औरतों की इच्छा
कॉमेडी और हॉरर को मिलाकर बनाई गई किसी फिल्म में गंभीर बहस की गुंजाइश कम ही होती है, लेकिन 'स्त्री' संकेतों में कई गंभीर बातें कह जाती है।फिर चाहे वो 'औरत कभी जबरदस्ती नहीं करती, जबदस्ती मर्द करते हैं' के बहाने 'कंसेंट' यानी सहमति पर बात करना हो या स्त्री की सुहागरात के बहाने औरतों की उस यौन इच्छा की ओर इशारा करना, जिसे सदियों से दबाने की कोशिश की गई है।
बॉलीवुड फिल्म में एक पिता का अपने युवा बेटे को 'स्वयंसेवा' (मास्टरबेट) करने की सलाह देते हुए देखना सुखद आश्चर्य जैसा लगता है।बताने की जरूरत नहीं है कि यौन अपराधों की एक बड़ी वजह सही सेक्स एजुकेशन का न मिलना भी है।बायॉलजी (जीवविज्ञान) की किताबों में दसवीं क्लास में पढ़ाने वाले टीचर 'प्रजनन तंत्र' वाला वो पूरा चैप्टर ही छोड़ देते हैं जिसमें सेक्स एजुकेशन की थोड़ी-बहुत ही सही, गुंजाइश होती है।फिर सेक्स एजुकेशन का अधपका सबक मिलता है पॉर्न से। वही पॉर्न जो हिंसात्मक होता है, सच से कोसों दूर होता है और जिसमें महिला के यौन सुख को कभी-कभार ही तवज्जो मिलती है।