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पारिवारिक जड़ों से जुड़ाव
बचपन से मेट्रो सिटी कोलकाता में रहने वाली सॉफ्टवेयर इंजीनियर सुनिधि को यह बात पता ही नहीं थी कि उसकी परिवारिक जड़ें कहां से जुड़ी हैं। एक दिन बातों-बातों में उनकी मां ने सुनिधि को बताया कि किस तरह वे और उसके पापा उत्तर प्रदेश के एक गांव से अपनी जमा-पूंजी लेकर शहर आए। यहां आकर उन लोगों को काफी मेहनत करनी पड़ी।
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, माता-पिता जब अपने गुजरे दिनों को बच्चों के सामने साझा करते हैं तो उन्हें पारिवारिक विरासत और अपनी जड़ों के बारे में पता लगता है। उनके द्वारा बताई गई कहानियों से ही आगे की पीढ़ी जान पाती है कि उसके पूर्वजों ने किस तरह एक छोटे गांव से आकर शहर में अपनी जगह बनाई। इससे बच्चे अपने परिवार के इतिहास और परंपराओं को भी जान पाते हैं।
दूर होती है हताशा
परिवार में माता-पिता के अलावा कई अन्य सदस्य भी होते हैं। कभी-कभी उनके द्वारा साझा की गई कहानियां भी बच्चों के सफल भविष्य को गढ़ने में मदद करती हैं। उत्तर प्रदेश के झांसी की रहने वाली डॉ. अनिता सेठी बताती हैं कि उनकी बहन डॉक्टर हैं। एक दिन उसके पास कैंसर का मरीज आया। बहन ने उससे पूछा, “तुम्हें तो कैंसर था?” उस मरीज ने झट से जवाब दिया, “डॉक्टर, आप जानती हैं कि मुझे कैंसर था, जो अब नहीं है। यह बहुत पहले की घटना है। अब मैं पूरी तरह स्वस्थ हूं। फिर पुरानी घटना को क्यों याद करना? बीती हुई बातों को याद करने से सिर्फ कष्ट होता है। व्यक्ति आगे बढ़ने के बजाय पीछे की ओर चला जाता है।”
बहन की बताई यह कहानी डॉ. अनिता के दिल को छू गई। उन्होंने खाने की टेबल पर अपने बच्चों से यह कहानी साझा की। डॉ. अनिता की बेटी, जो उस समय परीक्षा में आए कम नंबरों से परेशान थी, इस कहानी को सुनते ही एकदम उत्साह से भर गई। उसने अपनी मां से उसी समय वादा किया कि परीक्षा में उसके जो कम नंबर आए हैं, उनके बारे में वह नहीं सोचेगी। इसके बाद वह निरंतर प्रयास करती रही और फिर एमएससी में फर्स्ट आई।