें और फिर उन्हें मार्गदर्शन दें।
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संवाद को बढ़ावा दें
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संवाद को बढ़ावा दें
लड़ाई-झगड़े के बीच में ही तुरंत अपने बेटे-बहू को समझाने न लग जाएं। हमेशा झगड़े के बाद बहू और बेटे दोनों से अलग-अलग बात करें और दोनों की बातों को शांतिपूर्वक सुनें। जैसे कभी-कभी बहू को लगता है कि उसे सिर्फ बाहरी सदस्य समझा जाता है, ऐसे में उन्हें समझाएं। इसी तरह बेटे से भी समझदारी से ही बात करें।
पुराने अनुभवों को ज़बरदस्ती न थोपें
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पुराने अनुभवों को ज़बरदस्ती न थोपें
"हमारे ज़माने में तो ऐसा नहीं होता था" जैसे वाक्य दोनों को चिढ़ा सकते हैं। इसलिए अपने अनुभवों को अपने बेटे-बहू पर कतई न थोपें। इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि आज की पीढ़ी अलग सोचती है, इस अंतर को सम्मानपूर्वक स्वीकार करें।
डिसक्लेमर : इस लेख में दी गई सूचनाएं सामान्य जानकारियों पर आधारित हैं। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला इस लेख में दी गई जानकारी को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। त्वचा संबंधी किसी भी तरह की अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें।